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भय और हीनताबोध से उपजी नफरत

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– अभिषेक अंशु.

संघ परिवार और मौजूदा सरकार की नेहरू से नफरत भय और हीनताबोध के कारण पैदा हुई है। एक तरफ नेहरू का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के लिये प्रतिबद्धता संघ परिवार की प्रतिक्रियावादी, कट्टरपंथी, मध्ययुगीन सोच को आक्रांत करती है। उन्हें डर लगता है कि जनता के भीतर अगर नेहरूवादी मूल्य जाग गये तो उनकी घृणा पर आधारित विचारधारा का मरण निश्चित है।      

         दूसरी तरफ एक महान् स्वतंत्रता सेनानी व आजाद भारत के निर्माता के तौर पर नेहरू के समक्ष विरासत-विहीन संघ परिवार हीनभावना एवं कुंठा से ग्रस्त हो जाता है। वे यह बात देखकर कुंठित हो जाते हैं कि जब नेहरू अंग्रेजी राज के खिलाफ लड़ाई के नायक बने हुए थे, तब इनके गोलवलकर, सावरकर, दीनदयाल, श्यामाप्रसाद इत्यादि अंग्रेजों से सांठगांठ में लीन थे। जब देश में लाखों लोग स्वतंत्रता आंदोलन के लिये सर्वस्व न्यौछावर कर रहे थे तब इनके कथित नायक इनाम-इकराम बटोर रहे थे। वहीं आजाद भारत को नेहरू ने जिसतरह से आगे बढ़ाया व समर्थ बनाया वह इतिहास भी इन्हें हीनभावना से भर देता है। 

             यही भय एवं हीनभावना पिछले 7 साल के सत्ताकाल में लगातार नेहरू और उनकी विरासत के प्रति नफरत के रूप में लगातार छलकती रही है। नेहरू के चित्र को जगह न देना उसी की एक कड़ी है। हालांकि इतिहास बताता है कि इस तरह की छिछोरी व घटिया हरकतों से आप नेहरू को खत्म नहीं कर सकते।

               मगर, सबसे ज्यादा आपत्तिजनक ये है कि इन स्वाधीनता सेनानियों व राष्ट्रीय नायकों के बीच 6 बार माफी मांगकर जेल से बाहर आने वाले और 60 रुपया मासिक पैंशन लेने वाले सावरकर क्या कर रहे हैं? महान् क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के बगल में सावरकर की तस्वीर शोभा नहीं दे रही।                                          – अभिषेक अंशु.

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