Site icon अग्नि आलोक

*नेपाल में सत्ता परिवर्तन हेतु हिंसक क्रांति कितनी कारगर होगी?*

Share

 -सुसंस्कृति परिहार 

नेपाल में एक लुटेरी भ्रष्ट कम्युनिस्ट सरकार को जिस अपमानजनक तरीके से, युवाओं के आक्रोश ने हिंसक क्रांति के ज़रिए सिर्फ 48 घंटों में ज़मींदोज़ कर दिया वह आश्चर्यजनक नहीं है। कम्युनिस्ट जिसे एक आदर्श के रुप में नेपाली जनता ने राजशाही को हटाकर एक जनतांत्रिक शासन की स्थापना  2006से की थी।उसने अवाम के साथ जितनी असंवेदनशीलता दिखाई उसका परिणाम यह रहा कि ये सरकार तकरीबन 17 बार बदल बदलकर देश का शोषण करती रहीं जिसे युवाओं ने भली-भांति समझते हुए ऐसे लुटेरों को सबक सिखा दिया है।यह तमाम दुनिया में लूट कर रही सरकारों के लिए सबक है।

भारत नेपाल के बीच हज़ारों किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है और लंबी राजशाही के दौर से भारत से जुड़ा हुआ है। हिंदू राष्ट्र का खिताब जब से नेपाल से छिना है उसे पाने भारत बुरी तरह बेताब है।जेनजेड आंदोलन ने यह बता दिया है कि उसे ब्राह्मण और क्षत्रिय बर्चस्व नहीं चाहिये। कम्युनिस्ट शासन में भी इसकी पुनरावृत्ति हुई।जिससे  युवा आक्रोश पनपा। नेताओं की बढ़ती अमीरी और अवाम में बढ़ी गरीबी ने भी देश को झकझोर दिया।युवा साफ़ कह रहे हैं कि रसूखदारों के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं और आम नेपाली बच्चे के लिए शिक्षा का प्रबंध ना के बराबर है।

हालांकि इन युवाओं की आगजनी और हिंसा के पक्ष में कोई नहीं है किंतु हम जानते हैं युवाओं के दिल में जब आग सुलगती है तो वह आसमां को भी रुला देती है। सरकारी लोकसदन,मंत्री निवास ,कार्यालय और वाहन जलाए गए वह कतई उचित नहीं।देश की संपत्ति का नुक़सान है लेकिन नेपाल की जनता इसे कारगर इलाज के रुप में देख रही है।

कहा जा रहा है मोदीजी के प्रिय गौतम अडानी ने देश के प्रधानमंत्री ओली को खरीद लिया था। विदित हो अडानी नेपाल में इंफ्रा में पैसा लगा रहा था। तीन बार  के प्रधानमंत्री ओली और चौथी बार जुलाई 2024 में 14 माह के राज में ओली ने न सिर्फ अदानी, बल्कि  उसके जैसे कुछ और भी घूसखोर लुटेरों को दोस्त बनाया, नतीजा सामने है,ओली की कम्युनिस्ट पार्टी और समर्थन दे रही नेपाली कांग्रेस–दोनों के नेता और चापलूस अफसर मालामाल हुए। जेनजेड के युवाओं ने अडानी हाऊस में घुसकर तोड़फोड़ और आगजनी की । बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार से अडानी पावर बेचने की डील कर रहा था। दोनों का हश्र एक जैसा हुआ। युवा यह समझ गए। इसलिए बिगुल फूंका गया। यह सच्चाई नेपाल के मीडिया ने भी सामने रखी थी।

विदित हो, नेपाल के डिपार्टमेंट ऑफ़ फ़ॉरेन एम्प्लॉयमेंट के अनुसार, यहाँ से हर दिन औसत 2200 लोग खाड़ी के देशों के अलावा मलेशिया और दक्षिण कोरिया जा रहे हैं। विदेशों में काम कर रहे 40 लाख नेपाली घर में पैसा भेजते हैं, जो देश की जीडीपी का 28% है। दूसरी आमदनी खेती है, जो जीडीपी का 25% है। बाकी टूरिज्म से 7% कमाई होती है। 

यह पैसा करप्शन के गर्त में जाना 15–25 साल के युवाओं को मंजूर नहीं था–खासकर तब, जबकि वे हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद गरीब हों और नेताओं–अफसरों की औलादों फाइव स्टार में ऐश कर रही हो।

कहा जा रहा है कि जेनजेड के युवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ही लड़े हैं ऐसा नहीं है वे लंबे समय से सरकार की गतिविधियों के खिलाफ तैयारी कर रहे थे ये ज़रुर हुआ है कि जब उनके संपर्क और सम्बंधों को रोका गया तो युवा हिंसक हो गए।

इसकी तह में जो संघीय ताकतें हिंदू राष्ट्र वापसी की मांग कर रही थी इस आंदोलन की सफलता से मज़बूत हुई हैं और पुनः सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रही हैं।अंतरिम सरकार का गठन भी जेनजेड के विचारों के अनुरूप बननी चाहिए।एक गणतांत्रिक देश में यदि फिर ये ताकतें सत्ता में पहुंचती है तो जेनजेड की इस क्रांति का लाभ नेपाल को नहीं मिलेगा। क्योंकि राजशाही और मनुवादी ताकतें  हिंदू के नाम पर ब्राह्मण और क्षत्रिय के साथ अन्य कौमों को गुलाम ही रखना चाहती हैं कभी उनके समुचित विकास के लिए काम नहीं करेंगी। काठमांडू के मेयर बालेन शाह को जनता पसंद कर रही है किंतु उन्हें अपनी विचारधारा का खुलासा कर उसके अनुरूप देश को मुकाम पर पहुंचाने के लिए गंभीरता से सोचना होगा। क्योंकि भीड़ सरकार गिरा सकती है।उसकी दिशा यदि स्पष्ट नहीं होती तो वह टिक नहीं सकती।ऐसा नेपाल में चौदह बार हो चुका है।

इसे भारत में मौजूदा संघी भाजपाई सरकार के कामों से समझा जा सकता है। नेपाल का भविष्य अमेरिका और चीन के हां मैं हां मिलाने से संभव नहीं है।यदि जेनजेड अपनी इस क्रांति के ज़रिए लोक गणराज्य स्थापित रखते हुए विकास की राह चुनता है तो यह एक उम्दा निर्णय होगा। राजशाही की चमक धमक की जगह उसे नेपाल के आम नागरिकों के अंधेरे को रोशन करने संकल्पित होना होगा। दबे पांव राजशाही और हिंदु राष्ट्र वापसी की पदचाप इस हिंसक क्रांति का फायदा ना उठा पाए सचेत रहने आवश्यकता है।

Exit mobile version