मुनेश त्यागी
गुरु संत रविदास मेहनतकश परिवार से संबंधित थे और मेहनत मजदूरी करके अपना जीवन पालते थे। आज से साढ़े 500 वर्ष पहले यानी चौहदवीं शताब्दी में समता, समानता की बात की थी और छुआछूत, जातिवाद और वर्ण वाद का विरोध किया था और समता, समानता और भाईचारे की विचारधारा की पेशकश की थी। उन्होंने ऊंच-नीच और छोटे बड़े की सोच का भी विरोध किया था और सामाजिक एवं आर्थिक विषमता का विरोध किया था।
उन्होंने "मन चंगा तो कठौती में गंगा" की बात कह कर तहलका मचा दिया था और समाज में घनघोर अंधेरे की तरह फैले अंधविश्वास, पाखंड और धर्मांधता का कटु विरोध किया था और मनुवादी सोच और मानसिकता पर करारी चोट करके धर्माधिकारियों की आंख की किरकिरी बन गए थे। इसी कारण उन पर कई बार जानलेवा हमले भी किए गए थे।
समता, समानता के साथ ही उन्होंने सबको शिक्षा और सब को भरपेट अन्न की मांग की थी और औरत पुरुष की समानता की पुरजोर मांग की थी। इसी के साथ उन्होंने स्त्री शिक्षा की जोरदार वकालत की थी। वे एक पढ़े-लिखे और समाज के और शिक्षित समाज के हामी थे। उनके इन्हीं विचारों को संत कबीर ने आगे बढ़ाया और उनके विचारों का समर्थन किया। संत कबीर ने भी अंधविश्वासों और धर्मांधताओं व पाखंडों का जोरदार विरोध किया और संत रविदास की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,,,,,
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार
याते तो चाकी भली पीस खाए संसार।
और मुसलमानों को लताड़ते हुए उन्होंने कहा था कि,,,,
कांकर पाथर जोडि के मस्जिद लयी चुनाय,
ता चढी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय?
बाद में संत रविदास के इन्हीं विचारों को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने समता, समानता, भाईचारा, आजादी और सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समता, समानता और आजादी और अखंड भारत की बात की और इन्हीं सब मूल्यों को संजोते हुए भारतीय संविधान का निर्माण किया और सबको आगे बढ़ने का मौका दिया।
इस मौके पर तिराहा तेजगढ़ी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें जनवादी लेखक संघ मेरठ के सचिव मुनेश त्यागी ने कहा कि आज का भारत संत रविदास के विचारों का भारत नहीं है। पिछले 30 सालों में हमारे शहीदों और संविधान निर्माताओं के सपनों और विचारों को चकनाचूर कर दिया गया है, समाज में समानता और समता के मूल्यों पर चोट की जा रही है और आर्थिक समानता को भयंकर तरीके से बढ़ाया गया है। भारत में 84 परसेंट परिवारों की आय घटी है और 77 फ़ीसदी लोगों की आय यानी एक अरब से ज्यादा लोगों की प्रतिदिन आए ₹20 प्रतिदिन से भी कम है, दूसरी ओर अडानी की आय पिछले 2 साल में 8 गुनी हो गई है और अंबानी की आय दोगुनी हो गई है और दूसरे पूंजीपतियों की संपत्ति बढी है और उनकी आय में काफी बढ़ोतरी हुई है। इस प्रकार भारतीय समाज आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा समाज बन गया है।
उन्होंने कहा कि इसी के साथ आम जीवन और आम जनता के जीवन में आर्थिक संकट छा गया है। लोगों के साथ लगातार सरकार द्वारा अन्याय किया जा रहा है, उन्हें सस्ता और सुलभ न्याय नहीं मिल पा रहा है। देश में चार करोड़ 60 लाख से ज्यादा मुकदमे अदालतों में पेंडिंग हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने वैज्ञानिक संस्कृति को बढ़ाने का कोई प्रचार-प्रसार और प्रयास नहीं किया है बल्कि अंधविश्वास और पाखंडों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लोग अज्ञानता के अंधकार में डूब गए हैं, कुतर्की और अविवेकी हो गए हैं। सरकार ने इस ओर से आंखें मींची हुई हैं। सरकार लगातार शिक्षा के अवसर घटा रही है, शिक्षा का बजट कम किया जा रहा है और लोगों को अनपढ़ और शिक्षा से वंचित बनाए रखने की साजिश की जा रही है।
मुनेश त्यागी ने कहा कि रविदास के सपनों के विरोध में जातिवाद और सांप्रदायिकता को बढ़ाकर समाज की एकता तोड़ी जा रही है, मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की मुहिम जारी है, किसानों मजदूरों के अधिकारों पर लगातार हमले जारी हैं मजदूरों को आधुनिक गुलाम बनाने के लिए मुहिम जारी है, उनके अधिकांश अधिकारों को छीन लिया गया है और उन्हें आधुनिक गुलाम बना दिया गया है। नौजवानों को काम नहीं है, बेरोजगारी अपने सर्वोच्च शिखर पर है। सरकार का इस और कोई ध्यान नहीं है। सचमुच में यह संत रविदास के सपनों का समाज और भारत नहीं है। संत रविदास के सपनों को आगे बढ़ाने के लिए और बरकरार रखने के लिए तमाम मेहनतकश तबक़ों को किसानों और मजदूरों के साथ मिलकर एकजुट और संयुक्त कार्यवाही करके इस जनविरोधी सरकार के जनविरोधी कदमों और नीतियों को रोकना होगा, तभी भारत की एकता, अखंडता और भाईचारे की स्थापना की जा सकती है और संत रविदास के सपनों का भारत बनाया जा सकता है। इस अवसर पर मुनेश त्यागी ने अपनी एक कविता पेश की जो आपकी खिदमत में पेश है,,,,,,
शपथ बेच देंगे कसम बेच देंगे ये नेता हमारे वतन बेच देंगे।
थोड़े से पैसों में थोड़ी सी दारू में कई जन हमारे कलम बेच देंगे।
वफा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं है ये कुर्सी की खातिर धर्म बेच देंगे।
हया बेच देंगे शरम बेच देंगे बचा है जो थोड़ा भरम बेच देंगे।
चिंतन चेहरा चलन बेच देंगे ये सत्ता की खातिर कमल बेच देंगे।
दीपक उजाला शमा बेच देंगे जवानी बहारें चमन बेच देंगे।
चांद सितारे सूरज बेच देंगे जमीन जंगल गगन बेच देंगे।
होली दिवाली ईद बेच देंगे खुशी के हंसी के सपन बेच देंगे
सुनो मेरे यारों ये नेता हमारे शहीदों के सपने कफन बेच देंगे।

