हिमांशु जोशी
विदेशों में हिंदी के प्रसार की चर्चा में सबसे पहले बॉलीवुड का नाम आता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असली प्रचारक प्रवासी भारतीय ही हैं।
सिनेमा मनोरंजन का साधन और सहयात्री है, जबकि भाषा को बचाने का श्रेय मंदिरों, सांस्कृतिक आयोजनों और प्रवासी समुदाय के प्रयासों को जाता है।
प्रवासी अनुभव: स्पेन और इंग्लैंड
पिछले तीन दशकों से स्पेन में रहने वाली पूजा अनिल कहती हैं कि स्पेन में जैसा पागलपन मैंने बॉलीवुड हिंदी फ़िल्मों के लिए देखा है, उसकी कोई मिसाल नहीं है। निश्चित ही हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा रोल है हिंदी को दुनिया भर में पहुँचाने में। बचपन में ही बच्चे फ़िल्मों के गाने सुनने लगते हैं तो ज़ाहिर है कि उनकी अपनी हिंदी शब्दावली उन गीतों के बोल (लिरिक्स) के जरिए बनने लगती है। फिर बड़े होते-होते फ़िल्मी संवाद से शब्दकोश बढ़ता चला जाता है। 20-22 साल के होते-होते तो वे हिंदी सिनेमा द्वारा सीखे हुए मुहावरे भी बोलने लगते हैं।
बस अक्सर एक कमी रह जाती है कि वे देवनागरी लिपि में लिख नहीं पाते और पढ़ भी नहीं पाते।
पिछले तीन दशकों से इंग्लैंड के रीडिंग में रह रहे सुनील स्वरूप मैनेजमेंट कंसल्टेंट होने के साथ गायक भी हैं। वह कहते हैं हिंदी सिनेमा यहां काफी लोकप्रिय है। बहुत से बच्चे जो हिंदी नहीं भी बोलते, वे बॉलीवुड के गाने सुनते हैं और गुनगुनाते हैं, इनमें अंग्रेजों के बच्चे भी शामिल हैं।
प्रवासी बनाम बॉलीवुड
अमेरिका में रहने वाले अनुराग शर्मा ‘सेतु’ पत्रिका के संपादक हैं। वह बॉलीवुड और उससे हिंदी के प्रचार-प्रसार पर विस्तार से बात करते हैं। उन्होंने कहा कि जब भी विदेशों में हिंदी के प्रसार की बात होती है, तो सबसे पहले बॉलीवुड का नाम लिया जाता है। यह एक सर्वमान्य धारणा बन चुकी है कि हिंदी फिल्में ही हमारी भाषा को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने का काम कर रही हैं।
जबकि सच यह है कि दुनिया भर में फैले हिंदी भाषी भारतीय प्रवासी ही हिंदी के असली प्रचारक, प्रसारक, प्रयोगकर्ता और संरक्षक हैं। ये लोग भाषा को बचाने के सतत प्रयास करते रहे हैं। यही लोग मंदिर और सांस्कृतिक केंद्रों में संगीत और नृत्य के कार्यक्रम आयोजित करते हैं और मुशायरा व हिंदी कवि सम्मेलनों के लिए भारत से कलाकारों और कवियों को बुलाते हैं। ये आयोजन सीधे तौर पर भाषा से जुड़ने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का काम करते हैं। इनकी तुलना में हिंदी सिनेमा तो बस एक मनोरंजन का साधन है, जो पहले से ही हिंदी जानने वाले लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़े रखता है। बॉलीवुड हिंदी भाषा का प्रचारक नहीं, कुछ हद तक उसका सहयात्री कहा जा सकता है।
ऐतिहासिक संयोग और सिनेमा
अनुराग शर्मा आगे कहते हैं कि हिंदी फिल्मों की पुरानी लोकप्रियता का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, खासकर सोवियत संघ और मध्य पूर्व में। लेकिन यह लोकप्रियता हिंदी फिल्मों के अपने दम पर नहीं, बल्कि उस समय के भू-राजनीतिक संयोगों के कारण थी। जहाँ पश्चिमी देशों की फिल्में उपलब्ध नहीं थीं या उन्हें अश्लील या राजनैतिक-वैचारिक रूप से खतरनाक माना जाता था, वहाँ बॉलीवुड ने उस खाली जगह को एक मुलायम और विचारहीन मनोरंजन से भर दिया।
कालांतर में जैसे ही ये बाज़ार दुनिया के लिए खुले और इनमें हॉलीवुड और अन्य सिनेमा का प्रवेश हुआ, हिंदी फिल्मों का जादू फीका पड़ता गया। आज रूस जैसे देशों में, जहाँ कभी सरकारी प्रायोजन के कारण राज कपूर के गानों की धूम थी, हिंदी फिल्मों के दर्शक न के बराबर हैं। यह साबित करता है कि बॉलीवुड का प्रभाव स्थायी सांस्कृतिक शक्ति नहीं बल्कि तात्कालिक राजनैतिक आवश्यकता और एक ऐतिहासिक संयोग मात्र था, जो समय आने पर क्षीण हो गया।
शिक्षक से शिक्षण बनाम सिनेमा से शिक्षण
अनुराग शर्मा के अनुसार हिंदी सिनेमा ने विदेशियों को हिंदी सिखाई है, यह तर्क भी बहुत सीमित अर्थ रखता है। किसी भी फिल्म को देखकर कुछ शब्द या गाने सीखना एक बात है, लेकिन भाषा सीखना या उसे सीखने की ललक पैदा करना बिलकुल अलग। हॉलीवुड की फिल्में देखकर भी लोग अंग्रेजी के कुछ शब्द सीख लेते हैं, लेकिन इससे कोई यह नहीं कहता कि हॉलीवुड द्वारा संसार ने अंग्रेजी सीखी है।
असल में, विदेश में हिंदी सिखाने का काम शिक्षक और भाषाई संस्थान करते हैं। सिनेमा उनके द्वारा प्रयुक्त एक साधन या उत्प्रेरक हो सकता है, लेकिन भाषा का वास्तविक शिक्षण तो कक्षाओं में ही होता है।

