माना कि तुम कहोगे
कि सुबह का भूला
शाम को घर लौट आया है
वह भूला नहीं है !
हम भूले ही कहाँ हैं हुजूर ?
हमें भूलने नहीं देते
हमारी पीठ पर लगे
घंटी के निशान !
कानों में गूंजतीं
पिघला हुआ सीसा डालने की धमकियाँ !
बैलों के गोबर से अन्न के दाने
छान कर खाने की मजबूरियाँ !
हमे याद है
ठाकुर के कुँए के पानी का स्वाद !
दरवाजे के सामने से
जूते न पहन कर निकलने का फरमान !
जूठन खाने की मजबूरी !
संसार का सबसे निकृष्ट काम
सर पर मैला ढोना !
ढोके में ही लूटा जाना
हमारी नववधुओं की इज्जत !
जिन्दगी भर करते रहना बेगार !
काट लिया जाना अँगूठा !
हमे याद है तुम्हारा कथन
कि हम तो पैदा ही हुए हैं
तुम्हारे ब्रह्मा के पैरों से !
जिन्दगी भर ढोने के लिए
तुम्हारी गंदगी का बोझ !
किसी आततायी ने छुआ दिया था
हमारे होठों पर
गाय का गोश्त !
और
हम नहीं रह गये थे
तुम्हारे घर में रहने के योग्य !
हम वही हैं हुजूर
क्या अब तुम हमें बिठाओगे
अपनी पंक्ति में
जोड़ोगे हमसे रोटी-बेटी के संबंध ?
तुम्हारी कौन सी मजबूरी है
कि हम आने लगे हैं याद
कि बन गई है तुम्हारे घर में जगह
हमारे लिए !
जबकि खुद तुम्हारे माँ -बाप
रह रहें हैं वृद्धाश्रमों में !
इस लोकतंत्र में अब हम
‘यूज एण्ड थ्रो ‘ हो जाने के लिए
तैयार नहीं है हुजूर !
सुप्रसिद्ध कवि व लेखक- रामकिशोर मेहता ,अहमदाबाद, गुजरात, संपर्क - 919408230881, ईमेल - ramkishoremehta9@gmail.com
संकलन -निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,

