कश्मीर समस्या के पीछे का सच**भाग 12
अजय असुर*
कश्मीर रियासत में मुस्लिम बहुसंख्यक थे, जो मूलतः किसान थे परंतु महाराजा हिन्दू डोगरा शासक थे। अच्छे-अच्छे ओहदे गिने चुने हिन्दू समुदाय के पंडितों के पास थे। मुसलमान बहुत गरीब थे। 1931 से यहाँ मुसलमान कृषकों के एक समूह ने आंदोलन की शुरूआत की। जिनमें शेख अब्दुल्ला भी सम्मिलित थे। 1931 में राजनीतिक सुधारों की मांग को लेकर पूरे राज्य की मस्जिदों में होने वाली बैठकों के रूप में आंदोलन ने संगठित गति प्राप्त किया। इस आंदोलन की आक्रामता श्रीनगर जेल पर जनता के आक्रमण में हुई। इस आंदोलन की मुख्य मांगे थीं कि बेगार प्रथा बंद की जाये, टैक्स कम किये जाएं, पुराने कर्जों और बकाया देने का भुगतान बंद रखा जाये, राष्ट्रीय और धार्मिक उत्पीड़न बंद किया जाये। जनता के संघर्षों के उपरांत लोगों की शिकायतों की जाँच के लिए राज्य की ओर से एक कमीशन गठित किया गया। इस कमीशन ने कुछ छूट मुस्लिम शिक्षा को प्रोत्साहन में, सरकारी कब्जे वाली मुसलमान धार्मिक इमारतों की वापसी में, चराई शुल्क में आंशिक छूट में, और सरकारी कार्य के लिए पारिश्रमिक में दिया गया। परंतु यह आंशिक छूट भी बढ़ते हुए आंदोलन को रोकने में नाकाफी साबित हुई। कमीशन द्वारा उपर्युक्त मांगों की सिफारिश और आन्दोलन के प्रभाव को कम करने के लिये शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में 15 अक्टूबर 1932 में ‘ऑल जम्मू एण्ड कश्मीर मुस्लिम कॉफ्रेंस की स्थापना मीरवाइज यूसुफ शाह और चौधरी गुलाम अब्बास के सहयोग से कराई गयी। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में किये जाने वाले इन प्रदर्शनों ने जनता के बीच अपनी पैठ बना लिया और शेख अब्दुल्ला को कश्मीरी राष्ट्रीयता का नायक बना दिया। 11 जून 1939 में शेख अब्दुल्ला ने ‘ऑल जम्मू एण्ड कश्मीर मुस्लिम कॉफ्रेंस का नाम बदलकर “जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस” कर दिया। पर चौधरी गुलाम अब्बास नाम बदलने के समर्थन में नहीं थे जिसके कारण 1941 में, चौधरी गुलाम अब्बास के नेतृत्व में एक समूह ने “जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस” से नाता तोड़ लिया और पुराने मुस्लिम सम्मेलन को पुनर्जीवित किया। पुनर्जीवित मुस्लिम सम्मेलन ने रियासत के पाकिस्तान में विलय का समर्थन किया और आजाद कश्मीर के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया। जम्मूकश्मीर नेशनल कांफ्रेंस ने सितम्बर 1944 में “नया कश्मीर” नाम से एक जन अभियान शुरू किया और जम्मूकश्मीर की सरकार को राज्य के आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्गठन (restructuring) के लिये ज्ञापन दिया गया। इस जनअभियान में जनतांत्रिक और नागरिक अधिकारों के तहत प्रत्येक नागरिक के लिए एक ऐसे समाज की अवधारणा रखी गयी, जिसमें उसके विकास के समान अवसर मुहैय्या हो और जीवन एक न्यूनतम नागरिक स्तर सुनिश्चित हो सके। जमींदारी उन्मूलन, लोगों का जंगलों पर अधिकार, किसान चार्टर, मजदूर चार्टर, राष्ट्रीय स्वास्थ्य चार्टर और औरतों के लिए चार्टर भी रखा गया।
1945 में नेशनल कांफ्रेंस ने कश्मीर में निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया (1946 में अमृतसर-संधि के उन्मूलन और कश्मीर के लोगों की सर्वोच्चता की पुनर्स्थापना की मांग की।) नेशनल कांफ्रेंस ने महाराजा “कश्मीर छोड़ो” आंदोलन की शुरुवात की। इसमें कश्मीर के सभी समुदायों के सदस्यों ने भागीदारी की। महाराजा हरि सिंह ने इस आन्दोलन का दमन क्रूरतापूर्वक किया और शेख अब्दुल्ला और उनके साथ आन्दोलन करने वाले साथियों को गिरप्तार कर जेल भेज दिया। जिससे यह आन्दोलन और तेज हो गया और यह आन्दोलन भारत में विलय तक चलता रहा। काफी लोगों का इस आन्दोलन को लेकर कई बुद्धजीवी शेख अब्दुल्ला की आलोचना करते हैं कि ये समय ठीक नहीं था इस आन्दोलन के लिये।
आजादी के बाद सितंबर 1951 में हुए चुनावों में जम्मूकश्मीर नेशनल कांफ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर की विधानसभा की सभी 75 सीटों पर जीत हासिल की। अगस्त 1953 में भारत राज्य के खिलाफ साजिश के आधार पर अपनी बर्खास्तगी तक शेख अब्दुल्ला प्रधान मंत्री (जम्मूकश्मीर के विशेषाधिकार के तहत वहाँ के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बोला जाता रहा) बने रहे। शेख अब्दुल्ला की बर्खास्तगी के बाद बख्शी गुलाम मोहम्मद राज्य के प्रधान मंत्री बने और शेख अब्दुल्ला को भारत राज्य के खिलाफ साजिश के आरोप में 9 अगस्त 1953 को गिरफ्तार कर लिया गया। 1964 में शेख अब्दुल्ला को आरोपों से मुक्त कर रिहा कर दिया गया। राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच 1965 में जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में विलय हो गया और यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जम्मू-कश्मीर शाखा बन गई। शेख अब्दुल्ला को 1965 से 1968 तक राज्य के खिलाफ साजिश के आरोप में फिर से गिरफ्तार किया गया था। शेख अब्दुल्ला के अलग हुए प्लेबिसाइट फ्रंट (ऑल जम्मू एंड कश्मीर प्लेबिसाइट फ्रंट भारतीय प्रशासित राज्य जम्मूकश्मीर में एक राजनीतिक दल था जिसने यह तय करने के लिए कि “लोकप्रिय जनमत संग्रह” का आह्वान किया कि क्या राज्य को भारत का हिस्सा रहना चाहिए, पाकिस्तान में शामिल होना चाहिए या स्वतंत्र रहना चाहिये। पार्टी के संरक्षक शेख अब्दुल्ला थे, और पार्टी के संस्थापक थे मिर्जा अफजल बेग।) गुट ने बाद में मूल पार्टी के नाम को समाहित किया जब अब्दुल्ला को केंद्र सरकार के साथ एक समझौता करने के बाद फरवरी 1975 में सत्ता में लौटने की अनुमति दी गई। जेकेएनसी (जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस) की राष्ट्रीय राजनीतिक स्तर पर केवल मामूली उपस्थिति रही है। पार्टी ने पहली बार 1967 में लोकसभा में चुनाव लड़ा और मात्र एक सीट जीती। 1977 में जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस को पुनर्गठित किया और राज्य विधानसभा चुनाव में 76 सीट में से 47 सीट जीता और पुनः शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। 8 सितंबर 1982 को शेख अब्दुल्ला की मौत के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री बने और पार्टी के प्रमुख भी। जून 1983 के चुनावों में, फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व में जेकेएनसी (जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस) में 46 सीट जीतकर फिर से एक जबरदस्त बहुमत हासिल किया और फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। पहली बार फारूक अब्दुल्ला 1980 में लोकसभा के चुनाव में जीत हासिलकर सदन में पहुंचे थे।
जुलाई 1984 में फारूक अब्दुल्ला के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह ने पार्टी को विभाजित कर दिया। केंद्र सरकार के इशारे पर काम करते हुए, राज्यपाल ने फारूक अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री के रूप में बर्खास्त कर दिया और उनकी जगह गुलाम मोहम्मद शाह को नियुक्त किया। फारूक अब्दुल्ला सरकार के गिराने और बनाने की प्रक्रिया में ही जगमोहन ने राज्यपाल के तौर पर शपथ ली (26 अप्रैल 1984)। शाह सरकार (2 जुलाई 1984 को पार्टी के 12 विधायकों के साथ नेशनल कांफ्रेंस से दलबदल कर फारूक अब्दुल्ला की सरकार गिरा दी, जीएम शाह ने 26 सदस्यीय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विधायक दल से हाथ मिलाया और मुख्यमंत्री बन गये।) के कार्यकाल का लंबा समय तो कर्फ्यू लगाने में ही बीता जिसकी वजह से कर्फ्यू सरकार के नाम से भी जाना जाता है। इस सरकार ने अपने स्वार्थों की खातिर जमकर सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा दिया और उनका समर्थन मांगा। उस वक्त के राज्यपाल जगमोहन ने भी अनेक ऐसे काम किये, जिसके कारण घाटी में असंतोष को बढ़ावा मिला। मार्च 1986 में शाह सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
1987 के राज्य विधानसभा चुनावों में, जम्मूकश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस घटकर 40 सीट जीती और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, और बहुमत हासिल करने की घोषणा की गई। फारूक अब्दुल्ला फिर से मुख्यमंत्री बने और अब्दुल्ला की निगरानी में राज्य सरकार और भारत के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया। अब्दुल्ला को 1990 में फिर से केंद्र सरकार ने बर्खास्त कर दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1991 में लोगों के विद्रोह के कारण राज्य के चुनाव रद्द कर दिए गए थे। 1990 में नई दिल्ली ने फिर से राज्य पर केन्द्र सरकार का कब्जा हो गया और 1996 तक राज्यपाल द्वारा शासन किया।
1996 में जम्मू और कश्मीर राज्य विधानसभा चुनावों में, फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली जेकेएनसी को कुल 87 में से 57 सीटें जीतकर फिर से चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल किया। अपने पूर्ववर्तियों की तरह इस चुनाव को धांधली माना गया है और अब्दुल्ला ने 2000 में पद छोड़ दिया। फारूक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला ने राज्य में सत्ता की बागडोर संभाली। कई वर्षों के अंतराल के बाद, जेकेएनसी ने 1998 के चुनाव से शुरुआत करते हुए, प्रत्येक चुनाव के साथ फिर से दो से चार सीटें हासिल करना शुरू कर दिया 1967 के बाद 1998 तक लोकसभा में कोई सीट नहीं जीत पायी थी जेकेएनसी और उधर 2002 के राज्य विधानसभा चुनावों में, जेकेएनसी घटकर 28 सीट तक ही पहुँच पायी।, जिसमें जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) कश्मीर घाटी में सत्ता के दावेदार के रूप में उभरी और कांग्रेस पार्टी ने जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई। दिसंबर 2008 के राज्य विधानसभा चुनावों में, कोई भी पार्टी बहुमत हासिल करने में सक्षम नहीं थी। फारूक के बेटे उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में जेकेएनसी फिरसे 28 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। चुनावों के बाद, 30 दिसंबर 2008 को जेकेएनसी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, जिसने 17 सीटें जीती थीं। उमर अब्दुल्ला 5 जनवरी 2009 को इस गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बने ।
जेकेएनसी और कांग्रेस ने गठबंधन में 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने जम्मू क्षेत्र की सभी दो सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन लद्दाख सीट कांग्रेस के बागी से हार गई, जिन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। जेकेएनसी ने 2009 में कश्मीर घाटी की तीनों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। फारुख अब्दुल्ला 2009 में दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीता, उस समय जेकेएनसी सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन गठबंधन) में शामिल हो गया था। फारूक अब्दुल्ला को नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री नामित किया गया था, जो राष्ट्रीय कैबिनेट स्तर का पद संभालने वाले पहले पार्टी सदस्य बने। इस अवधि के दौरान जेकेएनसी ने कश्मीर के भारत में विलय पर बढ़ते विवादों का अनुभव किया है। 2010 में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जब राज्य के अर्धसैनिक बलों द्वारा गोला-बारूद दागे जाने के परिणामस्वरूप लगभग 100 प्रदर्शनकारी (11 वर्ष की आयु के एक युवा) मारे गए थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में, जेकेएनसी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई। राज्य की छह सीटों में से पीडीपी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तीन-तीन सीटें जीती हैं।
2014 के जम्मू और कश्मीर विधान सभा चुनाव के दौरान, कांग्रेस ने जेकेएनसी के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया। जेकेएनसी ने सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केवल 15 सीटों पर जीत हासिल की और उमर अब्दुल्ला ने 24 दिसंबर 2014 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। पीडीपी ने कुल 28 सीट जीतकर विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई, और बीजेपी ने 25 सीटें जीतीं। पीडीपी ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन सरकार बनाई। जम्मू और कश्मीर विधान सभा नवंबर 2018 से भंग कर दी गई है। तबसे अब तक विधानसभा चुनाव नहीं हुआ और राज्यपाल शासन के जरिये भाजपा अपनी सरकार चला रही है।
कश्मीर घाटी के लोगों ने देखा कि उनके वोट डालने का कोई मतलब नहीं क्योंकि जो जीतता है बस अपनी झोली भरता है। उस जीते हुए प्रत्याशी या मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री से जनता की समस्या कम नहीं हुई, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार…. कम होने की बजाये लगातार बढ़ता ही जा रहा है इसलिये इस लोकतंत्र में जनविश्वास लगातार कम होता गया। नतीजा पिछले लम्बे अर्से से कश्मीर घाटी में लोग वोट डालने नहीं निकल रहें हैं पर जनता को संगीनों तले वोट डालने के लिए बाध्य किया जाता रहा है। जबरदस्ती वोट डलवाया जा रहा है। पिछले विधानसभा चुनावों में 50 लाख मतदाताओं पर 10 लाख सुरक्षा बल की तैनाती की गयी थी और चुनाव टुकड़ों में कराये गये थे ताकि इस अंतराल में सेना को एक स्थान से दूसरे स्थानों पर तैनात किया जा सके। कश्मीर में सेना/सुरक्षा बलों का कई तरह के अत्याचारों के अलावा भी एक अन्य काम है कश्मीरियों से जोर जबर्दस्ती से वोट डलवाना।
कश्मीर में भारतीय राज्य सत्ता सेना के सहारे लोकतंत्र भी पैदा करती रही है। कश्मीर में चुनाव के माध्यम से भारत सरकार बार-बार यह सत्यापित करने की कोशिश करती रही है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है कि कश्मीरी जनता भारत में आस्था रखती है। इन चुनावों की वैधानिकता का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 1997 के विधान चुनावों में तो लगभग 20 प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ था। कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया सेना के बलबूते संपन्न होती है, चुनी हुई सरकार सेना के बल पर ही टिकती है या कहें कि कश्मीर मात्र सेना के दम पर ही भारत में है। यदि कश्मीर से भारतीय सेना के जवान हटा लिये जायें तो घाटी की जनता स्वयं ही विद्रोह कर भारत से मुक्त कर एक नया स्वतंत्र देश बना लेगी।
कश्मीर के सभी अलगाववादी संगठनों ने इस चुनाव प्रक्रिया से अपने को अलग रखा हुआ है। उन्हें इस लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। इसलिये अब हर चुनाव से पहले भारत और वहां की प्रदेश सरकार दोनों मिलकर ऐसे नेताओं को गिरफ्तार कर चुनाव सम्पन होने तक नजरबंद कर दिया जाता है या फिर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है। ऐसे में इस माहौल के होने वाले चुनाव कहीं से भी कश्मीरियों की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व तो कतई नहीं करते हैं। इस तरह सरकारी गुण्डों के द्वारा बनाये गये आतंक के माहौल के होने वाले चुनावों में भी जनता इन चुनावीबाज पार्टियों के खिलाफ अपने आक्रोश का इजहार करती रही है।
हुर्रियत कांफ्रेंस जिसका घोषित उद्देश्य जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए संघर्ष करना है, अभी तक अपनी तमाम कमियों व कमजोरियों के बावजूद जनमत संग्रह की मांग पर अडिग है। इसके साथ ही हुर्रियत त्रिपक्षीय वार्ता की मांग करती रही है जिसमें पाकिस्तान भी शामिल हो।
कश्मीर के भारत में विलय के बाद 1948 में जम्मू-कश्मीर में पहली बार अंतरिम सरकार का गठन हुआ। शेख अब्दुल्ला को नेहरू की मेहरबानी से प्रधानमंत्री घोषित कर दिया जाता है। फिर उसके बाद जम्मूकश्मीर के पहले विधानसभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस की जीत तक कश्मीर राज्य ऊपरी तौर पर भले ही शांत रहा हो परंतु अंदर ही अंदर आक्रोश बढ़ रहा था। 2 जुलाई 1983 को फारूक अब्दुल्ला (शेख अब्दुल्ला के बेटे) सरकार की बर्खस्तगी ने कश्मीरी अवाम के भीतर यह विश्वास स्थापित किया कि अवाम को अपनी सरकार चुनने का भी हक नहीं है। जम्मूकश्मीर राज्य में केन्द्र सरकार की सहमति के बिना कोई राज्य सरकार टिक नहीं सकती ऐसा विचार घर कर गया और सत्य भी है। कश्मीर राज्य में सरकारों के गिराने और बनाने के खेल में हमेशा से केन्द्र सरकार की अहम भूमिका रही है। जो सरकार दिल्ली की पसंद नहीं होगी उसका गिर जाना लाजिमी था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1980 का राजीव गांधी और फारूक अब्दुल्ला समझौता था। फारूक अब्दुल्ला ने राजीव गांधी से सौदेबाजी कर सत्ता तो प्राप्त कर ली लेकिन इस सौदेबाजी में कश्मीरी अवाम का ख्याल भी नहीं आया और फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी आवाम के आत्मसम्मान को बेच दिया। कश्मीर राज्य के भीतर केन्द्र सरकार द्वारा किसी भी विरोधी राजनीतिक पार्टी को आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दिया गया। जब तक कांग्रेस की सरकार थी केन्द्र में और कांग्रेस का सूरज अस्त होने के बाद अब भाजपा की कठपुतली सरकार है जम्मूकश्मीर में। कश्मीर के भीतर अप्रत्यक्ष तरीके से केन्द्र सरकार का ही शासन चलता था और चल रहा है, बस नाम राज्य सरकार का होता था कि राज्य में फलां की सरकार है। असल में जम्मूकश्मीर में आज भी कठपुतली सरकार ही बनती है।
आपने स्वयं देखा कि किस तरह से केन्द्र सरकार शेख अब्दुला को अपने हितों के अनुसार दोषी करार देती है और जब हित सध जाता है तो निर्दोष साबित कर देती है फिर आगे बात ना बनने के कारण दोषी करार दे दिया जाता है और यह खेल चलता रहता है। यह भी गौर करें कि शासक वर्ग अपने हितों के अनुसार अपनी मर्जी से राज्यपाल शासन लागू कर देता है। देखा जाये तो इन 75 सालों में ज्यादा समय तो कश्मीर में राज्यपाल शासन ही रहा है और लोकतंत्र के नामपर जो भी राज्य सरकार रही है वो कठपुतली सरकार ही रही है।
*शेष अगले भाग में…*
*अजय असुर*

