प्रत्यक्ष मिश्रा
संसद के भीतर हाल की दो घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र की दिशा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ, संसद में एक चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया; दूसरी तरफ, विपक्ष द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया गया, जिसमें उन पर “पक्षपातपूर्ण रवैया” अपनाने का आरोप लगाया गया था।
संसदीय लोकतंत्र में ऐसी घटनाएं बहुत असामान्य हैं, क्योंकि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, संस्थाओं और संवैधानिक पदों पर सवाल उठाना अपने आप में जवाबदेही सुनिश्चित करने की एक प्रक्रिया है। यहां एक अहम सवाल उठता है: क्या भारतीय लोकतंत्र के भीतर—संसद और उसकी संस्थाओं के बीच—संतुलन और संवाद की संस्कृति धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है?
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है; फिर भी, किसी लोकतंत्र की असली कसौटी केवल नियमित चुनाव कराने से तय नहीं होती। अगर केवल चुनाव लड़ना और सरकार चुनना ही लोकतंत्र की एकमात्र कसौटी होती, तो दुनिया के कई ऐसे देश भी लोकतांत्रिक कहलाते हैं, जहाँ भारत गणराज्य से पहले चुनाव होते चले आ रहे हैं।
हालाँकि, हाल के वर्षों में, एक गंभीर सवाल उठना शुरू हो गया है: क्या भारत का संसदीय लोकतंत्र अपनी मूल भावना से भटक रहा है? ऐसे कई उदाहरण हैं—जो संसदीय प्रक्रियाओं, विधायी प्रक्रियाओं और संस्थागत कामकाज से जुड़े हैं—जो इस चिंता को और गहरा करते हैं। इसके अलावा, यह आशंका केवल भारत तक ही सीमित नहीं है; दुनिया भर के विभिन्न लोकतंत्रों में भी इसी तरह के रुझान देखे गए हैं।
ये उदाहरण हमें उन कमियों को समझने का अवसर देते हैं जिनके कारण कोई लोकतंत्र अपने मूल आदर्शों से भटक सकता है, और किन सिद्धांतों को मजबूती से बनाए रखना आवश्यक है।
राजनीतिक वैज्ञानिक जब अधिनायकवादी शक्तियों की बात करते हैं तो वे हमेशा कोई खुले तौर पर तानाशाही व्यवस्था की बात नहीं करते हैं। वे ऐसी स्थिति का उल्लेख करते हैं जिसे “प्रतिस्पर्धी अधिनायकवाद” कहा जाता है। इसमें चुनाव होते रहते हैं और व्यवस्था औपचारिक रूप से लोकतांत्रिक दिखाई देती है, लेकिन धीरे-धीरे संस्थागत संतुलन कमजोर होने लगता है।
सत्ता में आने वाला नेतृत्व लोकतांत्रिक तरीके से पद तो पा लेता है, लेकिन धीरे-धीरे वह उन संस्थाओं को कमजोर करने लगता है जो उसे नियंत्रित करती हैं और उसकी देखभाल करती हैं।
अमेरिका में पिछले दशक में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों में इतना वैचारिक भेद हो गया है कि कुछ विषयों पर सहमति बनना मुश्किल हो जाता है। जब लोकतंत्र में बहस, संवाद और समझौते की जगह सिर्फ टकराव रह जाता है, तो विधायिका की कार्यक्षमता कमजोर होने लगती है।
भारत के लिए यह पहला सबक है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में भी संसद में संवाद और बहस को कमजोर नहीं होने देना चाहिए, जो देश में हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा तेजी के साथ बढ़ रहा है। इसका सबसे उम्दा उदाहरण तब देखने को मिला जब भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने भरे सदन में तत्कालीन बसपा सांसद दानिश अली को संसद के अंदर गाली-गलौज और धर्म के आधार पर अपमानित किया।
संसद के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब सदन के किसी सदस्य द्वारा ऐसी घिनौनी करतूत किए जाने पर कोई ठोस एक्शन ना लिया गया हो। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मामूली सी हिदायत देते हुए बिधूड़ी के मामले को रफा-दफा किया।
भारत की संसद को लोकतंत्र का मुख्य मंच कहा जाता है, जहाँ जनता के प्रतिनिधि सरकार को जवाबदेह ठहराते हैं और नीतियों पर एक व्यापक चर्चा की जाती है। किन्तु संसद की कार्यवाही के आंकड़ों के अनुसार, संसद में बहस और कार्यवाही का समय लगातार कम होता जा रहा है।
वर्ष 2009 से वर्ष 2014 के बीच 15वीं लोकसभा की कार्यवाही लगभग 356 दिनों तक चली थी, जो कि एक वर्ष के औसतन दिनों के रूप में लगभग 71 दिन थी। दूसरी ओर वर्ष 2019 से वर्ष 2024 के बीच लोकसभा की कार्यवाही महज 274 दिनों तक ही चली। यानी हर साल में औसतन 55 दिन।
संसदीय लोकतंत्र में यह देखना बेहद जरूरी और आवश्यक भी है कि संसद सुचारू रूप से चले और जनहित के विषयों पर बहस हो सके। लेकिन जब भी जनहित के विषयों पर विपक्ष ने कोई मुद्दा उठाया तो उसे लोकसभा स्पीकर ने ‘विपक्ष के कोलाहल’ का हवाला देकर सदन स्थगित कर दिया या सांसदों का निलंबन कर दिया।
मणिपुर, अडानी, पहलगाम हमला और भी ऐसे कई मुद्दें हैं जिन पर विपक्ष की लगातार मांग के द्वारा लोकसभा स्पीकर ने लगातार कई दिनों तक संसद को स्थगित किया। एक ही संसदीय सत्र में लगभग 140 संसद सदस्यों का निलंबन भारतीय संसदीय इतिहास में अभूतपूर्व है। इतने बड़े पैमाने पर विपक्षी संसद सदस्यों के अनुपस्थिति में ही कई विधेयक पारित हो चुके हैं।
दूसरी ओर लोकसभा के उपाध्यक्ष का पद लंबे समय से खाली पड़ा है, जो संसद परंपराओं से जुड़ी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। संसद की परंपरा में लोकसभा उपाध्यक्ष का पद अक्सर विपक्ष को दिया जाता था। इसका उद्देश्य यह था कि सदन के संचालन में केवल सत्ता पक्ष की ही नहीं, बल्कि विपक्ष की भी एक सम्मानजनक और संस्थागत भागीदारी बनी रहे, ताकि सदन में निष्पक्षता बनी रहे। यह एक प्रतीक था कि लोकतंत्र में असहमति कोई बाधा नहीं, बल्कि व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है।
सरकार बहुमत से चलती है, लेकिन लोकतंत्र संतुलन से चलता है।
दूसरा बड़ा सबक चुनावी चंदा और कॉर्पोरेट फंडिंग से जुड़ा है। अमेरिकी लोकतंत्र का एक बड़ा संकट यह रहा है कि वहाँ चुनावी राजनीति पर कॉर्पोरेट समूहों, लॉबिंग नेटवर्क और बड़े आर्थिक हितों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। जब चुनाव लड़ने, प्रचार करने और जनमत बनाने की प्रक्रिया में पैसा बहुत बड़ी भूमिका निभाने लगे, तो लोकतंत्र की प्रतिस्पर्धा बराबरी की नहीं रह जाती। फिर चुनाव विचारों, नीतियों और जनता के मुद्दों से कम, और संसाधनों, प्रचार-तंत्र और आर्थिक ताकत से ज्यादा प्रभावित होने लगते हैं।
धीरे-धीरे यह खतरा पैदा होता है कि निर्वाचित सरकारें जनता से ज्यादा उन आर्थिक शक्तियों के प्रति संवेदनशील हो जाएँ, जिन्होंने चुनावी प्रक्रिया को वित्तीय सहारा दिया।
इसलिए भारत को अमेरिकी लोकतंत्र की इस कमजोरी से सबक लेना चाहिए। चुनावी चंदे की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें पारदर्शिता हो, जवाबदेही हो और जनता को यह स्पष्ट जानकारी मिले कि राजनीतिक दलों को चंदा कहाँ से मिल रहा है।
तीसरा बड़ा सबक अमेरिका में चुनावी राजनीति अक्सर राष्ट्रपति उम्मीदवारों के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती है। यह अक्सर ऐसा लगता है जैसे संस्थागत प्रक्रियाओं की तुलना में व्यक्तिगत नेतृत्व को अधिक प्राथमिक स्थान दिया जा रहा है। भारत का संवैधानिक ढाँचा इससे अलग है।
यहाँ संसदीय लोकतंत्र है, जिसकी मूल भावना यह है कि शासन सिर्फ एक व्यक्ति के भरोसे नहीं, बल्कि संसद, मंत्रिपरिषद, राजनीतिक दलों, कैबिनेट प्रणाली और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के सामूहिक संचालन से चलता है। यदि राजनीति व्यक्तित्व-केंद्रित हो जाती है तो संसद और संस्थाओं की भूमिका कम हो सकती है।
यदि पिछले तीन लोकसभा चुनावों और 2023 के 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखें, तो इसका स्पष्ट रूप दिखाई देता है। भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी अभियान में “मोदी की गारंटी” को एक केंद्रीय नारे के रूप में स्थापित किया। यहाँ तक कि कई जगहों पर चुनावी विमर्श में पार्टी का नाम और स्थानीय उम्मीदवारों की भूमिका पीछे चली गई थी।
इसी संदर्भ में संसद और संसदीय संस्थाओं की भूमिका को समझना और भी महत्वपूर्ण है।
विकसित लोकतंत्र में अक्सर विधेयक को संसद में भेजा जाता है जहाँ बाद में उन्हें स्थायी समितियों में भेजा जाता है और विशेषज्ञों से राय पूछी जाती है। भारत में संसदीय समितियाँ इसी उद्देश्य से तैयार की गई थीं, लेकिन 17वीं लोकसभा में केवल 16% विधेयक ही समितियों को भेजे गए, जो पिछली लोकसभाओं की तुलना में काफी कम है।
हाल ही में कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर समिति समीक्षा के बिना ही संसद में पारित हो गए हैं। उदाहरणस्वरूप, वर्ष 2020 में पारित हुए कृषि कानूनों पर संसद में चर्चा हुई, लेकिन समिति समीक्षा नहीं हुई और पारित हो गए। इसी तरह, वर्ष 2023 के शीतकालीन सत्र में 140 विपक्षी सांसदों के निलंबन के बाद नए आपराधिक कानून पारित किए गए। एक नया क्रिमिनल लॉ लाया गया, जो पूरे देश के क्रिमिनल कोर्ट के प्रोसीजर को बदल देने वाला है, जो स्टेट्स के लॉ एंड ऑर्डर को डायरेक्टली अफेक्ट करता है।
भारत का लोकतंत्र ऐतिहासिक रूप से बहुलता, संवाद, और संस्थागत संतुलन पर आधारित रहा है। यह व्यवस्था केवल तभी मजबूत हो सकती है जब संसद केवल एक औपचारिक संस्था के रूप में काम न करे, बल्कि एक जीवंत लोकतांत्रिक मंच के रूप में काम करे।
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।)

