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हिंदुत्व नहीं है सियासत पोषित हिंदुत्व; मानव जीवन का सम्पूर्ण जीवन-दर्शन है हिंदुत्व

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~ ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)

_भारतीय संस्कृति के गर्भ से जिस 'हिन्दुत्व' का जन्म हुआ, वह जीवन-यापन का एक तरीक़ा है जिसके प्रेरणा- स्रोत हैं--व्यक्ति तथा समाज संबंधी वे विचार जिन्हें हिंदुओं ने एक ओर व्यक्ति तथा समाज के संबंधों और दूसरी ओर इहलौकिक और पारलौकिक जीवन को नियमित करने के प्रयास में विकसित किये हैं। सभी प्राणियों में केवल मानव ही विचारशील प्राणी है।_
      केवल मानव ही आदर्श नियमों का निर्माण करता है और केवल मानव ही वर्तमान के आधार पर भूत और भविष्य को एक श्रृंखला में बांधने का प्रयास करता है। आदर्श नियमों द्वारा सामूहिक जीवन का नियमन मानव की ही विशेषता है और इसी विशेषता का परिणाम है कि प्रत्येक काल और स्थान में मानव ने जिस जीवन-दर्शन को विकसित किया, वही सामाजिक पक्ष के साथ "हिंदुत्व" के रूप में वेदों के प्रणेताओं, उपनिषदों के मनीषियों, धर्मशास्त्र के रचयिताओं, स्मृतिकारों और  समय-समय पर होने वाले समाज-सुधारकों ने जिस वैयक्तिक और सामाजिक जीवन-दर्शन को प्रतिपादित किया है, वही "हिन्दुत्व" है।

हिन्दुत्व वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के प्रति एक दृष्टिकोण विशेष है। हिंदुओं ने सामाजिक संगठन से सम्बंधित समस्याओं पर काफी गंभीरता से ध्यान दिया है और मानव जीवन के संगठन को जहां तक हो सका, उत्तम बनाने का प्रयत्न किया है।
इसी प्रयत्न में हिन्दुत्व की आधारभूत धारणाओं और नियमित हिन्दू समाज की प्रणाली की रूपरेखाएं भी विकसित हुई हैं। जीवन-यापन में मानवीय जीवन की आवश्यकताओं, अभिरुचियों, उद्देश्यों और आकाँक्षाओं के समन्वय का प्रयास किया गया है।

समन्वय के दो आधार :
एक इहलौकिक जीवन की आवश्यकताएं तथा दूसरी इस जीवन और जगत से परे जीवन की आवश्यकताएं तथा उद्देश्य। हिन्दू के लिए यह संसार एक रंगमंच है और ‘मानव’ जीवन का एक ‘साधन’ मात्र है–वह साधन जिससे जीवन-स्वातंत्र्य अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शरीरी आवश्यकताओं की पूर्ति जैविक गुण भी है और आवश्यकता भी। “मानवीयता” नितान्त शरीरी आवश्यकताओं की पूर्ति से आगे उठा हुआ एक कदम है, क्योंकि शरीर नश्वर है, अमर है तो केवल ‘आत्मा’।
आत्मा को निरन्तर प्रबुद्ध करते हुए जीवन-स्वातंत्र्य का प्रयास ही “मानवीयता” है।
मानव जीवन केवल शरीरी आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही सीमित नहीं है। मानवीयता निहित है शास्त्र-प्रणीत धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत करने में। मानवीयता की मांग है–मोक्ष और मोक्ष की प्राप्ति होती है ‘धर्म’ से। अतः जीवन ‘धर्म’ से बंधा है।
मोक्ष, जीवन तथा जगत से विमुख होने पर नहीं मिलता। वह मिलता है जीवन को उसकी स्वाभाविक अभिरुचियों के साथ अपनाने में।
इसीलिए धर्म के साथ- साथ जीवन ‘अर्थ’ एवं ‘काम’ से भी बंधा हुआ है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का समन्वय और साधन ‘कर्म’ से होता है। कर्म के माध्यम से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की साधना ‘पुरुषार्थ’ है।

पुरुषार्थ आवश्यक है क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य केवल पुरुष ही बने रहना नहीं है। मानव जीवन का उद्देश्य है–मानवी स्तर से मानवीयता की ओर अग्रसर होना जिसका अर्थ है- पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नरोत्तम होना। इस साधना में व्यक्ति और समाज दोनों आवश्यक हैं।
क्योंकि पुरुष से पुरुषोत्तम बनने की प्रक्रिया में व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। व्यक्ति से समाज की साधना होती है और समाज से व्यक्ति की। व्यक्ति और समाज में किसी प्रकार का विरोध नहीं है, आवश्यक यह है उनके संबंधों का प्रणयन धर्म से हो। समाज के रंगमंच पर व्यक्ति का जीवन एक संक्रमण-प्रक्रिया है।
व्यक्ति अपने गुणों और कर्मों के कारण ही समाज और धर्म से बंधता है और इस कारण पुरुषार्थ की साधना का अर्थ है–गुण और कर्म के अनुसार समाज में धर्म-प्रणीत जीवन को अपनाने का प्रयास करना। भारतीय संस्कृति का यह आधारभूत विचार सम्पूर्ण बांगमय में व्याप्त है। वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, आरण्यकों, संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, नीतिशास्त्रों, पुराणों, नाटकों, काव्यों तथा जन-साहित्य में इसी विचार का समय के अनुसार विकास हुआ है।

   इस प्रकार हिन्दुत्व तथा जीवन के प्रति हिन्दू दृष्टिकोण कुछ धारणाओं में निहित है। ये धारणाएं हैं--धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष (पुरुषार्थ) कर्म, सिद्धांत और वर्णाश्रम व्यवस्था। ये धारणाएं तथा इनमें निहित वैयक्तिक और सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं और उद्देश्य हिन्दुत्व का आधार हैं।
  _इन्हीं धारणाओं ने हिन्दू समाज तथा संस्कृति को उसकी विशेषतायें प्रदान की हैं। युग-युग की आवश्यकताओं के अनुसार इन धारणाओं के संवर्धन और प्रतिपादन में ही हिन्दुत्व का विकास निहित है।_
 राजनीति, ख़ासकर भाजपा और आरएसएस की राजनीति जिस हिंदुत्व क़ो थोप रही है वह हिंदुत्व नहीं, अमानवीयता है : एक तरह से वास्तविक हिंदुत्व की हत्या.
*{चेतना विकास मिशन)*
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