अग्नि आलोक

इनका- उनका, सबका दुश्मन एक : जवाहरलाल नेहरू

Share

पुष्पा गुप्ता (महमूदाबाद)

   _इतिहास के तमाम पर्सेप्शंस में से एक यह है कि नेहरू कश्मीर को लेकर ऑबसेशन के शिकार थे. असल में 1947 में भी और उसके बाद भी पश्चिम मानता रहा है कि कश्मीर पर पाकिस्तान का स्वाभाविक अधिकार था और नेहरू के चलते ऐसा नहीं हो पाया. याद कीजिये गिलगिट स्काउट के प्रमुख मेज़र ब्राउन ने 15 अगस्त 1947 को ही गिलगिट में पाकिस्तानी झंडा फहरवा दिया था तो कश्मीर के अनेक ब्रिटिश अधिकारी हरि सिंह पर पाकिस्तान के साथ जाने का दबाव डाल रहे थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र काक ने भी कहा है कि माउंटबेटन चाहते थे कश्मीर पाकिस्तान में जाए._
     इस परसेप्शन का आधार यह है कि पाकिस्तान मुसलमानों का देश था भारत हिन्दुओं का. अम्बेडकर भी कश्मीर घाटी पाकिस्तान को देकर लद्दाख और जम्मू रखना चाहते थे. साफ़ कहा था कि 'यह कश्मीर के मुसलमानों और पाकिस्तान के बीच का मामला है." मुखर्जी सहित दक्षिणपंथ तो यही कह रहा था.
     _कांग्रेस के अन्दर भी बहुत लोग यही मानते थे. गाँधी , मौलाना आज़ाद और नेहरू जैसों का दोष यह था कि वे भारत को हिन्दुओं का देश नहीं, एक सेकुलर देश मानते थे जहाँ सबको रहने का अधिकार है. इसीलिए कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख़ और उनके पीछे खड़े लोग उनके लिए अछूत नहीं थे._

खैर, नेहरू का ऑबसेशन क्या था? उनका दोष यह था कि जब कश्मीर में महाराजा के ख़िलाफ़ आन्दोलन चल रहा था तो उसे मुसलमानों का मामला समझने की जगह उन्होंने समर्थन दिया. वह पहले और इकलौते नेता थे जो बार-बार कश्मीर गए, मुस्लिम कांफ्रेंस को नेशनल कॉन्फ्रेंस में तब्दील कराने में भूमिका निभाई, पंडितों को आन्दोलन का हिस्सा बनने को कहा और कश्मीर छोड़ो आन्दोलन के दौरान शेख़ की गिरफ्तारी के समय प्रतिबन्ध होने के बावजूद गए और गिरफ्तार हुए.


लेकिन कश्मीर को भारत में ज़बरदस्ती शामिल कराने की कोशिश कब की? कश्मीर को जानने वाले जानते होंगे – नया कश्मीर दस्तावेज़, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह बेदी दंपत्ति और फैज़ जैसे वामपंथियों द्वारा बनाया गया था. यह एक समाजवादी मॉडल था जिसमें भूमि सुधार का महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव था. शेख़ ने बार बार कहा था कि भारत के समाजवादी ढाँचे में यह संभव है पाकिस्तान के साथ नहीं. क्या कहते नेहरू? कि भाई तुम मुसलमान हो पाकिस्तान जाओ, भले तुम्हें पता हो कि पंजाबी जमींदार तुम्हारी ज़मीने लूट कर किसानों को तबाह कर देंगे? भले जिन्ना तुम्हारे लोगों से मिलने से मना कर दे? भले कश्मीरी पंडितों को तभी ज़मीन छोडनी पड़े?
खैर 15 अगस्त 1947 से 26 अक्टूबर तक कश्मीर आज़ाद था. महाराजा आज़ाद कश्मीर चाहते थे. जब माउंटबेटन गए तो पेट दर्द का बहाना बनाकर मिले ही नहीं. माउन्टबेटन ने स्पष्ट कहा कि अगर आप पाकिस्तान से मिलना चाहें तो भारतीय नेतृत्व को कोई समस्या नहीं. लेकिन उन्होंने पाकिस्तान से स्टैंडस्टिल समझौता किया, भारत ने मना कर दिया. इस दौर में दोनों तरफ़ से महाराजा को समझाने की कोशिशों का कोई असर नहीं हुआ.

फिर पाकिस्तान ने अपने यहाँ से सप्लाई रोक दी. क़बीलाई हमला हुआ तो महाराजा के पास भारत से सहायता मांगने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. माउंटबेटन ने शर्त रखी कि पहले विलय फिर सहायता. अंततः विलय पत्र पर हस्ताक्षर हुए.
अपनी किताब (कश्मीरनामा) में बहुत विस्तार से लिखा है लेकिन कोई चाहे तो सीधे उस दौर में माउंटबेटन के सचिव रहे Johnson, Allan Campbell की किताब “Mission with Mountbatten” पलटी जा सकती है. कोई चाहे तो माइकल ब्रेखर और लार्ड बर्डवुड को पढ़ा जा सकता है. बाक़ी पर्सेप्शंस जो हैं सो हैं.
(लेखिका शिक्षिका एवं चेतना विकास मिशन की प्रबंधिका

Exit mobile version