-सुसंस्कृति परिहार
ये सच है भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा जी को आज जिनका जन्मदिवस है पिता नेहरू प्रियदर्शिनी कहते थे , लेकिन उनकी मृत्यु के बाद इंदिरा जी को गूंगी गुड़िया तक कहा गया किंतु अपने कंधों पर जिम्मेदारी आते ही यह छवि धूमिल होती चली गई । हम सब जानते हैं कि उनके पिता जवाहर लाल नेहरू आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वालों में शामिल थे। वही दौर रहा, जब 1919 में नेहरू परिवार बापू के सानिध्य में आया और तभी इंदिरा ने अपने पिता नेहरू से राजनीति का पाठ सीखा।
देशभक्ति की भावना इंदिरा जी में बचपन से ही कूट-कूटकर भरी थी। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आव्हान से प्रेरित होकर बचपन में ही इन्होंने अपने घर के बाहर अपने कीमती कपड़ों की होली जलाकर न केवल अपनी इसी भावना का परिचय दिया था बल्कि उसके बाद इंदिरा जी से प्रेरणा लेकर इस आन्दोलन ने पूरे देश में जोर पकड़ा था। मात्र 11 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए बच्चों की वानर सेना बनाई। 1938 में वह औपचारिक तौर पर इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हुईं और 1947 से 1964 तक अपने प्रधानमंत्री पिता नेहरू के साथ उन्होंने निजी सहायक की तरह काम करना शुरू कर दिया।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को राजनीति विरासत में मिली थी अत: पिता के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी में इंदिरा गांधी का ग्राफ अचानक काफी ऊपर पहुंचा और लोग उनमें पार्टी एवं देश का नेता देखने लगे। वह सबसे पहले लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनीं। शास्त्री जी के निधन के बाद 1966 में वह देश के सबसे शक्तिशाली पद ‘प्रधानमंत्री’ पर आसीन हुईं और देश की जिम्मेदारी जब उनके कंधों पर आई तो अपनी दृढ़ता, दबंगता, निडरता और वाकपटुता से उन्होंने दुनिया भर को अपना लोहा मानने को विवश कर दिया। अमेरिका व ब्रिटेन जैसे विकसित एवं प्रभावशाली देशों में भी उनकी तूती बोलती थी। 1966 से 1977 तक उन्होंने देश पर एकछत्र शासन किया और उनकी कार्यशैली तथा देश के प्रति उनका समर्पण भाव देखकर विरोधी भी उनकी सराहना किए बिना नहीं रह पाते थे। हालांकि लाल बहादुर शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री बनी इंदिरा को शुरूआती दौर में ‘गूंगी गुडि़या’ की उपाधि दी गई थी किन्तु बहुत ही कम समय में अपने साहसिक निर्णयों से इंदिरा ने कारण साबित कर दिया था कि वो एक ‘गूंगी गुडि़या’ नहीं बल्कि ‘लौह महिला’ हैं।

एक समय ‘गूंगी गुडिया’कही जाने वाली इंदिरा गांधी तत्कालीन राजघरानों के प्रिवी पर्स समाप्त कराने को लेकर उठे तमाम विवाद के बावजूद तत्संबंधी प्रस्ताव को पारित कराने में सफलता हासिल करने, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने जैसा साहसिक फैसला लेने और पृथक बांग्लादेश के गठन और उसके साथ मैत्री और सहयोग संधि करने में सफल होने के बाद बहुत तेजी से भारतीय राजनीति के आकाश पर छा गईं ।
वर्ष 1975 में आपातकाल लागू करने का फैसला करने से पहले भारतीय राजनीति एक ध्रुवीय सी हो गई थी जिसमें चारों तरफ इंदिरा ही इंदिरा नजर आती थीं। इंदिरा की ऐतिहासिक कामयाबियों के चलते उस समय देश में ‘इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा’का नारा जोर-शोर से गूंजने लगा। इससे उनके व्यक्तित्व को लाभ की बजाय भारी नुक्सान झेलना पड़ा ।कहा जाता है कि उनकी करीबी चौकड़ी ने उनको आपातकाल लगाने की सलाह दी थी ।
इंदिरा की राजनीतिक छवि को आपातकाल की वजह से गहरा धक्का लगा। इसी का नतीजा रहा कि 1977 में देश की जनता ने उन्हें नकार दिया, उन्हाेंने हार नहीं मानी और कुछ वर्षों बाद ही फिर से सत्ता में उनकी शानदार वापसी हुई। फिर उनके लिए 1980 का दशक खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती लेकर आया। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’को लेकर उन्हें कई तरह की राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। राजनीति की नब्ज को समझने वाली इंदिरा मौत की आहट को तनिक भी भांप नहीं सकीं और 31 अक्टूबर, 1984 को उनकी सुरक्षा में तैनात दो सुरक्षाकर्मियों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया । वे दुनिया से चली गई लेकिन भुवनेश्वर की अपनी 30 अक्टूवर की अंतिम सभा के ये शब्द ‘‘देश की सेवा करते हुए यदि मेरी जान भी चली जाए तो मुझे गर्व होगा। मुझे भरोसा है कि मेरे खून की एक-एक बूंद देश के विकास में योगदान देगी और देश को मजबूत एवं गतिशील बनाएगी।’’देश को संबल देते रहेंगे ।
राजनैतिक उतार चढ़ावों के बावजूद आज भी नेहरू की इस लाड़ली प्रियदर्शिनी गुड़िया जिसे भले गूंगी गुड़िया कहा गया हो , इंदिरा के नाम से इंडिया को दुनिया की वो पीढ़ी उन्हें जानती है जो उनकी समकालीन है ।वे महिलाएं भी इंदिरा पर नाज़ करती हैं जिन्होंने उनके शासन काल में अपने आपको गौरवान्वित किया । बांग्लादेश के लोग मुजीबुर्रहमान के साथ इंदिरा जी को भी हमेशा उनके अतुलनीय योगदान के लिए याद करते हैं । अन्तर्राष्ट्रीय जगत में वाममार्गियों में भी आज तक उनकी लोकप्रियता बरकरार हैं । गूंगी गुड़िया वास्तव में इंडिया का पर्याय ही बन गईं थीं ।जब भी राजनीति में भारतीय महिलाओं का उल्लेख होगा उनमें इंदिरा जी का नाम सबसे ऊपर होगा ।अटल बिहारी की नज़र में वे दुर्गा थीं ।ऐसी अज़ीम शख़्सियत को सलाम ।