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दिल्ली में ऐतिहासिक स्मारक: आज भी खड़े हैं बड़े खान और छोटे खान के गुंबदों वाले मकबरे

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कहते हैं दिल्ली में अभी 21वीं सदी में भी कई राज ऐसे दफन हैं, जिनके ऊपर से आज तक पर्दा नहीं उठ पाया है. खासकर दिल्ली में कुछ ऐसे पुराने ऐतिहासिक स्मारक आज भी मौजूद हैं, जिनके बारे में कहीं भी पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है. इन स्मारकों को आज तक केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही जोड़ा और समझा जाता रहा है. इन्हीं स्मारकों में से एक स्मारक दिल्ली में छोटे खान और बड़े खान के नाम से बना हुआ है. जिसके बारे में लोग ज्यादातर कुछ नहीं जानते हैं.21वीं सदी में भी दिल्ली के कई ऐतिहासिक राज आज तक अनसुलझे हैं. साउथ एक्सटेंशन में स्थित छोटे खान और बड़े खान के मकबरे भी ऐसे ही रहस्यमयी स्मारक हैं, जिनकी पहचान आज तक सुनी-सुनाई बातों तक सीमित है. लोधी काल से जुड़े इन मकबरों के इतिहास और रहस्य क्या है आए आपको इस लेख के माध्यम से बताते हैं.

इसी स्मारक का इतिहास और इसे समझने के लिए हमने स्वतंत्र पत्रकार और दिल्ली के इतिहास पर गहरी पकड़ रखने वाले रे खन्ना से बातचीत की. रे खन्ना दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों पर आधारित रोचक जानकारियां नियमित रूप से सोशल मीडिया पर साझा करते रहते हैं. उन्होंने ऐतिहासिक अभिलेखों और मौखिक परंपराओं के आधार पर छोटे खान और बड़े खान के इस स्मारक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की.

किसके राज्य में और कब बना था यह स्मारक
रे खन्ना पहले तो यह बताते हैं कि यह स्मारक दो मकबरों को मिलकर बना हुआ है. उन्होंने कहा कि जिस तरह से यह स्मारक बनाया गया है उसे देखकर पूर्ण तौर पर यह मालूम होता है कि यह स्मारक 15वीं शताब्दी में लोधी कल के समय बना था. क्योंकि इस स्मारक पर जिस तरह की कलाकृतियां और जिस तरह का इसका ढांचा है वह इस कल के समय के स्मारकों से मिलता है. उनका कहना था कि यह दोनों मकबरे और स्मारक एक तरह के ही बने हुए हैं लेकिन जिस स्मारक को बड़े खान का मकबरा कहते हैं वह दिखने में छोटे खान के मकबरे से बड़ा है और इसलिए भी लोग एक मकबरे को बड़ा खान का मकबरा और एक मकबरे को छोटे खान का मकबरा कहते हैं.

 खन्ना ने आगे बताते हुए कहा कि यह दोनों मकबरे किसके हैं यह है कहीं भी लिखित तौर पर नहीं है. लेकिन मौखिक इतिहास में जो बातें हैं सामने निकल कर आई हैं उनके अनुसार कुछ लोग कहते थे कि एक बड़ा मकबरा एक शिक्षक का है और एक छोटा मकबरा उसके शिष्य का है. वहीं उनका यह भी कहना था कि कुछ बातें यह भी है कि यह एक बड़ा मकबरा बाप का है और छोटा मकबरा उसकी बेटे का है. मगर रे खन्ना का कहना था कि यह बात पक्की है कि लोधी कल के समय यह दोनों शख्सियतें जो भी थी वह काफी बड़ी हस्तियां रही होंगी और वह लोधी कल के समय लोधी दरबार में किसी न किसी पद पर रही होंगी तभी उनके यह इतने शानदार मकबरे बने हुए हैं.

कैसे पहुंच सकते हैं आप इन मकबरों को देखने
यह दोनों मकबरे दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन 1 इलाके के ब्लॉक डी में है. आसपास कई घर हैं इसलिए दूर से यह मकबरे और यह स्मारक नहीं दिखते हैं. लेकिन इन स्मारकों के पास वाला मेट्रो स्टेशन साउथ एक्सटेंशन है आपको यदि यहां पर जाना है तो आप मेट्रो से सीधा इस मेट्रो स्टेशन तक जा सकते हैं. वहां से इन दो मकबरों तक पहुंचने में आपको 20 से 25 मिनट लग जाएंगे. इसके लिए आप किसी की रिक्शा का उपयोग कर सकते हैं. हम आपको यह भी बता दे कि यह स्मारक हफ्ते के सातो दिन खुला रहता है और यहां पर किसी भी तरह का अंदर जाने के लिए कोई पैसा भी नहीं लगता है. सुबह यह स्मारक 7:30 बजे खुल जाता है और शाम को 7:00 बजे तक बंद हो जाता है.

दिल्ली: कहते हैं दिल्ली में अभी 21वीं सदी में भी कई राज ऐसे दफन हैं, जिनके ऊपर से आज तक पर्दा नहीं उठ पाया है. खासकर दिल्ली में कुछ ऐसे पुराने ऐतिहासिक स्मारक आज भी मौजूद हैं, जिनके बारे में कहीं भी पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है. इन स्मारकों को आज तक केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही जोड़ा और समझा जाता रहा है. इन्हीं स्मारकों में से एक स्मारक दिल्ली में छोटे खान और बड़े खान के नाम से बना हुआ है. जिसके बारे में लोग ज्यादातर कुछ नहीं जानते हैं.

इसी स्मारक का इतिहास और इसे समझने के लिए हमने स्वतंत्र पत्रकार और दिल्ली के इतिहास पर गहरी पकड़ रखने वाले रे खन्ना से बातचीत की. रे खन्ना दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों पर आधारित रोचक जानकारियां नियमित रूप से सोशल मीडिया पर साझा करते रहते हैं. उन्होंने ऐतिहासिक अभिलेखों और मौखिक परंपराओं के आधार पर छोटे खान और बड़े खान के इस स्मारक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की.

किसके राज्य में और कब बना था यह स्मारक
रे खन्ना पहले तो यह बताते हैं कि यह स्मारक दो मकबरों को मिलकर बना हुआ है. उन्होंने कहा कि जिस तरह से यह स्मारक बनाया गया है उसे देखकर पूर्ण तौर पर यह मालूम होता है कि यह स्मारक 15वीं शताब्दी में लोधी कल के समय बना था. क्योंकि इस स्मारक पर जिस तरह की कलाकृतियां और जिस तरह का इसका ढांचा है वह इस कल के समय के स्मारकों से मिलता है. उनका कहना था कि यह दोनों मकबरे और स्मारक एक तरह के ही बने हुए हैं लेकिन जिस स्मारक को बड़े खान का मकबरा कहते हैं वह दिखने में छोटे खान के मकबरे से बड़ा है और इसलिए भी लोग एक मकबरे को बड़ा खान का मकबरा और एक मकबरे को छोटे खान का मकबरा कहते हैं.

रे खन्ना ने आगे बताते हुए कहा कि यह दोनों मकबरे किसके हैं यह है कहीं भी लिखित तौर पर नहीं है. लेकिन मौखिक इतिहास में जो बातें हैं सामने निकल कर आई हैं उनके अनुसार कुछ लोग कहते थे कि एक बड़ा मकबरा एक शिक्षक का है और एक छोटा मकबरा उसके शिष्य का है. वहीं उनका यह भी कहना था कि कुछ बातें यह भी है कि यह एक बड़ा मकबरा बाप का है और छोटा मकबरा उसकी बेटे का है. मगर रे खन्ना का कहना था कि यह बात पक्की है कि लोधी कल के समय यह दोनों शख्सियतें जो भी थी वह काफी बड़ी हस्तियां रही होंगी और वह लोधी कल के समय लोधी दरबार में किसी न किसी पद पर रही होंगी तभी उनके यह इतने शानदार मकबरे बने हुए हैं.

कैसे पहुंच सकते हैं आप इन मकबरों को देखने
यह दोनों मकबरे दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन 1 इलाके के ब्लॉक डी में है. आसपास कई घर हैं इसलिए दूर से यह मकबरे और यह स्मारक नहीं दिखते हैं. लेकिन इन स्मारकों के पास वाला मेट्रो स्टेशन साउथ एक्सटेंशन है आपको यदि यहां पर जाना है तो आप मेट्रो से सीधा इस मेट्रो स्टेशन तक जा सकते हैं. वहां से इन दो मकबरों तक पहुंचने में आपको 20 से 25 मिनट लग जाएंगे. इसके लिए आप किसी की रिक्शा का उपयोग कर सकते हैं. हम आपको यह भी बता दे कि यह स्मारक हफ्ते के सातो दिन खुला रहता है और यहां पर किसी भी तरह का अंदर जाने के लिए कोई पैसा भी नहीं लगता है. सुबह यह स्मारक 7:30 बजे खुल जाता है और शाम को 7:00 बजे तक बंद हो जाता है.

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