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इतिहास को कैसे बदला जा रहा है? — NEP 2020, पाठ्यपुस्तकें और इतिहास लेखन

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–        तेजपाल सिंह ‘तेज’

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            इतिहास केवल अतीत का विवरण नहीं होता; वह समाज की सामूहिक स्मृति, पहचान और भविष्य की दिशा को भी प्रभावित करता है। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा-व्यवस्था में इतिहास की भूमिका इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यही विषय छात्रों में आलोचनात्मक सोच, विश्लेषणात्मक क्षमता और सामाजिक चेतना विकसित करने का माध्यम बन सकता है।

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत प्रस्तुत उद्देश्यों में विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक दृष्टि, तार्किक सोच और 21वीं सदी की चुनौतियों के प्रति संवेदनशील नागरिक तैयार करने की बात कही गई है। किंतु आलोचकों का मत है कि वास्तविक पाठ्यपुस्तकों की सामग्री इन उद्देश्यों के विपरीत दिशा में जाती दिखाई देती है। इस संदर्भ में इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या इतिहास को वस्तुनिष्ठ रूप से पढ़ाया जा रहा है, या फिर उसे पूर्वनिर्धारित वैचारिक ढाँचे में ढालकर प्रस्तुत किया जा रहा है? प्रस्तुत निबंध में इसी विमर्श को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास किया गया है।

1. उद्देश्य और वास्तविकता का अंतर

            पाठ्यपुस्तकों में यह कहा गया है कि विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक क्षमता विकसित की जाएगी ताकि वे तथ्यों का स्वयं मूल्यांकन कर सकें। किंतु आलोचना यह है कि कई स्थानों पर घटनाओं और व्यक्तियों को पहले से ही “नायक” और “खलनायक” की श्रेणियों में बाँट दिया गया है। जब किसी काल या शासक के बारे में मूल्य-निर्णय पहले ही दे दिया जाए, तो छात्र के लिए स्वतंत्र विश्लेषण की गुंजाइश कम हो जाती है। इतिहास का अध्ययन तथ्यों और बहुविध दृष्टिकोणों पर आधारित होना चाहिए, न कि पूर्वनिर्धारित निष्कर्षों पर।

2. ‘अंधकार युग’ और ऐतिहासिक शब्दावली का प्रश्न

            मध्यकाल को “अंधकार युग” कहने पर भी गंभीर आपत्ति व्यक्त की जाती है। आधुनिक इतिहास लेखन में इस शब्द का प्रयोग लगभग समाप्त हो चुका है, क्योंकि इतिहासकार मानते हैं कि मानव सभ्यता में ऐसा कोई काल नहीं रहा जिसमें प्रगति पूरी तरह रुक गई हो। आलोचकों का कहना है कि ऐसी शब्दावली विद्यार्थियों के मन में एकतरफा धारणा बनाती है और इतिहास की जटिलता को सरल तथा वैचारिक रूप से पक्षपाती ढंग से प्रस्तुत करती है।

3. मंदिर विध्वंस: अधूरा और चयनात्मक इतिहास

            पाठ्यपुस्तकों में मंदिरों के ध्वंस को अक्सर केवल धार्मिक कारणों से जोड़ा गया है, विशेषकर सुल्तानों और मुगलों के संदर्भ में। जबकि इतिहासकारों के अनुसार मंदिर विध्वंस के कारण बहुआयामी थे — राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक और प्रतीकात्मक। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ विभिन्न धर्मों के शासकों ने भी राजनीतिक कारणों से मंदिरों या धार्मिक संस्थानों को निशाना बनाया। उदाहरणस्वरूप:

·         मराठा सेनाओं द्वारा कुछ मंदिरों और मठों की लूट,

·         कश्मीर और बंगाल के प्राचीन शासकों द्वारा धार्मिक संरचनाओं पर आक्रमण,

·         जैन और बौद्ध स्थलों के रूपांतरण के उदाहरण।

इन उदाहरणों का उल्लेख न होना इतिहास को अधूरा बना देता है और विद्यार्थियों को समग्र समझ से वंचित करता है।

4. सांस्कृतिक आत्मसात और मध्यकालीन योगदान

            आलोचना का एक प्रमुख बिंदु यह है कि मध्यकालीन भारत को मुख्यतः संघर्ष और आक्रमण की भाषा में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि सांस्कृतिक आत्मसात (cultural assimilation) की प्रक्रिया को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। वस्त्र, खान-पान, स्थापत्य, भाषा और तकनीक में मध्यकालीन प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है — जैसे कुर्ता, अचकन, कई व्यंजन, सिंचाई तकनीकें और वस्त्र निर्माण की प्रक्रियाएँ। इतिहास का उद्देश्य केवल संघर्ष दिखाना नहीं, बल्कि समाज में हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी समझाना होना चाहिए।

5. जाति और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों का लोप

            21वीं सदी की प्रमुख सामाजिक चुनौतियों में जाति-आधारित भेदभाव और सांप्रदायिकता को महत्वपूर्ण माना जाता है। आलोचकों का कहना है कि नई पाठ्यपुस्तकों में “जाति” जैसे स्पष्ट शब्दों को “सामाजिक वास्तविकता” जैसे सामान्य शब्दों से बदल दिया गया है, जिससे समस्या की गंभीरता कम दिखाई देती है। इसी प्रकार, आधुनिक भारत की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं और दंगों के संदर्भों को हटाए जाने पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। तर्क यह दिया जाता है कि कठिन या विवादास्पद इतिहास से बचना छात्रों को वास्तविक सामाजिक चुनौतियों से दूर कर सकता है।

6. आर्य प्रवास और वैज्ञानिक अध्ययन का विवाद

            आर्यों की उत्पत्ति और प्रवास का प्रश्न लंबे समय से इतिहास, भाषाविज्ञान और आनुवंशिकी के अध्ययन का विषय रहा है। आलोचना यह है कि पाठ्यपुस्तकों में कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों को चयनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिससे छात्रों को यह आभास हो सकता है कि विषय पर एक ही निष्कर्ष सर्वमान्य है। इतिहास और विज्ञान दोनों में विभिन्न सिद्धांतों और प्रमाणों को संतुलित रूप से रखना आवश्यक है, ताकि विद्यार्थी स्वयं तर्क और प्रमाण के आधार पर निष्कर्ष निकाल सकें।

7. इतिहास शिक्षा और आलोचनात्मक सोच का संकट

            विद्यालयों में इतिहास को अक्सर रटने वाला विषय मान लिया जाता है। यदि पाठ्यपुस्तकें भी बहस और विश्लेषण की जगह केवल निश्चित कथन प्रस्तुत करें, तो छात्रों में प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ सकती है। एक कुशल शिक्षक इतिहास को जीवंत बना सकता है, लेकिन यदि पाठ्यक्रम स्वयं सीमित हो, तो आलोचनात्मक सोच विकसित करना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि इतिहास शिक्षा की गुणवत्ता केवल सामग्री ही नहीं, बल्कि शिक्षण पद्धति पर भी निर्भर करती है।

8. उच्च शिक्षा और विशेषज्ञता का प्रश्न

            आलोचकों का मानना है कि विश्वविद्यालयों में भी इतिहास लेखन और पाठ्यक्रम निर्माण में विशेषज्ञता को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। यदि शोध और अकादमिक स्वतंत्रता सीमित हो जाए, तो इतिहास का अध्ययन और अधिक एकांगी हो सकता है। इतिहास एक निरंतर विकसित होने वाला विषय है, जिसे नए शोध, नए प्रमाण और नए दृष्टिकोण लगातार समृद्ध करते रहते हैं।

            सारांशत: इतिहास का उद्देश्य केवल गौरव गान या दोषारोपण नहीं होना चाहिए; उसका मूल उद्देश्य समझ विकसित करना है। एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज में इतिहास शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों को प्रश्न पूछना सिखाए, विविध दृष्टिकोणों को समझने की क्षमता दे और अतीत को जटिलता सहित देखने का साहस प्रदान करे। यदि पाठ्यपुस्तकें किसी एक वैचारिक दृष्टि को ही अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं, तो यह विद्यार्थियों की बौद्धिक स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है। दूसरी ओर, यदि इतिहास को संतुलित, बहुपक्षीय और प्रमाण-आधारित ढंग से पढ़ाया जाए, तो वही इतिहास समाज में सहिष्णुता, संवाद और विवेकपूर्ण नागरिकता की नींव बन सकता है। अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि इतिहास में क्या लिखा जा रहा है, बल्कि यह है कि भविष्य की पीढ़ियाँ अतीत को किस दृष्टि से समझेंगी — जिज्ञासा और आलोचनात्मक सोच के साथ, या पूर्वनिर्धारित निष्कर्षों के साथ।

( डा. रिचा शर्मा – इतिहासकार : https://youtu.be/YxpCeXzqXNI?si=g7gyRXD6LjxUhxYT)

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