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मूर्ख स्त्रियों को मेरा नमस्कार

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प्रखर अरोड़ा

आधुनिक भौतिकवादी सभ्यता के प्रभाव से समाचार पत्रों में जो वैवाहिक विज्ञापन निकलते हैं, उनमें अंगमापकता होती है। वक्ष का घेरा, कटि की परिधि कटिप्रोथ का परिमाप, नख से शिर तक की लम्बाई तथा सम्पूर्ण देह का भार परिमाण को ध्यान में रखकर जो विवाह किया जाता है.

       यह सब उस समय चरमरा जाता है जब स्तन लटकने एवं शुष्क होने लगते हैं, कमर झुक जाती वा वातग्रस्त होती है, नितम्ब निष्पन्द हो जाता है, मुखमण्डल विवर्णता को प्राप्त होता है।

     शारीरिक सौष्ठव को वरीयता देने वाले पछताते हैं। मानसिक सौन्दर्य को श्रेष्ठ समझ कर उसका सम्मान करने वाले कभी भी पश्चाताप नहीं करते। विवाह केवल शरीर से नहीं मन और शरीर दोनों से करना चाहिये। मन से धर्म और शरीर से कर्म को करता हुआ गृहस्थ कृतकत्य होता है।

*मूलतः दो प्रकार की पत्नियां :*

 १. धर्म पत्नी 

   जिस स्त्री के साथ गाँठ जोड़ कर पुरुष अग्नि को साक्षी रखकर उसके सात फेरे करता है, वह उसकी धर्म पत्नी है। धार्मिक कर्मकाण्डों में पुरुष इसे अपने दाहिने पार्श्व में बैठा कर यज्ञादि कर्म करता है तथा एकान्त में इसे अपने वामपार्श्व में करके उससे रतिवार्तादि करता है। 

२. भोग पत्नी

    जिस स्त्री को पुरुष अपनी काम पिपासा की पूर्ति के लिये अपनी अंकशायिनी बनाता है, वह उसकी भोग पत्नी है। इसके साथ अग्नि को साक्षी रखकर विवाह करना आवश्यक नहीं है।

     भोग पत्नों को रखैल कहा जाता है। धनाढ्य लोगों के पास रखैलों की कमी नहीं होती।

भोजपुरी में एक कहावत है :

 दाल भात पर चटनी.

   मेहरारू पर रखनी.

जैसे दाल भात के साथ स्वाद हेतु चटनी का स्वाद लिया जाता है, वैसे धर्म पत्नी के साथ रखैल होने से गृहस्थ जीवन स्वादिष्ट हो जाता है।

 जो गृहस्थ अपनी धर्म पत्नी को तुष्ट न करते हुए भोग पत्नी का वरण करता है, उसका गृहस्थ जीवन नरक बन जाता है। सर्वत्र ऐसे उदाहरण विद्यमान हैं।

     जहाँ पुरुष की तरह स्त्री भी अपना जार रखती है, वहाँ झगड़ा तो नहीं होता किन्तु कुटुम्ब परंपरा नष्ट हो जाती है। इसलिये पुरुष, नारी की स्वतन्त्रता / स्वच्छन्दता पर अंकुश लगाता है। स्त्री, स्वभाव एवं परिस्थितिवश इसे तोड़ती रहती है।

       स्त्रियाँ पुरुष को आकर्षित करने के लिये कृत्रिम श्रृंगार करती हैं। ऐसा श्रृंगार प्राकृतिक पृष्ठभूमि में होने से अच्छा है। ढलते हुए यौवन से चिन्तित स्त्रियाँ कृत्रिम सजधज से अपने को सुन्दर रूप में प्रस्तुत करने की आकांक्षी होती हैं।

     श्वेत होते हुए केशों पर रसायन पोत कर काला करना, आंखों में काजल भर कर उन्हें निखारना, मुरझाते हुए अधारों पर लाल रंग की पर्त चढ़ाना, नाखूनों की कुरूपता को रक्तिम रसायन से ढकना, मलिन कपोलों को रसायन के प्रयोग से आरक्त करना, दुर्गन्धित देह पर सुगन्धित द्रव्यों का लेप करना, स्त्रियों के बाह्य श्रृंगार हैं। 

भीतर के श्रृंगार के बिना बाहर का श्रृंगार व्यर्थ है। हृदय में छल-कपट का कूड़ाकर्कट भरा है और से वस्त्राभूषण की सजावट है तो परिणाम शुभ एवं सुखद कभी नहीं रहेगा।

      शूर्पणखा सजधज कर बाहर राम को लुभाने / प्राप्त करने आयी थी, नाक, कान और चुचूक कटवा कर गई। राम हृदय के श्रृंगार पर मुग्ध होते हैं, शरीर के बाह्य श्रृंगार से नहीं। हृदय का सौन्दर्य है, श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, समर्पण, सरलता एवं सत्यनिष्ठा।

      पूतना श्रृंगार करके कृष्ण को दूध पिलाने गई थी। उसके भीतर कपट था, बुद्धि दूषित थी, प्रेम का अभाव था। फलस्वरूप मृत्यु को प्राप्त हुई जो स्त्री शूर्पणखा एवं पूतना बनेगी, उसकी मनोभिलाषा पूर्ण नहीं होगी। ऐसी हतकामा को मैं नमस्कार करता हूँ।

        सुन्दर विचार, सुन्दर आचार, सुन्दर भाव, सुन्दर बुद्धि का होना ही वास्तविक श्रृंगार है।

      मूर्ख स्त्रियाँ शूर्पणखा एवं पूतना बनती हैं। शूर्पवत् नख हैं जिसके, वह सूप समान लम्बे तीक्ष्ण नखों को धारण करने वाली ललना शूर्पणखा (सूपनखा है। राक्षसी सभ्यता के प्रचार प्रसार के परिणामस्वरूप इनकी संख्या बढ़ती जा रही है।

        सूप के समान नाखूनों से रति समर में शस्त्र का काम लेने वाली ये ललनाएँ पुरुष को नखक्षत से उत्तेजित कर, केलियुद्ध का सुख लूटती हैं.

    ये पूतनाएँ शिशुओं को स्तनपान से वञ्चित कर, पुरुषों को काम युयुत्सु करने के लिये उसे पुष्ट एवं उठा हुआ प्रदर्शित करती हैं। इन मूर्खाओं को मैं नमस्कार करता हूँ।

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