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जीएम सरसों पर आधी-अधूरी रिपोर्टों और भ्रामक प्रचार से काम नहीं चलेगा

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के. सी. त्यागी (पूर्व सांसद)
देश में जीएम सरसों को पर्यावरणीय मंजूरी मिल जाने के बाद सरसों की इस किस्म को चालू रबी सीजन से ही उगाया जाए, इसके लिए जोरदार पैरवी की जा रही है। हालांकि हरित संगठनों के अलावा विभिन्न किसान संगठन भी इसका विरोध कर रहे हैं। इसके विरोध में सबसे मुखर स्वर आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच का है। उनका आरोप है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी (जीईएसी) गैर जिम्मेदाराना तरीके से काम कर रही है। जीईएसी ने डिवेलपर को एक अनुमतिपत्र में कहा कि उनके समर्थन में प्राप्त सभी जानकारी विदेश से लाई गई थी। हमारे देश में इसके बारे में अध्यन किया जाना बाकी है। इन संगठनों का सवाल है कि यदि भारत में कोई अध्ययन नहीं किया गया तो फिर जीईएसी ऐसा गैरजिम्मेदार, अवैधानिक निर्णय कैसे ले सकती है?

बीटी कॉटन के अनुभव

भुखमरी दूर होने की दलील

अधिकांश खाद्य और व्यापार नीति से जुड़े संगठनों एवं विशेषज्ञों का कहना है कि कमिटी का निर्णय दबाव और जल्दबाजी में लिया गया है। सरसों की जिस किस्म को मंजूरी दी गई है, वह कम पैदावार वाली है। वर्तमान में जीएम सरसों की श्रेणी डीएमएच-11 से भी ज्यादा उपज वाली चार किस्में भारत में पहले से ही मौजूद हैं। डीएमएच-1, डीएमएच-2, डीएमएच-3, डीएमएच-4 सरसों की पैदावार जीएम सरसों से ज्यादा है। डीएमएच-4 जो एक पारंपरिक किस्म है, जीएम सरसों की तुलना में 14% अधिक उपज प्रदान करती है।

शहद उत्पादन पर असर
जीएम सरसों के विरोध का एक बड़ा कारण मधुमक्खी पालन में आने वाली परेशानी भी है।

दूसरे देशों का अनुभव
सरकार एक तरफ तो ऑर्गेनिक फार्मिंग की बात करती है, दूसरी तरफ इस प्रकार की नीतियां लाकर खेती के रसायनों के प्रभाव को बढ़ाती है। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन जीएम फसलों के प्रयोग से पहले भूमि परीक्षण अनिवार्य बनाने की सिफारिश कर चुके हैं।

ऐसे में नीति निर्धारकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका प्रस्ताव किसानों और उपभोक्ताओं के हित में हो। इस तरह का फैसला लेने से पहले देश में एक आम सहमति बनाना भी आवश्यक है।

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