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*मीडिया मार्केट और सत्ता की साझेदारी:देश में सवालों की प्राथमिकता मीडिया कैसे बदल देती है*

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भारत को लेकर तेल, टैक्स और मरी हुई अर्थव्यवस्था मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो टिप्पणी की वह भारत जैसे देश की संप्रभुता, अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाज पर बड़े सवाल खड़े करती है। जाहिर है देश में सबसे बड़ी बहस यही होनी चाहिए थी। यह बहस तय करती कि सच में हम एक गतिशील अर्थव्यवस्था बन रहे हैं या मृत उत्पादक के रूप में तब्दील होते जा रहे हैं। लेकिन यह बहस नहीं होगी।

मीडिया मार्केट और सत्ता की साझेदारी व रिसर्च इतना सटीक है कि इसे कोई गैरजरूरी मुद्दा भी नहीं कह पाएगा। जो तार्किक और तुलनात्मक रूप से कहने की कोशिश करेगा उसकी जुबान फेवीक्विक कर दी जाएगी या बोलने के मौके को म्यूट कर दिया जाएगा….

सवाल है कि बहस का माहौल बनाया किस पर बनाया जा रहा है, तो वह है अनिरूद्धाचार्य के विवादित महिला विरोधी बयानों, बाबा बागेश्वर के यहां से छुपाकर ले जाई जा रही एंबुलेंस वाली महिलाओं और बाबा प्रेमानंद द्वारा महिलाओं की पवि​त्रता संबंधी किए गए उटपटांग बयानों पर। मीडिया मार्केट और सत्ता की साझेदारी व रिसर्च इतना सटीक है कि इसे कोई गैरजरूरी मुद्दा भी नहीं कह पाएगा।

जो तार्किक और तुलनात्मक रूप से कहने की कोशिश करेगा उसकी जुबान फेवीक्विक कर दी जाएगी या बोलने के मौके को म्यूट कर दिया जाएगा। और उधर अच्छी बात यह होगी मीडिया को टीआरपी भी मिल जाएगी, बाबा और चर्चित हो जाऐंगे, जनता को सेक्स ज्ञान की बहस में मजा आ जाएगा और जिन्हें अर्थव्यवस्था को लेकर सच बयानी करते हुए किंतु—परंतु करना पड़ता, वह भी साफ सुथरी उज्जवल—धवल छवि में पुनश्च आपके सामने, मित्रों के संबोधन के साथ उपस्थित मिलेंगे।

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