डॉ. विकास मानव
कभी सोचा है आपने निष्पक्ष होकर कि आपके जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है? क्या ही पाना पाना चाहते हैं आप जीवन में ?
आज प्रत्येक व्यक्ति दौड़ रहा है l बीमारियों की परवाह किए बिना, चोट की परवाह किए बिना, रिश्तो की परवाह किए बिना, मानवता की परवाह किए बिना और अंततोगत्वा मानव होने की परवाह किए बिना l किसी को इंजीनियर बनना है, किसी को डॉक्टर, किसी को समाजसेवी तो किसी को प्रशासनिक अधिकारी.
अगर बन गए अगला लक्ष्य अपने बच्चों को उसी रास्ते पर एक मशीन जैसा बनाना है जैसा वो खुद बन कर आए हैं l
कभी सोचिएगा कि हम ऑफिस जाते हैं, शाम को ऑफिस से घर आते हैंl एक दुकानदार सुबह दुकान खोलता है, शाम को दुकान बंद करता हैl ढेर सारे लोग सुबह सफर शुरू करते हैं और शाम को घर वापसl एक अनंत सफ़र ! एक ऐसा सफर जिसकी इतिश्री उस दिन होती है, जिस दिन वह स्वयं इहलोक से परलोक का सफर करता हैl
बस दौड़ना है, एक मिनट के लिए भी जीना नहीं, बस दौड़ते रहना है l शहर में मकान बनाना , एलआईसी की किस्त जमा करना , गाड़ी खरीदना, पब, होटल, विलासिता का एक ऐसा अंतहीन लक्ष्य निर्धारण जिसमें सिर्फ समाज को दिखाना भर उद्देश्य बन जाता हैl
हम जान पहचान वालों के मुंह पर तमाचा मारना चाहते हैं लेकिन भूल जाते हैं कि इतना बड़ा बनने की रास्ते में सारे अपनों को तो छोड़ कर आए हैंl
जीवन पर्यंत कठिन मेहनत करके बहुत पैसा इकट्ठा कर जब एक आदमी अपनी बेटे या बेटी का विवाह करता है तो साज-सज्जा से लेकर दिखावे पर फिजूल के फिजूल रुपए बर्बाद करता हैl
एक पल के लिए भूल जाता है कि क्या इस फिजूल के दिखावे के लिए उसने पूरी जिंदगी सुबह 9:30 से शाम 6:30 तक 8x 8 के एक कमरे में काम करते हुए बिता दियाl अगर बिताया भी है तो फिजूलखर्ची के बजाय पैसे बच्चों के खातों में डाले जा सकते हैं जो मजबूरी में उनके काम आएंगेl
मुझे याद है कि हमारे बचपन में हम शहर से गांव आते थे और गर्मी की छुट्टियों में हर कोई गांव आया करता थाl देर शाम तक एक साथ बैठकर बस एक दूसरे के दुख सुख को साझा करना, ढेर सारे गप्पे लड़ाना, अंत्याक्षरी खेलना, साथ में बाटी चोखा या और कुछ औरl
जून के अंत तक सभी फिर से परदेसl जानते हैं परदेस क्यों ही रहा करते थे लोग ? क्योंकि वे गांव में जो जिंदगी जी कर आए थे , वह उन्हें असफलता का पर्याय समझ आता थाl उन्हे लगता था कि बहुत अच्छे पद और पैसे की प्राप्ति ही जीवन है और बस पीढ़ियां बदली और जो बच्चे साल में दो महीने के लिए जाते थे , उनके बच्चे गांव को सिर्फ टीवी में देखते हैंl
एक आम बात है कि साधारण परिवार में यदि चार से पांच सदस्य हैं तो उन्हें आपस में भी बैठकर लूडो या कैरम खेलने की फुर्सत नहींl कोई या तो मोबाइल देख रहा होता है, किसी की जिम का टाइम हो रखा है, किसी के ट्यूशन का टाइम हो रखा है तो किसी की घंटों फोन पर बातें चल रही है और शाम को खाना खाकर सो जाना l सुबह फिर से सबकी अपनी दिनचर्याl
आखिर हम ज़िंदगी जी कब रहे l याद कीजिएगा आप को आप की मौसी के यहां, आपकी बुआ के घर या आपके मामा के यहां गए हुए कितने अरसे हो गएl अगर गए भी होंगे तो शायद एक रात बिताए तो जमाना बीत गया होगाl
पैसे तब भी लोगों के पास नहीं हुआ करते थे लेकिन सम्बंध इतने मजबूत हुआ करते थे कि लोग आपस में मिलकर बहुत बड़े-बड़े कार्यक्रम निपटा दिया करते थे और आज जब संबंधों को ही देखने/दिखाने की नौबत आ गई तो व्यक्ति एकाकी होता चला गयाl
देखता हूं कि लोग घूमने भी जाते हैं तो बस महंगे होटल, महंगे कपड़े ढेर सारी शॉपिंग और हजारों सेल्फी l इसके बाद फिर से स्टेटस और फेसबुक पोस्ट पर देखने दिखाने, कमेंट रिप्लाई की अंतहीन शुरुआतl यह लक्ष्य भी गया भाड़ में. साथ कौन है, उसकी भी परवाह नहीं.
जिंदगी बस गप्पे लड़ाने, पैसे कमाने, संबंध निभाने, बच्चो को अच्छी शिक्षा या भविष्य देने, घूमने टहलने भर नहीं ही हैl बल्कि ज़िंदगी का मतलब तो इन सभी में एक अच्छा सामंजस्य बिठाना हैl भावना, संवेदना, चेतना को सतत विकास देकर समग्र तृप्ति की अनुभूति से स्वयं को पूर्णत्व का शिखर देना है. परमानन्द अथवा मोक्ष की अवस्था इसी को कहते है.

