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कठोरतम कानूनी कदम उठाए बिना नफरती भाषण नहीं रुक सकते

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,मुनेश त्यागी 

       आजकल हमारे देश में नफरती भाषण देने और नफरती बोल बोलने की बाढ़ सी आई हुई है। जिधर देखो उधर नफरती बोल और नफरती भाषण हावी होते जा रहे हैं। अभी फिलहाल में देश में तीन जगह नफरती भाषण बोलकर राज्यों में शांति और व्यवस्था भंग की कोशिश की गई है।      

        पहला उदाहरण कर्नाटक का है जहां पर एक डीएमके सदस्य ने ब्राह्मणों के जनसंहार की बात की है। दूसरी घटना महाराष्ट्र की है जहां पर कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा नफरत और हिंसा की बात कही गई है। तीसरा उदाहरण केरल का है, जहां पर एक टीनेजर ने कहां है कि हिंदू और ईसाई या तो राज छोड़ दें अन्यथा शमशान में जाने की तैयारी कर लें।

      इस प्रकार हम देख रहे हैं कि भारत के विभिन्न राज्यों में नफरती भाषण देने वालों का तांता लगा हुआ है और ये कानून विरोधी हरकतें रुक नहीं रही हैं। यहां पर हम यह भी देख रहे हैं कि जिन जिन राज्यों में ये नफरती भाषण देकर राज्य में शांति और व्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई गई है, वहां की लगभग सभी सरकारों ने हिंसक और सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाले लोगों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की है। इनके खिलाफ कोई f.i.r. नहीं की गई है और इनके खिलाफ शांति और सद्भाव बिगाड़ने का कोई केस दर्ज नहीं किया गया है, जिस कारण इन लोगों के हौसले बढ़े हुए हैं और ये जब चाहे तब नफरती बोल बोल कर समाज में हिंसा और अव्यवस्था का माहौल बनाते रहते हैं।

      ऐसे नफरती भाषण बोलकर ये लोग अपने समर्थकों का हौसला अफजाई करते रहते हैं। यही कारण है कि सरकार की निष्क्रियता का फायदा उठाकर, लगभग सारे भारत में नफ़रत और हिंसा का माहौल बना हुआ है। इस बारे में भारत का सर्वोच्च न्यायालय कई महीने पहले भी आदेश पारित कर चुका है कि नफरती बोल बोलने वालों और नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ शासन-प्रशासन बिना किसी व्यक्तिगत एफ आई आर दर्ज किए ही, अपने आप कार्यवाही करें। उनके खिलाफ f.i.r. करें और केस दर्ज करें और उन्हें  सख्त से सख्त सजा दिलवायें।

      सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि यह हमारा स्टैंडिंग ऑर्डर है, इसके लिए कोई व्यक्तिगत f.i.r. की जानी जरूरी नहीं है। बेहद अफसोसजनक बात है कि सम्बन्धित राज्य सरकारों ने इस आदेश की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। इसी वजह से लोग आए दिन नफरती बोल बोलते रहते हैं। यही हाल फिलहाल महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल का है। वहां की सरकारों ने भी नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की है। यह सब एकदम अफसोसजनक स्थिति है।

      इन सब बातों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि है कि “क्या राज्य एक नपुंसक और शक्ति विहीन संस्था बन गई है? जिस कारण नफरती बोल बोलने की घटनाएं बढ़ती ही जा रही है। वह नफरत फैलाने वालों के खिलाफ समय से कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है? सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि जब तक धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जाएगा, तब तक इस समाज विरोधी, देशविरोधी, संविधान विरोधी और कानून के शासन विरोधी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।”

       भारत के प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और जनवादी जन संगठन बहुत समय पहले से ही मांग करते आ रहे हैं कि धर्म को राजनीति से अलग किया जाए, मगर इस बारे में केंद्र सरकार और लगभग सारी राज्य सरकारों ने कोई कार्यवाही नहीं की है। वे धर्म और राजनीति के घालमेल को नहीं रोक पाई हैं। इसी वजह से भारत में कानून के शासन और संविधान के उद्देश्यों की अवहेलना की जा रही है, उनको मिट्टी में मिला जा रहा है।

      अब पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है। अब समय आ गया है कि नफरती बोल बोलने वालों और नफरत भरे भाषण देने वालों के खिलाफ तुरंत से तुरंत कार्रवाई की जाए। इन्हें जेल भेज दिया जाए और हमारा सुझाव है कि नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ, चुनाव लड़ने की, वोट देने की और सरकारी नौकरियां प्राप्त करने की पाबंदी एवं प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

     यह भी एक जीती जागती हकीकत है कि कुछ साम्प्रदायिक दल, धर्म और राजनीति को मिलाकर अपनी रोटी सेक रहे हैं। वे इसी के आधार पर सत्ता में बने हुए हैं और सत्ता में बने रहना चाहते हैं। इन दलों और संगठनों का नफरती बोल बोलने वालों से नाभि नाल का रिश्ता है। ये लोग और इस तरह की सरकारें, इन लोगों को नफरती बोल बोलने से नहीं रोक सकतीं, क्योंकि जिस दिन ये साम्प्रदायिक ताकतें इन नफरती बोल बोलने वालों को रोक देंगी और इन्हें तरजीह देना बंद कर देंगी, तो उनका नफरती अभियान खत्म हो जाएगा, उनकी सांप्रदायिक जहर फैलाने की राजनीति मर जाएगी, उनकी स्वाभाविक मौत हो जाएगी और वे सांप्रदायिक आधार पर वोट हासिल नहीं कर सकती, इसीलिए साम्प्रदायिक सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए नफरती बोल बोलने वालों को खुली छूट दे रही हैं और इन समाज विरोधी और देश विरोधी ताकतों के खिलाफ समय से कोई सख्त कानूनी कार्यवाही नहीं कर रही हैं।

      जब तक सरकारें जागरूक होकर नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ, सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं करेंगी, जिनके खिलाफ एफ आई आर दर्ज करके, तुरंत सख्त से सख्त कार्यवाही नहीं की जाएगी और इन समाज विरोधी और देशविरोधी ताकतों को सख्त से सख्त सजा देकर जेल के अंदर नहीं भेजा जाएगा, तब तक हमारे देश में नफरती बोल बोलने वाले, और नफरती भाषण देने से बाज नहीं आएंगे।

        हम यह भी सुझाव देंगे कि तमाम तरह के सांप्रदायिक नफरती भाषण देने वाले समस्त संगठनों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इन्हें चुनाव लड़ने से और इन लोगों को वोट डालने से रोक देना चाहिए और इनका सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए  और इन जन विरोधी और देश विरोधी ताकतों पर कम से कम ₹500000 महीने का आर्थिक दंड लगाया जाना चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय को एक कमेटी बनानी चाहिए जो भारत में नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ निगाह रखेगी और इन पर समुचित कार्यवाही करने की राज्य सरकारों की निगरानी करेगी, तभी जाकर इन नफरती बोल बोलने वालों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।

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