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वो आरही है पुनः..अब वापस मुँह पर मास्क लगाना पड़ सकता है

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शशिकांत गुप्ते

पुनः दस्तक दे रही है। कहीं कहीं आहट भी सुनाई दे रही है।
कुछ दिनों के लिए मुँह खोलने दिया है। अब वापस मुँह पर मास्क लगाना पड़ सकता है।
यह महामारी भी बहुत अजीब है,जो दूसरों लोग इस बीमारी से विरोधियों को डरातें हैं,उन्हें यह महामारी बक्श देती है। विरोधियों को ख़ौफजदा रखती है।
एक कहावत है,अभिषाप और वरदान समानांतर चलतें हैं।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सडकों पर और मंदिरों और आराधना स्थलों पर देखने को मिलता है।दानवीर उदारमना धर्मीक स्थलों पर भिखारियों को मुक्तहस्त से भिक्षा दान करतें हैं। आलोचक इसे भिखारियों को भीख मांगने के लिए प्रोत्साहित मतलब
(Encourage) करना कहतें हैं। दानवीर उक्त कार्य को पुण्य का कार्य समझतें हैं।
हमारी सरकार भी बड़े गर्व से कहती है कि, देश के तकरीबन अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन बाँटा जा रहा है। एक बात ध्यान में रखना अनिवार्य है, सरकार मुफ्त दे रही है,मतलब अस्सी करोड़ लोगों को भिखारी नहीं समझ रही है?
पशुप्रेमी सड़को पर स्वच्छंद रूप विचरण करने वालें श्वानों को बिस्कुट ख़िलातें हैं, दूध पिलातें है, और पुण्य कमातें हैं।
यही श्वान पैदल चलने वाले राहगीरों पर लपकतें हैं, उन्हें लबुरतें काटतें हैं। यही गली के श्वान दो पहिया वाहन चालकों पर भी लपकतें हैं।
यह दृश्य देखकर लगता है,जिन लोगों को श्वान क्षतिग्रस्त करतें हैं, उन लोगों को निश्चित ही उनके पूर्व जन्म के पापों की सज़ा मिल रही है। पशुप्रेमियों को पुण्य मिलता है इसमें कोई संदेह नहीं है।
महामारी के दौरान सड़को पर घूमने वाले श्वानों को देखकर एक बात स्पष्टरूप से समझ में आ गई कि, सड़कों पर स्वच्छंद रूप से भ्रमण करने वाले श्वानों पर महामारी का कोई असर नहीं होता है।
मेरे इस व्यंग्य लेख पर सीतारामजी ने कहा श्वानों पर मतलब कुत्तों पर व्यंग्य लिखने के पहले यह समझना जरूरी है कि,कुत्ता वफादार प्राणी होता है।
लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि,किसी वफादार को कुत्ता कह नहीं सकते हो? ध्यान में रखना।
सभी प्राणियों में कुत्ता ही एकमात्र प्राणी है, जिसे धर्मराज युधिष्ठिर के साथ स्वर्ग जाने का अवसर प्राप्त हुआ था। इसीलिए सड़कों भृमण करने वाले श्वानों को खिलाने पिलाने से पुण्य निश्चित ही मिलता होगा?
बहरहाल मुद्दा यह है कि, महामारी पुनः दस्तक दे रही है। सम्भवतः यह दस्तक नवंबर 2023 तक या तबतक सुनाई देगी,या जबतक किसी प्रान्त के विधानसभा के चुनावों की घोषणा नहीं होती है। ऐसा कुछ विरोधियों का मत है।
विरोधियों की सुनता कौन है?
चुनावी रैलियों से महामारी डरती है। कारण महामारी भी जानती है कि, चुनावों में सफलता प्राप्त होंने के बाद ही तो सबका साथ होगा,सबका विकास होगा, और सबका विश्वास अर्जित किया जाएगा। अच्छेदिन आएंगे। पिछले आठ वर्ष और सात माह से अच्छेदिन ही तो आ रहें हैं।
लोगों की सहनशीलता कितनी बढ़ गई है।
महामारी के दौरान यात्रा नहीं करना चाहिए। हाँ अंग्रेजी में Suffer करने के लिए तो देश का आम आदमी अभिषप्त ही तो है।
एक बात स्पष्ट करना जरूरी है। आम आदमी मतलब वह दिल्ली और पंजाब में जो झाडू वाला आम आदमी है वह नहीं।
कारण वह तो सिर्फ कहने को आम है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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