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संवैधानिक संगठनों पर सरकार का अवैधानिक कब्जा कितना सही

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ओमप्रकाश मेहता

प्रजातंत्र की मौजूदा अहमियत को लेकर आज यह अहम् सवाल उठाया जा रहा है कि हमारे संविधान ने जिन्हें संवैधानिक रूप से स्वतंत्र इकाईयों का दर्जा दिया और जिन्हें अब तक सरकारी नियंत्रण से दूर रखा गया, उन संगठनों को सरकार अपने नियंत्रण में लेकर गैर संवैधानिक कार्य करवाने को मजबूर कर रही है?

यह आशंका अवैध नियंत्रण में घूटने वाले दलों ने नही बल्कि राजनीतिक विपक्षी दलों ने की है, विपक्षी दलों का मुख्य आरोप ही यही है कि स्वतंत्रतापूर्वक अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन इसलिए नही कर पा रहे है, क्योंकि सरकार उनके कार्यों में हस्तक्षेप कर रही है।

अब ये आरोप-प्रत्यारोप कहां तक सही या गलत है? यह तो फिलहाल नही का जा सकता। किंतु देश के प्रतिपक्षी दलों ने इस मुद्दें को मोदी सरकार के खिलाफ एकजुटता का मुख्य मुद्दा अवश्य बना लिया है, जिसकी पहल उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल की प्रमुख नैत्री ममता बैनर्जी से बातचीत कर जरूर की है और अब इसी लीक पर देश के सभी प्रमुख विपक्षी दल मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट होने का प्रयास कर रहे है।

इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि अब तक के प्रमुख प्रतिपक्षी दल कांग्रेस की अहमियत खत्म होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर कोर्ठ प्रमुख प्रतिपक्षी दल नही रहा है और इसीलिए कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी पार्टी, सीजीएम आदि सभी प्रमुख दल एकजुट होकर संयुक्त विरोधी मोर्चें के गठन की तैयारी कर रहे हैं, जो अगले लोकसभा चुनाव-2029 के पहले अपना पुख्ता रूप अख्तियार कर सकें, क्योंकि देश के प्रमुख प्रतिपक्षी दलों में से कांग्रेस सहित किसी भी दल में मोदी के खिलाफत सख्ती से खड़े रहने की ताकत शेष नही रह गई है, इसलिए कोई आश्चर्य नही होगा कि तीन साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के समय सभी प्रतिपक्षी दल एकजुट होकर मोदी का विरोध करें? और सरकार के चुनाव आयोग, न्यायपालिका व अन्य स्वतंत्र संवैधानिक अंगों को प्रतिपक्ष एकजुट होकर उनकी अस्मिता की रक्षा का बिगुल फूंक सकता है।

और यह मुख्य चुनावी मुद्दा भी बना सकता है, क्योंकि अब कोई भी स्वतंत्र संवैधानिक संगठन स्वतंत्रता से काम नही कर पा रहा है, ऐसा प्रतिपक्ष को आरोप है और यह मुद्दा अब धीरे-धीरे अहम् बनता जा रहा है। अब मुख्य चर्चा यही है कि इसी मुद्दें पर सभी प्रमुख प्रतिपक्षी दल एकजुट हो जाते है और संयुक्त रूप से मोदी सरकार के खिलाफ खड़े होते है, तो फिर देश की राजनीति कौनसा रूप धारण करती है और उसके परिणाम क्या होगें? आज यही चर्चा का मुख्य विषय है।

(यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है)

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