पथिक अक्षत
कश्मीर फाइल्स की रिलीज के समय सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें सिनेमा हॉल में बैठे आदरणीय आडवाणी जी रो रहे थे।
बताया गया कि कश्मीर फाइल्स फ़िल्म देखकर आडवाणी जी भावुक हो गए और रोने लगे।
बाद में स्पष्टीकरण आया कि यह वीडियो पुराना है,आडवाणी जी शिकारा फ़िल्म देखकर भावुक हुए थे और यह वीडियो उसी फ़िल्म के प्रीमियर का है।
आडवाणी जी के रोने के विषय मे सोचता हूँ तो मुझे 1965 का पाकिस्तान युध्द आता है।
जी हाँ 1965 युद्ध के समय आडवाणी जी रोये थे और इसके पीछे बेहद मार्मिक और राष्ट्रवादी कहानी छिपी हुई है जो अमूमन वामपंथी इतिहासकारों द्वारा छिपा ली जाती है।
हुआ यूँ कि सन 65 में पाकिस्तान में कश्मीर पर हमला कर दिया।
अय्यूब और भुट्टो को उम्मीद थी कि कश्मीर की अवाम पाकिस्तान की मदद करेगी और पाकिस्तान कश्मीर का थोड़ा बहुत हिस्सा झटक लेगा।
इस घटना से भारत में राष्ट्रवाद का संचार हो गया।
युवाओं का खून खौल रहा था।
हमारे श्रध्देय तो जन्मजात राष्ट्रवादी थे तो उनका स्पेशिफिक राष्ट्रवाद भी जाग गया।
श्रध्देय आडवाणी जी से बोले-
“मित्र मुझे हीरामण्डी लाहौर जाना है।
वहाँ जाकर पाकिस्तान से बदला लेना चाहता हूँ मैं!”
आडवाणी जी बोले-
“मित्र,पाकिस्तान से बदला लेना है तो कश्मीर जाइये।
हीरामण्डी जाकर किस किस्म का प्रतिशोध लेना चाहते हैं आप?”
श्रध्देय बोले-
“मित्र मुझे उम्मीद है कि हीरामण्डी में अय्यूब या भुट्टो में से कोई न कोई मिल ही जायेगा।
उसको झापड़ मारकर प्रतिशोध लूँगा मैं!”
आडवाणी जी बोले-
“मित्र,आपको पता है कि मेरी शिक्षा दीक्षा लाहौर में ही हुई है।
मुझे आपके साथ लाहौर जाने में कोई गुरेज नही पर इस समय पाकिस्तान का वीजा मिलना लगभग असंभव बात है।”
श्रध्देय ने दो मिनिट चिंतन किया और बोले-
“हीरामण्डी का काचा बादाम न सही तो GB रोड की गुजिया ही सही।
चलो श्रद्धानंद मार्ग चलते हैं वहाँ जाकर प्रतिशोध लूँगा मैं”
आडवाणी जी बोले-
“ये श्रद्धानंद मार्ग क्या कोई धार्मिक स्थल है?
सवा रुपये का प्रसाद खरीद लूँ क्या मैं!”
श्रध्देय बोले-
“हाँ मित्र,बेहद धार्मिक स्थल है।
आप प्रसाद खरीद लीजिये मैं रिक्शा खोजता हूँ।”
आडवाणी जी ने प्रसाद थैली में पैक करवाया और इधर श्रध्देय ने देसी जड़ी बूटी वाला सनन का अंटा फँसाया और दोनों मित्र रिक्शा में सवार हो गए।
रिक्शे में बैठे बैठे श्रध्देय पर सनन का प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगा था।
श्रध्देय सस्ती कविताएं सुनाने लगे थे।
कभी श्रध्देय गुनगुनाते-
“हीरामण्डी जाऊँगा मैं,
काचा बादाम खाऊंगा मैं
राजधर्म निभाउंगा मैं”
तो कभी राष्ट्रवादी कविताएं सुनाने लगते मसलन-
“हम भी हीरामण्डी जाएंगे
सीने पर गोली खाएंगे
और दोस्तों लिपट कर गजरे से हम घर को आएंगे”
फिर रिक्शे ने GB रोड की बदनाम गलियों में प्रवेश किया।
सड़क के दोनों तरफ इमारतों के रोशनदान से लिपी पुती महिलाएं श्रध्देय और आडवाणी जी को अभद्र इशारे कर रही थीं।
यह दृश्य देखकर आडवाणी जी की कंपकंपी छूट गई थी।
आडवाणी जी श्रध्देय से बोले-
“हम तो श्रद्धानंद मार्ग नामक पवित्र जगह जाने वाले थे मित्र।
ये मुझे कहाँ ले आये मित्र?
वापस चलो मित्र अभी 2 महीना पहले ही मेरा विवाह हुआ है कुछ हो गया तो समाज को क्या मुँह दिखाऊंगा मित्र?”
श्रध्देय बोले-
“चुपचाप बैठे रहो!
अपने मित्र पर भरोसा है अथवा नही?”
फिर श्रध्देय ने रिक्शा रुकवाया और आडवाणी जी को लेकर एक इमारत में प्रवेश कर गए।
उस इमारत में मुजरा चल रहा था पर श्रध्देय ने मुजरे पर ध्यान नही दिया और किसी अधेड़ आंटी से भावताव के पश्चात काचा बादाम की तलाश में एक कमरे में प्रवेश कर गए।
आडवाणी जी प्रसाद की थैली लेकर रूम के बाहर बैठे रहे।
तभी कोठे पर पुलिस का छापा पड़ गया।
अफरा तफरी से माहौल अस्त व्यस्त हो गया।
हर तरफ युवक युवती अपने अधोवस्त्र सम्हालकर दौड़ लगा रहे थे।
श्रध्देय रूम के बाहर आये और आडवाणी जी से बोले-
“भाग धन्नो भाग
आज तेरी बसंती की इज्ज़त का सवाल है।”
दोनों मित्र दम लगाकर भागे।
इन दोनों के पीछे पुलिस भी भागी।
पर चूँकि आडवाणी जी का अभी अभी विवाह हुआ था इसलिए उनका स्टेमिना जबाब दे गया और वो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास दबोच लिए गए।
श्रध्देय किसी कोने में छिपने में कामयाब हो गए।
आडवाणी जी पुलिस की गिरफ्त में जार जार रो रहे थे और उनसे छोड़ने की गुहार कर रहे थे।
पुलिस वालों में से एक व्यक्ति आडवाणी जी को पहचान गया तो जहाँ दूसरे लोगों को एक दो रुपये में छोड़ा जा रहा था वहीं आडवाणी जी से चैन अँगूठी की माँग की गई।
लाचार होकर आडवाणी जी ने अपने ससुराल से प्राप्त सोने की चैन और अँगूठी पुलिस वालों को दे दी।
आडवाणी जी की अश्रुधारा रुकने का नाम नही ले रही थी।
वहीँ पास में पान की गुमठी के पास कोने में छिपे हुए श्रध्देय भी ये दृश्य देखकर भावुक हो गए और सजल नेत्रों से अपने मित्र की मिट्टी पलीत होते देखते रहे।
ये सब सोचकर मैं भी भावुक हो गया और सजल नेत्रों से उस मार्मिक दृश्य पर एक अत्यंत मार्मिक और बेहद सस्ती कविता सुनाता हूँ-
“अटल पथिक ओ अटल पथिक
अटल पथिक ओ अटल पथिक
अटल पथिक! सच-सच बतलाना
दीनदयाल के मृत्युशोक से
मधोक रोया या तुम रोये थे?
अटल पथिक! सच सच बतलाना
काँटे तो तुमने बोये थे।
अटल पथिक! सच-सच बतलाना!
अटल पथिक ! सच सच बतलाना!
जी बी रोड के प्रथम भ्रमण में
हुई अचानक पुलिस रेड में
आवारा कामी शोहदे सम
आडवाणी जब धरे गए थे
मित्र का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
अटल पथिक! सच-सच बतलाना
रोया मित्र या तुम रोये थे?”

