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सर्वाधिक विभत्स नज़ारा पेश करती हैं हिंदू शादियां

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जूली सचदेवा

     _दुनिया के सबसे विभत्स और जुगुप्सा पैदा करने वाले दृश्यों में से एक होता है पारम्परिक हिन्दू शादियों का नज़ारा !_

       वो घोड़ी पर सहबाला के साथ सूट पर पगड़ी पहने कमर में तलवार बाँधे दूल्हा, सामने वहशियों की तरह नाचते पी के टुन्न दूल्हे के दोस्त और महीनों की तैयारी के बाद  नृत्यकला के जौहर दिखलाती सौ-सौ कुंतल की रंगी-चुनी सजी-धजी आण्टियाँ और कुछ ध्यानाकांक्षी नखरीली कन्याएँ, कानफोडू आर्केस्ट्रा, किनारे-किनारे सिर पर लाइट लादे चलती मज़दूर स्त्रियाँ, ससुर द्वारा दामाद के पाँव धोना, मँड़वा में सात फेरों के समय के घोर स्त्री-विरोधी मंत्र और कन्यादान जैसी घृणास्पद रस्म, कोहबर, सालियों द्वारा दूल्हे के जूते चुराना, बफैलो सिस्टम में लड़ाकू भैंसों की तरह ठूँसकर खाना, लेन-देन, मोल-तोल, रोना-गाना …

   बाप रे! कितना गिनायें! 

बहुत सारे प्रगतिशील भी बेटे-बेटियों की शादी इन्हीं रस्मों को निबाहते हुए करते हैं और भावविह्वल होकर फोटुओं सहित पोस्ट भी डालते हैं।

           उन्हें शर्म नहीं आती ? ग्लानि नहीं होती ? ये कैसे प्रगतिशील हैं जो अपने बच्चों की ऐसी परवरिश भी नहीं कर पाते जो सड़ी गली रूढ़ियों के बंधन तोड़ सकें और अपनी ज़िन्दगी के फ़ैसले ख़ुद कर सकें।

        और आप ज़रा इस विषय पर इनसे बात कीजिए। ये पिनकते हुए आपको ही अव्यावहारिक और अतिरेकी घोषित कर देंगे।

        या फिर कोई पत्नी की ज़िद की, कोई अपने बूढ़े माँ-बाप की भावनाओं की, कोई बिरादरी और समाज के दबाव की दुहाई देने लगेगा। 

दरअसल ये सभी थोथे और बेशर्मी भरे बहाने हैं। ज़िन्दगी में रूढ़ियों से ऐसा कोई विद्रोह नहीं हो सकता जिसमें कुछ अपनों का दिल न दुखाना पड़े, या पारम्परिक समाज का कोप व दबाव न झेलना पड़े। 

       सीधे-सीधे कहिए न कि आप एक कायर, बुजदिल, समझौपरस्त इंसान हैं, पाखंडी नक़ली प्रगतिशील हैं, या फिर मन ही मन ख़ुद ही इन रूढ़ियों और कर्मकाण्डों से भावनात्मक लगाव रखते हैं। {चेतना विकास मिशन}

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