अग्नि आलोक

*आज हुसैन होते तो ११० बरस के होते……!*

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रमाशंकर सिंह 

भारतीय समाजवादी आंदोलन के प्रमुख विचारक सिद्धांतकार प्रणेता व राजनेता डा० राममनोहर लोहिया की तीस से अधिक किताबों के मुखपृष्ठ महान चितेरे और रामायण व महाभारत समेत अनेक भारतीय प्राचीन आख्यानों व वांग्मय के अनूठे चित्रकार श्री मकबूल फ़िदा  हुसैन ने बनाये थे। यह पिछली सदी के छठवें दशक की बात है। 

 

अक्सर ही कट्टरपंथी आतंकवादी तत्व अपने कर्मों को नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। जब यह ज़हरीला शोर बढ़ जाता है तो अन्य लोग भी कन्नी काट कर चुप रह जाते हैं जबकि कुछ उसी भीड़ के साथ शामिल हो जाते हैं।  जब हुसैन को देश छोड़ना पड़ा  तो वे क़तर में रहने को बाध्य हुये और उनके शव को अपने मातृ-पितृ देश की भारतभूमि भी नसीब न हुई । वे भारतमाता के महान पुत्र थे जिसे दुनिया ने पहचाना और हमने बेइज्जत कर देशनिकाला किया।  क्या राजनीतिक दल क्या सरकार और क्या उनके प्रशंसक व परिवार के लोग सब उस समय कैसे घरघुस्सू होकर अपने नागरी धर्म से च्युत हो गये थे। वे चित्रकार जो आज अपने चित्रों को बेचकर ऐशो आराम से रह रहे हैं या जीवन यापन कर रहे हैं उन हजारों ने भी मुंह नहीं खोला जबकि ये सब जानते हैं कि हुसैन ने ही भारत में कला बाजार पैदा किया था । 

विश्व नीलामी में हुसैन की भारत के ग्राम जीवन पर बनायी एक पेंटिंग एक सौ करोड़ रु के ऊपर जाकर बिकी थी । 

हुसैन के जन्मदिन पर कुछ  ही बरस पहले भी लिखा था । आज फेसबुक ने फिर से परोस कर ताजा कर दिया।  साझा कर रहा हूँ। …….

……..“ एक संगठित भीड, आधुनिक चित्रकला की भाषा व व्याकरण से अनजान अपढ विरत लोग , पौराणिक संदर्भों आख्यानों और उसकी उदात्त तात्विकता के प्रति जानबूझकर नासमझ रहे राजनीतिक उद्देश्य के गिरोह और  जन्म से मुसलमान  होने के कारण इनकी नफरत का आसान केंद्र बने हुसैन को उनकी मातृभूमि  से बेदखल कर अन्य देश में शरण लेने को मजबूर एक वैश्विक स्तर के महान चित्रकार के प्रति हम सबने एक  जघन्य अपराध किया। भारत में पिछले सत्तर बरसों में आधुनिक एवं समकालीन चित्रकारी को दुनिया की नज़र में लाकर बाज़ार मे बिकने योग्य जिस कलाकार का एकमात्र योगदान है उसके लिये ऐसा सुलूक ! 

हुसैन अकेले ऐसे समकालीन चित्रकार हुये जिन्होनें डा० लोहिया की प्रेरणा और उनके धनाढ्य अनुयायी बदरी विशाल पित्ती की मदद से हैदराबाद में रह कर सैंकड़ों चित्र रामायण और महाभारत पर बनाये । रामायण और महाभारत के अध्ययन के बग़ैर यह कैसे संभव हो सकता था और निजी चर्चा में लोहिया से रामायण महाभारत पर नई दृष्टि के साथ। बैल गाड़ियों पर लाद लाद कर गाँवों में रामलीला के मंचों को अपने चित्रों से सजाने के लिये ले जाते थे। जब दुनिया की नज़र हुसैन पर पड़ी तो हाथ में कूची लिये नंगे पॉंव भटकने वाला फ़क़ीर रातों रात एक चित्र को करोड़ों रु में बेचने लायक़ हो गया। वैश्विक नीलामी घर हुसैन के एक एक चित्र को लेने के लालायित हो गये। 

क्नॉट प्लेस की पहली मंज़िल पर एक असाध्य सुंदर युवती आर्ट गैलरी चलाती थी नीचे भूतल पर दक्षिण भारतीय रेस्तराँ खुला और नंगे पाँव हुसैन इडली खाने पहुँच गये , देखा कि दीवारें सफ़ेद पुती हैं और नंगी हैं। पास की दुकान से काला रंग लेने चले गये। तब तक भीड़ और रेस्तराँ मालिक पहचान चुका था। हुसैन ने पूछा कि दीवारें रंग दूँ ? मालिक ने हॉं कही और बस इडली खाने के बाद एक घंटे से कम समय में पूरी दीवारें हुसैन से भरपूर हो गयी और वो रेस्तराँ कभी ख़ाली नहीं रहा । हुसैन की फ़ीस एक प्लेट इडली रही। ऐसे हज़ारों क़िस्से हुसैन की दिलदारी के लोगों की जुबान पर हैं। इस रेस्तराँ मे लोग हुसैन की कलाकारी को देखने भी आते और इडली दोसा भी खाते। 

अमीरजादों से पूरा वसूलना भी किया हुसैन ने । सैंकड़ों करोड रु में कतर के एक महलनुमा भवन की छत  पर चित्र बना दिये लेकिन हुसैन सब पैसा लुटा देते थे। बचाते कभी नहीं थे। जब करोडों आया तो मेहमानों को लाने के लिये भी बुगाटी कार जाती थी , एक वो खुद चलाते थे लेकिन यह सब निर्वासन में किया। हुसैन को आख़िर में भारत की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई।

रामायण महाभारत पर पौराणिक और भारतीय समाज पर चित्र बनाने वाले अप्रतिम  अद्भुत फ़क़ीर पर दुर्भाग्यशाली ( समय साबित करेगा कि दुर्भाग्यशाली वास्तव में कौन रहा ? ) चित्रकार हुसैन या कि भारतदेश ?

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