शशिकांत गुप्ते
होली का त्यौहार रंगों के साथ हँसी ठिठोली और हास्य व्यंग्य का भी त्यौहार है।
होली का त्यौहार उत्साह के साथ मनाया जाता है। काश यह त्यौहार english के holy शब्द के हिंदी में शब्दार्थ के अनुरूप मतलब पवित्रता से मनाया जाए तो उत्साह द्विगुणित हो सकता है।
दुर्भाग्य फैशन (fashion) की अंधी दौड़ को हम प्रगति का मापदंड समझने की भूल कर रहें हैं।
इसी भूल के कारण सामाजिक,धार्मिक,राजनैतिक, शिक्षा और संस्कृति है, क्षेत्र भी फैशनबल हो गया है।
हर एक क्षेत्र में बाह्य भूषाचार को ही प्रगति समझने के कारण हम हमारी संस्कृति,आदर्श, सदाचार,
सहिष्णुता,और मर्यादा को ही भूलते जा रहें हैं।
फैशन के अंधानुकरण के कारण हमारे जहन में भौतिकता हावी हो रही है। भौतिकता के कारण हम हर क्षेत्र में छद्म दिखावे को देख प्रसन्नता प्रकट करते हैं। वास्तव में यह प्रसन्नता नहीं है,बल्कि स्वय के द्वारा ही स्वयं को धोखा देना है।
फैशन की अंधी दौड़ के कारण हम यथार्थ में झांकने का साहस खो देते हैं।
हमारी इसी कमजोरी के कारण वे लोग हमारी मानसिकता का भरपूर शोषण करते हैं,जिन लोगों ने हर एक क्षेत्र का व्यापारीकरण कर दिया है।
व्यापारीकरण बाजारवाद में तब्दील हो गया है। बाजरवाद के हावी होने हमें अपनी अनिवार्य आवश्यकताएं नजर नहीं आती है,और हम अपने बाह्य शृंगार पर ही बेहताशा व्यय कर रहें हैं।
वास्तविक प्रगति वैचारिक परिपक्वता से आती है।
वैचारिक परिपक्वता के लिए व्यापक सोच की आवश्यकता है।
पहले हमें अपने जहन में स्पष्ट सोच पैदा करना होगा,स्पष्ट सोच से तात्पर्य जीवन के संबंधित हर एक मुद्दे पर Concept मतलब अपनी अवधारणा को Clear अर्थात एकदम स्पष्ट रखना चाहिए।
इस तरह हम सिर्फ होली ही नहीं हर एक त्यौहार Holy ही मना पाएंगे।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

