प्रस्तुति : डॉ. प्रिया
_करीब दस दिन पहले पढ़ने को मिला कि हेमोफिलिआ-बी के नए इलाज को अमेरिका के फ़ूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) की स्वीकृति मिल गयी. हेमोफिलिआ का स्थायी इलाज एक क्रांतिकारी खबर है._
लेकिन मेरी उत्सुकता जगने का कारण था इसका विश्व का सबसे महँगा इलाज बताया जाना. नयी दवा के निर्माता, सीएसएल बेहरिंग ने इलाज की कीमत 3.5 मिलियन डॉलर रखी है – यानी कोई 28.35 करोड़ रूपये!
हेमोफिलिआ एक अनुवांशिक रोग है. यह हमारे जीन से आता है और इसकी नयी, महंगी दवा ‘हेमजेनिक्स’ इसका इलाज जीन के स्तर पर ही करती है. हेमजेनिक्स के पहले विश्व की सबसे महंगी दवा का खिताब ‘ज़ोलगेस्मा’ को हासिल था जिसे तीन साल पहले एफडीए ने रीढ़ की मांसपेशियों के संकुचन के लिए स्वीकृत किया था.
ज़ोलगेस्मा भी, जिससे इलाज का खर्च सत्रह करोड़ रुपये से कुछ अधिक आता है, जीन के स्तर पर इलाज करता है.
*क्या है हेमोफिलिआ :*
इस बीमारी में रक्त के थक्के (क्लॉट) नहीं बनते हैं या बहुत कम और बहुत धीमी गति में बनते हैं जिसके चलते रक्तस्राव (ब्लीडिंग) बहुत देर तक नहीं रुकता, कभी कभी बिलकुल नहीं रुकता और रोगी के प्राण बस रक्तस्राव से चले जाते हैं. रक्त में थक्के कुछ विशेष प्रोटीन के चलते बनते हैं, उन्हें क्लॉटिंग फैक्टर्स कहा जाता है.
हेमोफिलिआ के रोगियों में फैक्टर-8 या फैक्टर-9 नहीं होते या कम होते हैं. इन फैक्टर्स के आधार पर हेमोफिलिआ रोग दो किस्म का होता है, जिनमे फैक्टर-8 की कमी होती है उनके रोग को हेमोफिलिआ-ए कहा जाता है और जिनमे फैक्टर-9 की कमी होती है उनके रोग को हेमोफिलिआ-बी.
*हेमोफिलिआ के कारण :*
यह एक अनुवांशिक रोग है और इसके कारण जीन में हैं. हमारी कोशिकाओं (सेल्स) के नाभिक (न्यूक्लियस) में धागे के समान कुछ बहुत लम्बे अणु (मॉलिक्यूल्स) रहते हैं जिन्हे डीएनए कहा जाता है.
डीएनए पर ही हमारे जीन रहते हैं. जीन से हमारे अनुवांशिक गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाते हैं.
ये डीएनए जिस संरचना (स्ट्रक्चर) में सिमटे हुए रहते हैं उन्हें क्रोमोज़ोम कहते हैं. क्रोमोज़ोम जोड़े में रहते हैं.
सामान्यतः हर व्यक्ति की कोशिका के नाभिक में 23 जोड़े क्रोमोज़ोम यानी कुल 46 क्रोमोज़ोम रहते हैं – आधे माता से आते हैं, आधे पिता से. दो क्रोमोज़ोम, एक्स और वाई, जिन्हे सेक्स क्रोमोज़ोम कहते हैं, किसी व्यक्ति के लिंग का निर्णय करते हैं. स्त्रियों में दो एक्स क्रोमोज़ोम होते हैं और पुरुषों में एक एक्स और एक वाई.
भ्रूण (एम्ब्र्यो) में माता से एक्स क्रोमोज़ोम आता है और पिता से एक्स या वाई. हेमोफिलिया के सन्दर्भ में यह महत्वपूर्ण है क्योंकि स्त्रियों को अमूमन हेमोफिलिआ नहीं होता.
एक्स क्रोमोज़ोम में अनेक ऐसे जीन होते हैं जो वाई क्रोमोज़ोम में नहीं होते. स्पष्ट है कि नर में एक्स क्रोमोज़ोम के जीन की बस एक प्रति होती है और मादा में दो. हेमोफीलिया जिन प्रोटीन के नहीं बनने से होता है – यानी फैक्टर-8 या फैक्टर-9, उन्हें बनाने की विधि जिस जीन में है वह एक्स क्रोमोसोम में रहते डीएनए में पाया जाता है.
स्त्रियों में दो स्रोत (माता और पिता) से एक्स क्रोमोज़ोम आते हैं इसलिए उनमे हेमोफीलिआ प्रायः नहीं होता है – किसी एक एक्स क्रोमोज़ोम में तो वह जीन रहेगा जिससे फैक्टर्स 8 या 9 बनते हैं.
*हेमोफीलिआ की व्यापकता (प्रेवेलंस) और वर्तमान इलाज :*
हेमोफीलिआ कितना व्यापक है इस पर स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती. अमेरिका का सीडीसी कहता है, 5000 नर जन्मों में एक को हेमोफीलिआ होगा. लेकिन वहीं यह भी कहता है कि 2012-2018 में अमेरिका में सरकारी सहायता पाने वाले केंद्रों में (केवल) बीस से तेतीस हजार पुरुषों का इलाज चल रहा था.
अन्यत्र एक जगह मिलता है, करीब चालीस हजार जन्मों में एक के हेमोफीलिआ-बी से ग्रस्त होने की संभावना है. हेमोफीलिआ-ए अधिक देखा जाता है, बी से कोई चार गुने अधिक. हेमोफीलिआ रोग सभी नस्ली समूहों में देखा जाता है.
हेमोफीलिआ का वर्तमान इलाज है शिराओं (वेंस) द्वारा फैक्टर्स 8 या 9 लेना. दोनों प्रोटीन के संश्लेषित (सिंथेटिक) रूप उपलब्ध हैं. रोगी समय समय पर इन्हे लेते रहते हैं. नए, महंगे इलाज में एक बार दवा ले लेने पर फिर लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
*नया इलाज :*
नया इलाज जीन चिकित्सा पर आधारित है. जीन चिकित्सा में रोग को ठीक करने (या रोग के होने को रोकने) के लिए उससे सम्बद्ध जेनेटिक समस्या को दूर किया जाता है.
यहाँ जेनेटिक समस्या है फैक्टर-9 का शरीर में नहीं बनना क्योंकि फैक्टर-9 अभिव्यक्त (एक्सप्रेस) करने वाले जीन में ऐसे उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) रहते हैं जिनके चलते रक्त के थक्के बनाने वाला यह फैक्टर शरीर में नहीं बनता.
जीन चिकित्सा में चिकित्सक सर्जरी या संक्रमण विरोधी (ऐंटी इन्फेक्टिव) या सूजन सही करने वाली (ऐंटी इंफ्लेमेटरी) आदि दवाओं का सहारा नहीं लेते. कई रोग हमारे जीन में उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) के चलते होते हैं. उत्परिवर्तन के चलते कुछ जरूरी प्रोटीन शरीर में नहीं बनता हैं (जैसे यहाँ क्लॉटिंग फैक्टर्स) या कभी कभी बेकार प्रोटीन बनने लगते हैं जिनसे रोग होते हैं. जीन चिकित्सा का लक्ष्य रहता है ऐसे उत्परिवर्तित जीन को सही कर देना.
नयी दवा हेमजेनिक्स की बस एक खुराक शिराओं के रास्ते से (इंट्रा वेनस) से दी जाती है. हेमजेनिक्स में फैक्टर-9 अभिव्यक्त करने वाला जीन एक वायरस के माध्यम से शरीर में डाला जाता है. वायरस कोशिकाओं के अंदर, नाभिक (न्यूक्लिअस) के अंदर जाते हैं और उनके माध्यम से, याद करें, कोविड के कुछ टीके भी दिए जाते हैं.
ये वायरस अपने ऊपर लादे गए जीन को नाभिक के अंदर पँहुचाते हैं और इस जीन की उपस्थिति से यकृत (लिवर) में फैक्टर 9 बनने लगता है, जो रक्त के साथ पूरे शरीर में उपलब्ध रहता है.
*जीन चिकित्सा- विमर्श :*
जैसा पहले कहा गया है इस चिकित्सा का लक्ष्य रहता है उत्परिवर्तित जीन को सही कर देना. जीन हमारे क्रोमोज़ोम में स्थित डीएनए के भाग रहते हैं. एक डीएनए पर थोड़ी थोड़ी दूर पर अनेक जीन रहते हैं.
जीन चिकित्सा वैसे रोगों के लिए उपयुक्त हो सकती है जो बस किसी एक जीन के उत्परिवर्तन के चलते होते हैं. इसकी शुरुआत होती है उस जीन को पहचानने से जिस के कारण कोई रोग हो रहा है. दोषी जीन को पहचान लेने के बाद उस जीन के सही रूप को सही जगह यानी सही क्रोमोज़ोम में डीएनए में सही जगह पंहुचाना रहता है.
यह काम कठिन है. पिछले तीस वर्षों में दो हजार से अधिक नैदानिक परीक्षण (क्लीनिकल ट्रायल्स) हुए हैं, सफलता बस दसेक को मिली है!
क्रिस्पर विधि से जीन का सम्पादन (एडिटिंग) संभव हो गया है. इस लिए अब जीन चिकित्सा में पूरे जीन को बदलने की जगह वैज्ञानिक किसी जीन के दोषी भाग को बदलने पर भी काम कर रहे हैं.
एक तरीका है रोगी की कोशिकाओं को बाहर निकाल कर उनमे जीन में जैसी जरूरत हो बदलाव लाकर (एडिट कर के) वापस रोगी के शरीर में डालना.
एक और तरीका है सुधारे हुए जीन को वायरस के ऊपर लाद कर कोशिकाओं में डालना. यद्यपि यह तरीका अभी अधिक लोकप्रिय हुआ है दसेक साल पहले इस विधि से जीन के अपने डीएनए में सही जगह नहीं जाने के चलते चार लोगों को ल्यूकेमिया हो गया था – तीन ठीक हुए, एक नहीं हो सका.
*जीन चिकित्सा और अनुवांशिकता :*
क्या जीन चिकित्सा से अनुवांशिक रोग अनुवांशिक नहीं रहेंगे? यह एक समाजशास्त्री प्रश्न है! हमारी कोशिकाएं दो तरह की होती हैं. सामान्य कोशिकाओं के क्रोमोज़ोम में यदि कोई परिवर्तन लाए गए तो वैसे परिवर्तन अनुवांशिक नहीं होते.
वहीँ कुछ ‘जर्मलाइन’ कोशिकाएं होतीं हैं जो नर के शुक्राणु (स्पर्माटोज़ोआ) और मादा के डिम्ब (ओवम) आदि में हैं. जर्मलाइन कोशिकाओं के क्रोमोज़ोम में हुए परिवर्तन अगली पीढ़ी को जा सकते हैं यानी अनुवांशिक हो सकते हैं.
कई विकसित देशों में जर्मलाइन कोशिकाओं में कोई बदलाव लाना कानूनन मना है. उनका विचार है इससे मनुष्य प्रजाति में बदलाव आएगा और इसके क्या खतरे आगे आ सकते हैं इस पर हमारी जानकारी अधूरी है. तो यदि कोई अनुवांशिक रोग जीन चिकित्सा से ठीक हो जाए तो भी रोगी की अगली पीढ़ी को वह रोग हो सकता है.
लेकिन कई देशों में जर्मलाइन कोशिकाओं में भी जीन के स्तर पर बदलाव लाए जा रहे हैं, जैसे चीन. प्रासंगिक है कि पहली जीन चिकित्सा चीन में ही स्वीकृत हुई थी – ब्रेन ट्यूमर के लिए.
*भविष्य :*
भविष्य में निश्चित हीअधिकांश व्याधियों के लिए जीन चिकित्सा उपलब्ध हो जाएगी. जन्म के समय जैसे आज कुछेक जांच अनिवार्य रूप से होने लगी है, मेरा विश्वास है निकट भविष्य में जन्म के समय या शायद भ्रूण (एम्ब्र्यो) के ही जेनेटिक चित्र बनने लगेंगे जिससे यह जाना जा सकेगा कि जातक के किन रोगों से ग्रस्त होने की संभावना है और उनके लिए उचित जीन चिकित्सा भी की जाने लगेगी.
यह सब बहुत महँगा होगा. जहाँ चिकित्सा सरकारी जिम्मेदारी है वहाँ भी यह सुविधा सबों को मिल सकेगी इसमें संदेह है. जहाँ चिकित्सा के खर्च बीमा कंपनी उठाती हैं, चाहे निजी या सरकारी, वहाँ शायद इनके लिए अलग से प्रीमियम होने लगे.
अगले पचास वर्षों में जो बहुत धनी हैं वे सदा स्वस्थ और युवा दिखेंगे. दुनिया में, शायद, ग्रीक मिथकों के समान, दो किस्म के लोग रहेंगे – मर्त्य मानव और अमर देवता.

