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*बदरीविशाल पित्ती न होते तो हजारों युवा और प्रौढ़ लोहिया विचार जानने से वंचित रह जाते*

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रमाशंकरसिंह

बदरीविशाल पित्ती जी न होते तो हजारों युवा और प्रौढ़ लोहिया विचार जानने से वंचित रह जाते । उस जमाने का भारी भरकम टेप रिकॉर्डर लेकर बदरीविशाल जी जगह जगह घूमते हुये डा ० लोहिया की सभाओं में जाते उनके भाषणों को रिकॉर्ड करते , लौटकर कर उसे लिपिबद्ध करते और अंत में अपनी प्रैस में छापकर वितरित भी करते । हैदराबाद में पित्ती जी ने साहित्य , संगीत , नृत्य , विचार और संगठन का जो पंचनद बहाया वह पूरे शहर को समृद्ध करता चला गया ।मुझे मालूम है कि 1977 में उन्हें राज्यपाल बनाने का प्रस्ताव दिया जो उन्होनें साफ मना कर दिया और अपनी जगह एक अन्य साधारण राजनीतिक कार्यकर्ता की सिफारिश की।

पित्ती महल ( शायद यही नाम था उनके पैतृक घर का ) हैदराबाद में पित्ती जी से 1977 में मुलाकात का संस्मरण मैंने पिछले बरस एक स्मारिका हेतु लिखा था वह ससम्मान व श्रद्धा सहित साझा कर रहा हूँ ।
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“ महामना बदरीविशाल पित्ती जी की भारतीय समाजवादी आन्दोलन में भूमिका न सिर्फ अग्रणी थी बल्कि प्रमुख होने के साथ-साथ अतीव महत्वपूर्ण भी थी। समाजवादी विचार विशेष तौर पर डाँ. लोहिया के मौलिक विचारों को प्रामाणिक रूप से संग्रहित करना, लेखबद्ध कर उन्हें छपवा कर सस्ते दामों पर उपलब्ध कराना एक ऐसा बड़ा काम था जिसका व्यक्तिगत स्तर पर आधी सदी में कोई सानी नहीं है।

यदि पित्ती जी यह नहीं करते तो यह देश, दुनिया व समाज डाँ. लोहिया के अमूल्य विचारों से कभी भी पूरी तरह अवगत न हो सकती थी। इस काम में कितनी मेहनत, निष्ठा, समर्पण और साधन लगे होंगे, यह आज के तकनीकी विकास के समय में पूरी तरह कल्पित भी नहीं किया जा सकता।

एक नामी धनाढ्य परिवार में पैदा होकर समाजवादी आन्दोलन के बीहड़ दुर्गम एवं संघर्षपूर्ण रास्ते पर पूरे जीवन चलते जाना, यथास्थिति के विरूद्ध एक विद्रोही आत्मा का ही कमाल हो सकता है।

मात्र विचारों का प्रसार-प्रचार प्रकाशन ही नहीं बल्कि सोशलिस्ट पार्टी का मुख्यालय हैदराबाद में प्रस्तावित करना व संचालित करने में सहायता करना और डाँ. लोहिया के जीवित रहने तक उनको परिवार से भी बेहतर ढंग से अपने निवास पर उन्हें रखना भी पित्ती जी की सदाशयता का अखंड बयान करता है।

मेरी सबसे पहली भेंट पित्ती जी से 1977 में हुई जब किसी शासकीय काम से मुझे हैदराबाद जाने का संयोग हुआ। तब मैं म.प्र. मंत्रीपरिषद् में राज्यमंत्री होता था। सौजन्यतावश मैनें अपने आगमन की सूचना पित्ती जी को देना उचित समझा और तत्काल ही हैदराबाद से मुझे उनका फोन आ गया कि मैं उनके घर पर ही ठहरूँ। कोई भी ना-नुकुर करने की गुंजाईश पित्ती जी के सामने मेरी नहीं थी। स्टेशन पर ही सरकारी गाड़ी खड़ी थी लेकिन पित्ती जी के किसी सहायक के साथ उनकी गाड़ी भी इंतजार में थी। सरकारी गाड़ी लौटाई गई और मैं उत्सुक था ‘पित्ती महल’ में बदरीविशाल पित्ती जी से मिलने हेतु। बेगमपेठ स्थित ‘पित्ती महल’ वास्तव में ही एक महल था जहाँ भूतल पर उसी कमरे में शायद मुझे ठहराया गया जो डाँ. लोहिया के लिये सदैव नियत हुआ करता था। शासकीय बैठक के पूर्व दोपहर भोज पर पित्ती जी से मिलना तय हुआ। प्रथम तल पर पित्ती जी के भोजन की मेज पर सफेद बुर्राक मेजपोश, नैपकिन और करीने से थालियों कटोरियों में एक-एक व्यंजन का उचित मात्रा में होना , ना ज्यादा ना कम। कटे नींबू को मसलीन में लपेट कर रखना और धनिया के पत्तों तक को बहुत बारीक काट कर पृथक रूप में रखना साबित कर रहा था कि पित्ती जी की अभिरूचियाँ सब मामलों में कितनी परिष्कृत थीं। इसके पहले मैनें कभी मारवाड़ी शाकाहारी भोजन इस तरह किया हो मुझे नहीं लगता।

पूरे समय मैं संकोचवश कायदे से खाने की कोशिश करता रहा और शायद असफल ही। भोजन के बाद पित्ती जी ने मुझे मुख्य आवास के पीछे हुसैन (मकबूल फिदा हुसैन) साहब द्वारा पेंटिंग करते हुये देखने को कहा। मै तब तक नहीं जानता था कि कौन हुसैन हैं? आज्ञा मान कर मैं पीछे गया तो देखा कि दाढ़ी वाले दुबले पर कद में कुछ ऊँचे एक सज्जन कैनवास पर कुछ रंग भर रहे हैं और कई तैयार कैनवास वहीं लॉन में रखे हुये थे, संभवतः तेलरंग सूखने के लिये। मेरी समझ में कुछ नहीं आया बस देखकर चला आया। कालांतर में हुसैन और डाँ. लोहिया द्वारा प्रेरित रामायण व महाभारत की कलाश्रृंखला को जाना और पछताया कि मैं कितना जाहिल था उन दिनों कि विश्वविख्यात चित्रकार सामने पेंट कर रहा था और मैं उस महत्वपूर्ण क्षण को समझ नहीं सका। बाद में शाम के पहले पित्ती जी ने हैदराबाद के भ्रमण का भी इंतजाम किया और अगले दिन मैं वापिस भोपाल लौट आया। कितना स्नेह पित्ती जी ने 25 वर्षीय एक सोशलिस्ट युवक पर लुटाया। यह भी विचार की एकता के कारण हुआ। इसके बाद भी एक-दो बार दिल्ली में सोशलिस्ट नेता और तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री श्री राजनारायण जी के आवास पर पित्ती जी से मीठी भेंट हुई।

आज जब कई ‘आउट ऑफ प्रिंट’ पुस्तकों लेखों को मैं पुनर्मुद्रित करने के पहले पढ़ता हूँ तो हर बार पित्ती जी की छवि मन में कौंधती रहती है। यह पित्ती जी के व्यक्तित्व की बहुत छोटी सीमित छवि है, जबकि उनके द्वारा ‘कल्पना’ जैसी अभूतपूर्व साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन और आरंभ में ‘जन’ व ‘मैनकाइंड’ का प्रकाशन करना पित्ती जी के महान योगदान को परिलिक्षित करता है। तेलंगना हैदराबाद के सांस्कृतिक-सांगीतिक परिदृश्य को संपन्न बनाने में भी पित्ती जी का कम योगदान नहीं है। सयंुक्त आंध्र प्रदेश के सजग सक्रिय विधानसभा सदस्य भी रहे पित्ती जी।

मैं एक सत्य घटना से इस संस्मरण को यही पूर्ण करना चाहता हूँ कि जनता पार्टी की केन्द्रीय सरकार बनने के बाद पित्ती जी को राज्यपाल व राज्यसभा सदस्य बनाने का प्रस्ताव हुआ, लेकिन पित्ती जी ने यह कहकर उसे खारिज कर दिया कि ‘क्या हमने कोई पद लेने के लिये अपना जीवन खपाया था’।

ऐसे महान व्यक्त्वि को मेरा कोटिशः प्रणाम।

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