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बाल दिवस पर दिल को झकझोर देने वाली एक कविता

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इस दुनिया में मजूरों, किसानों, नाईयों और घस्यारिनों के लिए कोई जगह नहीं है ! 

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प्यारे बच्चों !,

किसान के बच्चों ने 

किताब का पहला पन्ना 

खोला …!,

देर तक किताबों में ढूँढ़ा ..!

अपने पिता को …!

मिस्त्री का बच्चा 

ढूँढ़ता रहा 

मिस्त्री किताबों में ….!

दुनिया के सबसे बड़े महलों 

मीनारों का इतिहास 

पढ़ता हुआ …!

घस्यारिन के बच्चे 

घस्यारिने ढूँढ़ते रहे …..

पहाड़ों के बारे में पढ़ते हुए 

किताबों में 

नाई की बच्ची 

ढूँढ़ती रही 

क़ैंची से निकलती …..!

गौरैया-सी आवाज़ के साथ 

अपने पिता को 

किताबों में …!

सफ़ाईकर्मी 

का बच्चा ढूँढ़ता रहा 

एक साफ़-सुथरी बात 

कि उसका पिता क्यों नहीं है किताबों में …!

कौन इन्हें बताए 

यह दुनिया केवल 

डॉक्टर, इंजीनियर, मास्टर, प्रोफ़ेसरों की है …!

तहसीलदार, ज़िलाधीशों की है …!

इसमें मजूरों, किसानों, 

नाई और घस्यारिनों की कोई जगह नहीं …

मेरे प्यारे बच्चों !, 

ये किताबें बदलनी हैं तुम्हें !

        साभार -सुप्रसिद्ध कवि अनिल कार्की,पीपलतड़ (मुवानी ) गाँव, पिथौरागढ़, उत्तराखण्ड,

        प्रस्तुतकर्ता – श्री सीएम प्रसाद जी, लखनऊ, संपर्क – 94151 50487

        संकलन -निर्मल कुमार शर्मा गाजियाबाद उप्र संपर्क -9910629632

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