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नफ़रत फैलाने का उपक्रम चालू आहे……

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सुसंस्कृति परिहार
कुछ दिन पहले की बात है एक साहित्यिक गोष्ठी में उपस्थित मनीषी मुझे सलाह दे रहे थे आपने कश्मीर फाईल्स फिल्म देखी मैंने कहा नहीं।ज़रूर देखिएगा।इस तरह की चर्चाएं जब साहित्यिक मंच पर हो रही हों तो समझा जा सकता है कि देश के तिराहे चौराहे और चाय पान की दूकान पर क्या चल रहा होगा।पांच राज्यों के चुनाव में चार पर विजय के दंभ के बाद इस फिल्म का प्रदर्शन और हमारे प्रधानमंत्री जी की जनता से देखने की अपील।टेक्स फ्री करना।सब एक दूसरे से कुछ यूं जुड़े मामले हैं जैसे हिंदुओं के लहू को खौलाने का पूरा इंतज़ाम किया गया हो। अरविंद केजरीवाल सही कह रहे हैं कि इसे सबको दिखाने इसके वीडियो जारी कर देने चाहिए। लेकिन ये मुनासिब नहीं विवेक एंड कंपनी के मुनाफे का क्या होगा ? अरबों रुपए पीटकर वे सपत्नीक बैंकाक में कश्मीरी पंडितों के ग़म के जश्न में मशगूल हैं वहां से कश्मीर फाइल्स के प्रचार का सिलसिला जारी है।इधर देश में  नफरत की आग में झुलसाने को लोग तैयार हो चुकें हैं कहीं कहीं चिंगारियों को हवा देने लोग पहुंचने लगे हैं।
यह समझ से परे है कश्मीर के मुसलमान अचानक इतने बड़े शत्रु क्यों नज़र आने लगे।देश के तकरीबन 30%से ज्यादा लोग तफ़री करने वादिए कश्मीर गए होंगे।जिसे जन्नत कहा जाता है ।कभी इन पर्यटकों के साथ कहीं अमानवीय व्यवहार हुआ क्या बल्कि खातिरदारी के किस्से ज़रुर सुने होंगे चाहे वे सिख हो , हिंदू हों मुस्लिम हों सभी में कश्मीरियत का सलीका मिला होगा ।यही वजह कि कश्मीर फाईल्स फिल्म की फर्जी कहानियों के बीच  बड़ी तादाद में सैलानी वहां पहुंच रहे हैं और सुरक्षित ख़ुश ख़ुश वापस आते जा रहे हैं।वे सिर्फ वैष्णव देवी या अमरनाथ बाबा नहीं जाते वे डल झील में शिकारा और हाऊसवोट ,चिनार और झेलम पार्क ज़रुर जाते हैं क्यों ?,वे डल किनारे चश्मेशाही का पानी पीते हैं और उसे लेकर भी आते हैं।चार चिनार और हज़रतबल दरगाह में उनके बाल का दीदार करते हैं।अखरोट,बादाम,जाफ़रान और पश्मीना और पेपरमाशी का डल झील बाज़ार में भरपूर आनंद भी लेते हैं।इसके अलावा छड़ी मुबारक स्थल ,शंकराचार्य टेम्पिल,चरारे शरीफ,खीर भवानी,अकबर फोर्ट भी लोग जाते ही हैं। गुलमर्ग, सोनमर्ग,पहलगाम तो बराबर जाना होता रहता है। सन् 1998में लालकृष्ण आडवाणी की बदौलत सिंधु नदी पर सिंधु दर्शन खासकर सिंधी लोगों का नया धाम बन गया है। सोपोर के विशिष्ट अखरोट ,बादाम मूंगफली की तरह साफ्ट होते हैं।कश्मीर के डिलेशस सेब , गुलाब और जाफरान की महक का जवाब नहीं।इतनी खूबसूरत ज़मीं के लोग भी उतने ही लाजवाब और खूबसूरत और लज़्जतदार।शिकारा पर ले जाता नन्हा बच्चा जब गुलदस्ता देकर कहता है सेठ हमारे वतन में स्वागत है डरिए नहीं आपको कुछ नहीं होगा।तो अजीब सुखानुभूति होती है।
सबसे दुखद पहलू कश्मीर घाटी का ये रहा है कि तीन विशिष्ट कौमों के इस त्रिवेणी स्थल पर कई देशों की नज़र रही है । इसलिए आज़ादी के तत्काल बाद कबाईलियों ने आक्रमण कर हमारा मुजफ्फराबाद छीन लिया जो आज तक विवादास्पद है।इस पर फिलहाल पाकिस्तान और आतंकी लोगों का सरमाया है यह राष्ट्र संघ के छल के कारण कश्मीरियों को झेलना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रसंघ से वापसी की बात की पर उसने दो टूक कह दिया  जो जहां है वहीं रहेगा । यहीं से सीधे साधे मेहनतकश कश्मीरियत को बदनाम करने के षड्यंत्र शुरू किए गए जो आज भी जारी हैं।सबसे बड़ा घात कश्मीर के राजा हरिसिंह के पुत्र कर्ण सिंह का पलायन था जिसने अपनी रियाया को मंझदार में छोड़कर जम्मू पलायन कर लिया।शेख अब्दुल्ला ही ऐसे व्यक्ति थे जो नेहरू और इंदिरा जी के साथ डटे रहे और घाटी सुरक्षित करे रहे। ये निर्विवाद रुप से सत्य है कि कश्मीर की अवाम ना तो भारत देश का अंग बनना चाहती है और ना पाकिस्तान का।वे कश्मीर वतन चाहते हैं।जिसकी सुरक्षा हेतु भारत से संधि है।कहने का आशय यह कि उनका रुझान भारत की ओर है वे व्यापार,अध्ययन,स्वास्थ्य , निजी सेवाएं सभी में भारत के साथ भागीदारी रखते हैं। लेकिन उन्हें पाकिस्तानी कहा जाता है।यहां तक वे भारतीय प्रशासनिक और सेना में भी बहुमूल्य सेवाएं दे रहे हैं।
एक लंबे अरसे बाद इंदिरा जी ने उनके वतन का झंडा सौजन्यपूर्ण बातचीत से समाप्त करा दिया वहां शेख अब्दुल्ला पहले प्रधानमंत्री कहलाते थे अब मुख्यमंत्री कहलाने लगे। सिर्फ 370की कुछ धाराएं ही थी जिसमें कुछ उन्हें विशेषाधिकार थे जैसे अरुणाचल, नागालैंड, मणिपुर जैसे कई  राज्यों में आज भी है।वह भी हट जाते किंतु हिंदु-मुस्लिम करने वाली वर्तमान सरकार ने कश्मीरियों का दिल तोड़ दिया।इससे पहले जगमोहन जैसे राज्यपाल ने केंद्र सरकार जो भाजपा समर्थित सरकार थी ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकलने साधन मुहैया कराए, सुविधाएं दीं और कश्मीर को बेनूर करने का उपक्रम चलाया। हालांकि आतंकियों ने अगर 600के लगभग पंडित हलाक किए तो तकरीबन 15,000के लगभग मुसलमान भी मारे गए थे।जिनकी फिल्म में चर्चा नहीं।मारने वाले बाहरी आतंकी थे ये नहीं बताया गया।बेवजह वादिए कश्मीर के मुस्लिमों के साथ अब तो देश भर के मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है।यह उपक्रम चलाया रहा है लेकिन कश्मीर से भगाए गए कश्मीरी पंडितों की वापसी का इन आठ सालों में कोई इंतजाम नहीं हुआ जिससे कश्मीर में अपने हिंदू भाइयों की राह देखते मुस्लिम भी दुखी हैं। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है आज भी आप घाटी में जायेंगे तो हिंदु लोगों के मकान पूरी तरह सुरक्षित और खिड़कियों से देखने पर सजे संवरे नज़र आते हैं उन पर किसी मुस्लिम ने अतिक्रमण नहीं किया।कल्पना कीजिए शेष भारत में क्या किसी मुसलमान का मकान इस तरह सुरक्षित रह सकता है। पिछले दिनों एक संवाददाता की रिपोर्ट से ये जानकारी मिली कि हिंदुओं को बसाने कई मंजिला इमारतें बनने जा रहीं हैं ये भूकंप ग्रस्त क्षेत्र के लिए वैसे भी उचित नहीं फिर जब उनके अपने मकान हैं तो ये व्यवस्था क्यों?लगता है नफरती संस्कृति के लोग भाईचारे के ख़िलाफ़ हैं।दूसरा उनके शानदार बंगलों पर रसूखदार कब्जे कर लेंगे।
कुल मिलाकर कश्मीर की जो समस्या है वह अंदरूनी नहीं बाहरी है।इसे अंदरुनी स्वरुप दिया जा रहा है पुलवामा के अपराधी कौन थे? गुजरात की बस को किसने भटकाया?370हटने के बाद उपद्रव जारी है क्यों ?खैर वहां की छोड़िए देश में इस फिल्म को देखने का ज़ोर क्यों दिया जा रहा ।मंशा साफ है कश्मीर पंडितों के दर्दनाक हालात दिखाकर वोटों का ध्रुवीकरण की गंदी कोशिश है।जबकि कश्मीरी पंडित भी इसके विरोध में शामिल हो रहे हैं। फिल्म देखने का सुझाव देने वालों से निवेदन है वे फिल्म पर भरोसा ना कर कश्मीर जाएं देखें किस तरह पीड़ाओं के बीच कश्मीरियत बचाने आज भी वहां के लोग जद्दोजहद कर रहे हैं।जन्नत को दोजख बनाने वाले सारे देश में नफरत की फसल उगाने की तैयारी में हैं।इसे कामयाब ना होने दें।
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