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16 मार्च 1527. खानवा का युद्ध :
महाराणा सांगा के नेतृत्व में पूरे उत्तर भारत के रजवाड़े बाबर के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए तैयार खड़े थे। बाबर ने मेवात के नवाब हसन ख़ान के पास अपना दूत भेजा। कहा कि एक मुसलमान को दूसरे मुसलमान के ख़िलाफ़ जंग नहीं लड़नी चाहिए। राणा का साथ छोड़कर वो सही पाले में आ जाए।
साथ ही हसन ख़ान के बेटे को भी रिहा कर दिया।लेकिन मेवाती ने जवाब दिया, ये मेरा वतन है और तुम बाहर से आए हो। मैं अपनों के साथ सही पाले में खड़ा हूँ। बाद में बाबरनामा में बाबर ने इस बात का ब्यौरा तफ़सील से दिया कि कैसे हसन ख़ान मेवाती इस पूरे फ़साद की जड़ था और कैसे उसने उसे तड़पा-तड़पाकर मारा। लेकिन यह 16वीं सदी का दौर था।
दौर बदला।
20वीं सदी की शुरुआत में मेवात में नए तरीक़े के हलचल हो रही थी। अलवर का राज जा चुका था। अलवर में नरूका राजपूत और भरतपुर में सिनसिनवार जाट तख़्त पर बैठे थे।
मेव धर्म से मुस्लिम थे और जात से ख़ुद को राजपूत बताते। वो मुहर्रम, ईद और जन्माष्टमी एक साथ मना रहे थे। दिवाली पर दिए जलाते। अपने बच्चों के नाम राम और दिलीप रखते। शादी की पहली पत्रिका कृष्ण भगवान के नाम गाँव के ब्राह्मण के हाथ से लिखवाते।
शादी में निकाह पढ़ने के अलावा सारे रिवाज हिंदुओं जैसे थे। लेकिन अलवर और भरतपुर रियासत की नज़र में उनकी पहचान एक ज़रायमपेशा समुदाय की रही।
1920 के दशक में मेवात नई हलचल से गुजर रहा था। एक तरफ़ स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन था, जोकि शुरू हुआ था पश्चिमी संयुक्त प्रान्त के मलकाना मुस्लिम राजपूतों को फिर से हिंदू बनाने से लेकिन भरतपुर रियासत की शह पर उसने धीरे-धीरे राजपूताना में भी पैर पसारने शुरू कर दिए थे।दूसरी तरफ़ थी तबलीगी जमात।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े ज़मींदार घराने के वारिस मौलाना शाह इलियास ने अपना अपनी सारी संपत्ति बेचकर मेवात में सौ मदरसे क़ायम किए ताकि बेदीन हो चुके मेवों को दीन के रास्ते पर लाया जा सके।
कहते हैं कि जब कुछ तालिब हाफिज हुए। माने उन्हें क़ुरआन मुखजबानी याद हो गई तो मौलाना ख़ुद मेवात आए ताकि इनका इम्तिहान ले सकें। उनके सामने जिस हाफिज को पेश किया गया उसके कान बींधे हुए थे। धोती पहने हुए, सिर पर साफा और मरोड़दार मूंछे। मौलाना इलियास गश खाकर गिर गए। बपौती की ज़मीन बेचकर जो पैसा इन गँवार मेवो को दीन की तालीम देने के लिए लगाया था सब बर्बाद हुआ। फिर उन्होंने तबलीग जमानी शुरू की जोकि घर-घर जाकर लोगों से नमाज़ पढ़ने के लिए कहती।
1930 के दशक में मेव अलवर रियासत के साथ सींग फँसा बैठे। उस समय जय सिंह अलवर के महाराजा हुआ करते थे। वो मेयो कॉलेज से पढ़े थे। आला दर्जे की अंग्रेज़ी बोलते थे। ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी बसर करते। उनका धर्म के प्रति गहरा झुकाव था। उन्होंने ख़ुद को राज ऋषि और धर्म प्रभाकर जैसी उपाधियों से नवाज़ा था।
1929 में उनकी ताजपोशी की रजत जयंती थी। बड़ा कार्यक्रम हुआ। ख़ज़ाना ख़ाली। लगान चार गुना बढ़ा दी गई। मेवों ने विरोध किया और लगान देना बंद कर दिया। गोविंदगढ़ में महाराजा की मनमानी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ। रियासत के सैनिकों से गोलियाँ चलाईं,सौ से ज़्यादा मेव मारे गए। इस पूरे कांड को जोकि एक किसान विद्रोह था, बाद में रियासत ने हिंदू-मुस्लिम रंग दे दिया।
धर्म की बढ़ती खाई और तबलीगी जमात की सक्रियता। मेवों का नए सिरे से इस्लामीकरण शुरू हुआ।
फिर आया 1947 का दौर।
नारायण भास्कर खरे अलवर के तत्कालीन प्रधानमंत्री। केएम मुंशी के शागिर्द। हिंदू महासभा के निकट सहयोगी। बँटवारे की आग में उन्होंने अलवर और भरतपुर की फ़ौज को मेवों के ख़िलाफ़ उतार दिया। अकेले भरतपुर में आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़ तीस हज़ार मेव मारे गए ।अलवर में कितने मरे इसकी गिनती नहीं हुई।
एक लाख से ज़्यादा विस्थापित होकर गुड़गांव में रहने को मजबूर हुए। खरे ने मुंशी को लिखी चिट्ठी में लिखा कि उन्होंने ‘मेव समस्या’ का स्थाई हल खोज लिया है।
दिसम्बर 1947
नौआख़ाली से हताश होकर लौटे गांधी जी ने मेवात का दौरा किया। गांधी जी घासेड़ा गए जहां उन्होंने मेवों को समझाया कि वो अपने बाप-दादाओं की ज़मीन छोड़कर पाकिस्तान ना जाएँ। मेव इस ज़मीन पर 12वीं सदी से आबाद थे। लेकिन इसके डेढ़ महीने बाद गांधी जी की हत्या कर दी गई। मेवात में औरतें आज भी गाती हैं , “भरोसा उठ गया मेवन का, गोली लगी है गांधी के छाती बीच. ”
उस दिन से आजतक मेवों के इस टूटे हुए भरोसे को किसी ने जोड़ने की कोशिश नहीं की। रंगनाथ मिश्र कमिटी की रिपोर्ट ने मेवात के मुसलमानों को देश में सबसे पिछड़ी अल्पसंख्यक आबादी करार दिया। मूल रूप से पशुपालक यह समाज लगातार परसिक्यूशन का शिकार हुआ। पहलू ख़ान, रकबर,वारिस और हाल में नासिर और जुनैद। मेवात फिर से सांप्रदायिक राजनीति की प्रयोगशाला बना है । पहले मॉब लिंचिंग और अब ब्रज मण्डल यात्रा।
मेवात में फ़िलहाल जो हिंसा हो रही है उसके बीज बहुत पुराने हैं। सतही तौर पर चीजें समझ में नहीं आएँगी। हिंसा का सिलसिला बहुत लंबा है। जिस तरह से परमानेंट इलाज की बात सरेआम टीवी से हो रही है, यह नाज़ी दौर के ‘फाइनल सॉल्युशन’ की याद दिलाता है। मेवात के ज़ख़्म गहरे हैं। उस पर मरहम लगाने वाला महात्मा कब का जा चुका है ।

