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मुगल काल से नफरत- ब्रिटिश राज से मोहब्बत……मंदिर विवाद चुनावी सफलता का अचूक फॉर्मूला

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 हरनाम सिंह

मंदसौर। यह सर्वविदित इतिहास है कि भारतीय जनता पार्टी धार्मिक विद्वेष के रथ पर सवार होकर सत्ता के शिखर तक पहुंची है । बहुसंख्यक समाज की आस्था और धार्मिक विश्वास के तीन बड़े प्रतीक घट घट के वासी महाराजा दशरथ के सुपुत्र सियावर रामचंद्र जी, नंदकिशोर माखनचोर ,  वासुदेव पुत्र श्री कृष्ण, एवं सृष्टि को बचाने के लिए विष को गले में उतारने वाले नीलकंठ सहित अनेक नामों से पुकारे जाने वाले भोलेनाथ महादेव रहे हैं। भाजपा इन्हीं को आधार बनाकर अनंत काल तक सत्तासीन बने रहने की योजना पर काम कर रही है। बाबरी मस्जिद को गिरा कर हुए ध्रुवीकरण के चलते वर्तमान में वह  शासन में है। निश्चित ही 10 वर्ष की अवधि तक तो इन्हें राज करना ही है। चिंता उसके बाद की है । इसलिए अब श्री कृष्ण जन्मस्थान को चुनावी प्रचार का प्रमुख साधन बना कर पुनः धार्मिक भावनाएं उभारने का सुनियोजित प्रयास प्रारंभ हो चुका है । अदालतों के अलावा आए दिनों अलग- अलग भाजपा नेताओं,मंत्रियों के बयान इसे प्रमाणित कर रहे हैं। 
*देश में अनेक स्मारक हैं गुलामी के* 

         बाबरी मस्जिद विध्वंस के पूर्व भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों द्वारा किए गए प्रचार अभियान में बाबरी मस्जिद को गुलामी का कलंक बताया गया था। आज भी इन संगठनों द्वारा अनेक मुगलकालीन भवनों, स्मारकों के प्रति घ्रणा व्यक्त करते हुए उन्हें नष्ट करने अथवा उनके स्वरूप को बदलने की बात दोहराई जा रही है । आश्चर्य तो यह है कि मुगल काल के प्रति इनके द्वारा जितनी घ्रणा व्यक्त की जा रही है, इतनी नफरत ब्रिटिश काल और उस दौरान निर्मित संरचनाओं के प्रति व्यक्त नहीं की जाती। मुगलों ने भारत वासियों पर जुल्म किए थे तो ब्रिटिश शासन में भी कम अत्याचार नहीं हुए थे। इन संगठनों का अंग्रेजों के प्रति उदार भाव ही था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा ने आजादी की लड़ाई में शिरकत नहीं की और स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के दमन में अंग्रेजों का साथ दिया।
 *837 वर्ष रहा आक्रंताओं का शासन*
 इतिहास साक्षी है कि सामंत काल में अपनी सीमाओं का विस्तार करना राजाओं की आम प्रवृत्ति थी ।भारत संपन्न देश था इसलिए वह लुटेरों के आकर्षण का केंद्र था। मोहम्मद बिन कासिम के बाद मोहम्मद गजनवी ने 17 बार भारत पर आक्रमण किया और उसे लूटा। उसके बाद 349 वर्षों तक मोहम्मद गोरी, कुतुबुद्दीन ऐबक, खिलजी, तुगलक, सय्यद, लोदी,सूरी आते रहे लूटते रहे । वर्ण व्यवस्था के चलते भारत की विभिन्न रियासतें और उनके शासक कमजोर थे। इब्राहिम लोदी को खदेड़ने के लिए मेवाड़ के राजा राणा सांगा ने पहली बार बाबर को बुलाया , इसी बाबर ने कालांतर में भारत में मुगल साम्राज्य की नीव रखी।           बाबर ने 1526 इस्वी में दिल्ली में अपना साम्राज्य स्थापित किया। इसी साम्राज्य के अंतिम शासक बहादुर शाह जफर थे, जिन्हें 1858 में अंग्रेजों ने सत्ता से हटाया। भारत में मुगलों के शासन की अवधि 315 वर्ष रही।   

   वही अंग्रेजों ने भारतवर्ष पर 173 वर्ष तक शासन किया। 1773 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोलकाता में राजधानी बना कर अपना शासन प्रारंभ किया। कंपनी ने भारत पर 1858 तक कुल 84 वर्ष राज किया।1857 के गदर पश्चात 1858 में ब्रिटेन की रानी ने भारत को अपने आधिपत्य में लेकर उसे अपना उपनिवेश बना दिया। ब्रिटिश ने 1947 तक कुल 89 वर्ष तक शासन किया।             भारत पर शासन की नियत से फ्रांसीसी, पुर्तगाली भी आए । पुर्तगाल तो आजादी के बाद तक गोवा पर काबिज रहा। लेकिन हमारी नफरत मुगलों के इतर न अंग्रेजों तक पहुंचती है, नहीं पुर्तगालियों तक।
 *गुलामी के स्मारक*
 837 वर्ष की विदेशी गुलामी के दौर में तत्कालीन शासकों ने देश में अनेक संरचनाओं का निर्माण करवाया। मुगल काल में लाल किला, ताजमहल, जामा मस्जिद, सहित अनेक मस्जिदों, किलो, दरवाजों का निर्माण हुआ। जिन को ध्वस्त करने अथवा उनकी पहचान बदलने का वर्तमान में जोर शोर से प्रयास जारी है। 

             वहीं गोवा में पुर्तगालीन  अनेक चर्च और गुलामी के दौर के स्मारक के मौजूद हैं। ब्रिटिश कालीन दिल्ली में संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया, विक्टोरिया टर्मिनल, कोलकाता मैं विक्टोरिया  मेमोरियल, अंडमान में सेलुलर जेल सहित अनेक भवन हमें अपमान बोध नहीं करवाते, नहीं उन्हें देखकर गुलामी के दौर का दंश चुभता है । हमें केवल मुगल काल ही दुखी करता है , क्योंकि इसके माध्यम से समाज के एक धार्मिक समूह को टारगेट बनाकर सत्ता पर काबिज रहने का फार्मूला तलाश लिया गया है।
 *ये मस्जिदें हैं निशाने पर*
             मुस्लिम घ्रणा से पीड़ित संगठनों ने अनंत काल तक सत्ता में बने रहने की योजना के तहत जिंस रचनाओं के स्वरूप को बदलना प्रचारित किया है उस सूची में बाबरी मस्जिद के बाद  मथुरा की ईदगाह मस्जिद भी है। तत्पश्चात सोशल मीडिया डोमेन पर जो सूची दी गई है उसमें वाराणसी में ज्ञानवापी आलमगीर मस्जिद, मध्य प्रदेश के धार में कमाल मौला मस्जिद, विदिशा में बीजा मंडल मस्जिद, दिल्ली में कुवातुल इस्लाम मस्जिद, बंगाल के मालदा में अदीना मस्जिद, अजमेर में आधे दिन का झोपड़ा, सिद्धपुर में जामा मस्जिद, श्रीनगर में खानकाहए मौला,अहमदाबाद में जामा मस्जिद प्रमुख हैं ।
*यह कहता है कानून*              1991 नरसिम्हा राव सरकार ने प्लेस ऑफ़ वरशिप एक्ट पारित कर तय किया था कि 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के समय धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप था उसे बदला नहीं जा सकता। इस एक्ट से राम जन्म भूमि विवाद को अलग रखा गया था। वर्तमान भाजपा सरकार जिसके पास संसद में पर्याप्त बहुमत है वह चाहे तो इस एक्ट को बदल सकती है। लेकिन वे इन संरचनाओं को चुनावी मुद्दा बनाए रखना चाहते हैं, ताकि सांप्रदायिक राजनीति को माध्यम बनाकर पुनः सत्ता प्राप्त की जा सके। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि 9 दिसंबर 2021 को दिल्ली की एक अदालत ने उस अर्जी को खारिज कर दिया था जिसमें दावा किया गया था कि कुतुब मीनार परिसर मैं बनी मस्जिद हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़ कर बनाई गई है। सिविल जज नेहा शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि  *अतीत की गलतियां वर्तमान में शांति भंग का आधार नहीं बन सकती…* विचार कीजिएगा।
 हरनाम सिंह

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