शशिकांत गुप्ते
शिशु के जन्म के बाद उसका नाम रखा जाता है।इसे नामकरण संस्कार कहतें हैं।
सम्पूर्ण विश्व में जितने भी देश हैं,किसी भी देश में नामकरण को लेकर कोई कानूनी बंधन नहीं है,और नाहीं कानूनी बाध्यता है।
नाम एक पहचान मात्र है।
नाम सिर्फ मानव की ही पहचान नहीं है।पृथ्वी पर जितने भी प्राणी है,वृक्ष,फूल,पौधें, जीव,जंतु,कीड़े मकौड़े,मच्छर,मख्खियों,जल जंतुओं,पक्षियों आदि सभी की पहचान भी नाम से ही होती है।
पहचान सिर्फ नाम तक सीमित नहीं है।प्राणियों,वृक्षों,फूलों,फलों, पशुओं,पक्षियों के प्राकृतिक स्वभाव से पहचान होती है।
सभी प्राणियों में और मानव में एक प्रमुख अंतर है,मानव के पास मनन करने की शक्ति है।
इसीलिये हमारे पुरखों ने कहा है।
मनु ते इति मानवः, पश्यते इति पशु अर्थात जो मनन करने की क्षमता रखता है,वही मानव है,और पश्यते मतलब जो सिर्फ देखता है वह पशु है।
मानव में मनन करने क्षमता जागृत होने के लिए उसे सदा सजग रहना जरूरी है।सजग रहने के लिए मानव को कुदरत ने अंग-प्रत्यंग की नेमत बख्शी है।उसका सही उपयोग करना चाहिए।
मानव के लिए एक कटुसत्य कहा जाता है कि,मानव जैसा स्वार्थी प्राणी अन्य कोई नहीं है।
सामाजिक,राजनैतिक,धार्मिक,
सांस्कृतिक,व्यापारिक और खेल के क्षेत्र बहुत से मानव हैं,जो
निःस्वार्थ भाव से सक्रिय हैं।
एक विनोदी लेकिन सारगर्भित किस्से का स्मरण हुआ है।यह किस्सा एकदम प्रासंगिक है।
एक बार अक़बर ने बीरबल से पूछा,अपने राज्य में ईमानदार लोग कितने है? यदि हैं तो उनकी गिनती कैसे की जा सकती है?
बीरबल ने कहा समूचे राज्य की तो नहीं अपने शहर में ईमानदारों की गितनी कर सकतें हैं।
बीरबल ने एक हौद बनवाई और शहर में ऐलान किया,जो भी ईमानदार आदमी होगा वह एक लौट दूध हौद में डालेगा।बीरबल का तर्क था जब हौद दूध से भर जाएगा तब हम लौटे से हौद खाली करते हुए लौटें गिन लेंगे।ईमानदार लोगों की गणना हो जाएगी।
जब हौद में दूध डालने का ऐलान किया गया तब कुछ नैतिक मानवों ने लौटे भर कर हौद में दूध ही डाला।लेकिन कुछ स्वार्थी और धूर्त लोगों ने लौटो में दूध की जगह पानी भरकर हौद में डाला।यह समझ कर कि,जो लोग दूध डालेंगे उनके साथ पानी भी दूध की गिनती में आ जाएगा।
ऐलान का नतीजा यह हुआ कि, हौद में ईमानदार दूध के साथ चालाखी वाला पानी मिलने से हौद में खालिस दूध तो एकत्रित नहीं हुआ लेकिन ईमानदार लोगों के कारण हौद का पानी दूधिया जरूर हो गया।
यही मननशील मानवों का महत्वपूर्ण योगदान है।यही ईमानदार मानवों की पहचान भी है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

