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संसद (राज्य सभा ) में गुँडागर्दी का नंगा नाच ! बनाम बिकता देश !

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कल संसद में जो मारपीट और धक्कामुक्की की दुखद घटना विपक्षी सांसदों के साथ घटी है, उसका मुख्य कारण यह है कि वह बिना बहस संसद में पास किये जाने वाले बिलों का कड़ा विरोध कर रहे थे। जब यह धक्कामुक्की चल रही थी,ठीक उसी वक्त सांसद डेरेक ओ ब्रायन का ट्वीट आया,जिसमें उन्होंने राज्यसभा के अंदर के माहौल को बयान किया। वो कहते हैं, “राज्य सभा टीवी आपको क्या नहीं दिखा रहा है – इस वक़्त सदन में सांसदों से ज़्यादा मार्शल मौजूद हैं। सरकार इंश्योरेंस बिल को ज़बरदस्ती पास कर रही है। ये है गुजरात मॉडल “,दरअसल उस वक्त विपक्ष इस बिल को संसद की सेलेक्ट कमेटी के पास भिजवाने की मांग कर रहा था।
आखिर इंश्योरेंस बिल का पास होना इतना अहम क्यों था ? सरकार के लिए कि उसने संसद की महान परम्पराओं को भी किनारे रख दिया ?दरअसल यह बिल भारत की 4 प्रमुख बीमा कंपनियों जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया,नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड,ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड में 51प्रतिशत सरकारी स्वामित्व की शर्त को खत्म कर देता है यानी अब इन्हें बेचने के लिए सरकार पूरी तरह तैयार है।
यह निजीकरण ही है !
कर्मचारी कहते हैं कि इन चार राष्ट्रीयकृत बीमा कंपनियों ने 1972 में केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए महज 19.5 करोड़ रुपए की शुरुआती पूंजी और 1000 कर्मचारियों और 300 कार्यालयों के साथ अपना कारोबार शुरू किया था और राष्ट्रीयकरण के 50 वर्षों के बाद आज वही चार कंपनियां देश के हर कोने में करीब 8000 कार्यालयों के साथ काम कर रही हैं और इस वर्ष उन्होंने 73,000 करोड़ रुपए का प्रीमियम अर्जित किया है। इन चारों कंपनियों ने 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का एक बड़ा संपत्ति आधार बनाया है और विभिन्न सरकारी योजना ओं और पब्लिक लिमिटेड कंपनियों में 1,78,977 करोड़ रुपये का निवेश भी किया है।उन्होंने सरकारी योजनाओं को भी वित्तपोषित किया है और देश के बुनियादी ढांचे को भी बढ़ावा देने के लिए भी भारी निवेश किया है।
इसका इनाम देने के बजाए इन्हें अब बेचा जा रहा है ! यह चारों कंपनियां सरकार की आरक्षण नीति को सही तरीके से लागू कर रही हैं और ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों ‘ को रोजगार सुनिश्चित कराने के अलावा हजारों युवाओं को सालाना रोजगार दे रही हैं,जैसे कि स्थायी रोजगार,एजेंट, सर्वेयर आदि के रूप में। अब निजीकरण के बाद यह सब बन्द हो जाएगा। बीमा कम्पनियों का निजीकरण दलित और पिछड़े समुदायों को रोजगार से वंचित कर देगा।
आम जनता को यह समझना होगा कि यह चारों कंपनियां प्रीमियम संग्रह और दावा निपटान के मामले में पहले चार स्थान पर आती हैं। कोरोना महामारी की दूसरी लहर में जब निजी बीमा कंपनियों ने मरीजों की बड़ी संख्या में क्लेम निरस्त की हैं या कटौती की हैं। ऐसे में निजी क्षेत्र की कुल 30 सामान्य बीमा कम्पनियों के मुकाबले इन चार कम्पनियों का रिकॉर्ड फिर भी बेहतर है।

           आपको यह ठीक से समझना होगा कि मोदी सरकार की देश को निजीकरण की ओर ले जाने  से सबसे अधिक नुकसान नौकरीपेशा व्यक्तियों  का होने वाला है। अब जब पूरी व्यवस्था निजी  कंपनियों के हाथों में आ जाएगी तो कॉस्ट कटिंग के नाम पर सबसे पहले नौकरीपेशा ही बेरोजगार होगा।

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-सुप्रसिद्ध चिंतक,लेखक-गिरीश मालवीय

         संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम पर्यावरण संरक्षण ',प्रताप विहार,गाजियाबाद, 
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