रमाशंकरसिंह
पूर्व मंत्री
दिल्ली विश्वविद्यालय में हरदीप पुरी वैसे तो हमारे समकालीन थे – उम्र में मुझसे दस माह छोटे रहे और हिंदू कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष भी थे । भारतीय विदेश सेवा में जल्दी ही सिलेक्ट हो कर करीब ४० साल की विदेशों में नौकरी की । संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि भी रहे और कभी बुरे नौकरशाह नहीं माने गये ।लम्बे समय अमेरिका में रहे । आप सब जानते होंगें कि विदेश सेवा का व्यक्ति दिन रात दावतों में ही मेलमिलाप से अपने सम्बंध बनाता है और दिल्ली में बैठी सरकार को खबर करता रहता है । इस दावतबाजी में सरकारें बड़ा पैसा खर्च करतीं हैं । सुरा सुंदरी कंचन कामिनी सब उपयोग में आती हैं कि जानकारी भर मिल जाये ।
मुझे मालूम है कि यदि सेवानिवृत्ति के समय कांग्रेस सरकार होती तो आप वहॉं भी कुछ न कुछ पद पा जाते और दूसरी पार्टी की ओर झांकते तक नहीं ।
लेकिन मंत्री बनने के बाद ऐसा मानसिक परिवर्तन हुआ कि एक तटस्थ भाव के पंथनिरपेक्ष शिक्षित व्यक्ति के कदम बहके तो ऐसे कि ऐपस्टीन ( पुरी उसे ऐपस्टाइन कहते हैं , शायद सही भी हो ) तक पहुंच गये । आधी सदी का अंतर्राष्ट्रीय अनुभव इतना ही काम आया कि मामूली से कूटनीतिक राजनीतिक सम्पर्क बनाने के लिये एक सजायाफ्ता यौन अपराधी के दर पर पहुँचा दिया । मैं अभी यह नहीं मानता कि पुरी ने एपस्टीन के नारकीय वीभत्स हरम में कोई यौनाचार किया होगा पर उस राक्षस से सम्पर्क करने की जरूरत ही क्या थी और अगर पड़ गई तो लानत है उस पचास साल के अनुभव पर जिसमें भारत के सैंकड़ों करोड़ रु तो बहे पर काम नहीं आ सके ।
पुरी साहब – किसी का राजनीतिक रूप से बच्चा होना अवयस्क होना अपरिपक्व होना तो माफ किया जा सकता है पर इतने अनुभव के बाद अनैतिक होना नहीं । अब जब भी सेवानिवृत्त होंगें दो कौड़ी की इज़्ज़त कहीं नहीं पायेंगे- गुरु साहेब के दरबार में तो बिल्कुल ही नहीं ।
निजी मित्रतायें राजनीतिक मतभेदों से बेअसर रहती हैं , रहनी चाहियें पर मानवीय मूल्यों की बलिवेदी पर नहीं । आप समझें या और खुलकर कहूं कि मैं अब आपको पहचानता नहीं !

