शैलेश
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2023 में भारत में प्रतिदिन 8 लोगों ने बेरोजगारी के कारण आत्महत्या किया और काम की परिस्थितियों के दबाव और तनाव के कारण प्रतिदिन 5 लोगों ने आत्महत्या की।
केवल बेरोजगारी और कार्यस्थल के तनाव के कारण 2023 में कुल 4991 लोगों ने आत्महत्या की। 2023 की कुल आत्महत्याओं का 3% केवल इन्हीं दो कारणों से थीं। 2019 से 2023 के बीच, चार साल में केवल इन्हीं दो कारणों के चलते 26000 से ज्यादा आत्महत्याएं हुईं।
2016 में नोटबंदी के विवेकहीन निर्णय ने एकाएक जैसे देश की आर्थिक गतिविधियों की कमर ही तोड़ दी थी। रही-सही कमी को कोविड-19 और लॉकडाउन ने पूरा कर दिया। श्रम-बाजार की खतरनाक उथल-पुथल, 2020-21 में भारी संख्या में औद्योगिक और विनिर्माण गतिविधियों का ठप हो जाना, और बाद में इनमें सुधार की धीमी रफ्तार ने लोगों के जीवन पर बहुत दुष्प्रभाव डाला है। यहां तक कि कोविड-19 के बाद आर्थिक गतिविधियों के फिर से पटरी पर आ जाने के बावजूद इन आत्महत्याओं में कमी नहीं आयी।
आर्थिक तनाव और अनिश्चितता की हत्यारी स्थितियां हमारे देश में कितनी बड़ी संख्या में लोगों की जिन्दग़ियां लील रही हैं, ये आंकड़े तो महज उसका एक नमूना भर हैं, क्योंकि ऐसी असंख्य घटनाएं तो कभी दर्ज भी नहीं हो पाती हैं।
हमारे इस देश में एक ही साथ असंख्य देश निवास कर रहे हैं। दुखद तो यह है कि हर एक अपने-अपने संघर्षों में अकेला डूब उतरा रहा है। किसी को न दूसरे के संघर्ष का बोध है, न उससे सहानुभूति, न ही उसके साथ एकता का कोई भाव।
सत्ताधारी वर्ग यही तो चाहता है, कि लोग अपनी समस्याओं का कारण खुद को समझें और खुद को दोषी मानकर खुद को ही नुकसान पहुंचाते रहें। वे कारणों की तलाश न तो परिस्थितियों में करें, न तो इन परिस्थितियों को तैयार करने वाली व्यवस्था में; और व्यवस्था को संचालित करने वाले लोग व्यवस्था के लाभों को आपस में मिल-बांटकर खाते रहें।
दरअसल कोई भी आत्महत्या, आत्महत्या नहीं होती। सारी आत्महत्याएं अंततः हत्याएं होती हैं। हमारे देश में संपदा की ग़ैर-बराबरी का हाल यह है कि देश की 77% संपदा शीर्ष 10% लोगों के पास है, और ऊपर के 1% लोगों के हाथों में देश की 53% संपदा केंद्रित हो चुकी है। जबकि नीचे के 50% लोगों के हिस्से में मात्र 4.1% संपदा है।
इसी तरह से आय की ग़ैरबराबरी का आलम यह है कि हर साल देश की 57% आय ऊपर के मात्र 10% लोगों के हाथों में जा रही है, और देश की 22% आय ऊपर के मात्र 1% लोगों के हाथों में जा रही है। इसके उलट, नीचे के 50% लोगों के हाथों में मात्र 13% आय जा रही है। भारत की शीर्ष 1% आबादी नीचे की 50% आबादी से 75 गुना ज़्यादा कमाती है। सबसे अमीर 0.001% आबादी सबसे गरीब 50% आबादी से 2800 गुना ज़्यादा कमा रही है।
तो कम से कम इतना तो जरूर होना चाहिए था कि ज्यादा संपदा और ज्यादा आमदनी वाले ऊपरी अमीर लोग ज्यादा टैक्स भरते, लेकिन सच्चाई इसके उलट है। टैक्स का बोझ भी ग़रीबों पर ही ज्यादा है। नीचे की 50% आबादी कुल जीएसटी का 64% चुका रही है, और शीर्ष 10% लोग मात्र 4% जीएसटी चुका रहे हैं।
महंगी चिकित्सा की मार ग़रीबों पर सबसे ज्यादा पड़ रही है। इसके कारण हर साल 6.3 करोड़ नये लोग ग़रीबी में धकेले जा रहै हैं। हर सेकेंड दो नये आदमी ग़रीबी की दलदल में धंसते जा रहे हैं।
इसके नतीजे में 2023 में 74% भारतीय स्वस्थ भोजन से महरूम रहे, और 39% लोग पोषणयुक्त भोजन से महरूम रहे।
विश्व भूख सूचकांक में भारत 127 देशों की सूची में 105 वें स्थान पर है। यह ‘गंभीर’ श्रेणी है। भारत में 13.7% बच्चे कुपोषित हैं, 35.5% बच्चे अपनी उम्र के लिहाज से छोटे क़द के हैं और क़द के हिसाब से कम वजन वाले, दुर्बलता-ग्रस्त बच्चों का प्रतिशत 18.7 है। बच्चों में 5 वर्ष की उम्र से पहले मृत्युदर 2.9% है।
तो ऐसी हालात में खुद जीवित रहने और अपने परिवार को जीवित रखने के लिए रोजगार की अहमियत को समझा जा सकता है, और रोजगार हासिल करने के संघर्ष में टूटे हुए इंसान के आत्महत्या का विकल्प चुनने की बेबसी को भी समझा जा सकता है। कॉरपोरेट पूंजी के हित में चलायी जा रही सरकारों ने श्रम क़ानूनों को लगातार कमजोर किया है। काम के बढ़े हुए घंटे, इनकी तुलना में कम आमदनी, कम अवकाश, निर्मम प्रबंधतंत्र और निरंतर अपमान और दुत्कार की परिस्थितियां मजदूरों के लिए कार्यस्थल को हमेशा तनावपूर्ण बनाये रखती हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि हमारे देश में प्रतिदिन 13 लोग केवल इन्हीं कारणों से मौत को गले लगा लेते हैं।
रघुवीर सहाय की पंक्तियां याद आती हैं :
फिर जाड़ा आया फिर गर्मी आई
फिर आदमियों के,
पाले से, लू से मरने की खबर आई
न जाड़ा ज्यादा था न लू ज्यादा
तब कैसे मरे आदमी?
वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते,
मर जाते हैं तब लोग जाड़े और लू की मौत बताते हैं।

