प्रस्तुति : पुष्पा गुप्ता
साहूकार साहब जी,
किसी को पप्पू प्रचारित कर आप अपनी राजनीति की दुकान कब तक चलाएंगे? यह नीति आपके लिए सूट कर सकती है लेकिन यह भारतजन के स्वभाव की नीति नहीं हो सकती! यह आपकी पार्टी नीति हो सकती है, लेकिन यह लोकनीति नहीं हो सकती।
राजनीति में लांछना की नीति थोड़े समय के लिए किसी को भटका सकती है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं।
चरित्रहनन की राजनीति बताती है कि आपके पास अपना कुछ बताने के लिए नहीं है, आप जिसका चरित्रहनन कर रहे हैं, दरअसल आपकी राजनीति के केंद्र में वही व्यक्ति मुख्य है।
लोग अभिनय पसंद करते हैं, इसका यह मतलब कतई नहीं कि लोग अभिनय को ही जिंदगी मान लें। यह हकीकत है कि लोग फ़साना सुनते हैं, आनंदित होते हैं, अगर उसमें जिंदगी को ख़ुशनुमा बनाने के लिए कुछ अच्छा होता है, तो वह उसको भी आत्मसात करते हैं, लेकिन फसाने को हकीकत नहीं मान लेते।
एक संगठन/पार्टी-विशेष की नीति हमेशा से चरित्रहनन की नीति रही है। वह गांधी का चरित्र हनन करती है, वह नेहरू का चरित्रहनन करती है, वह सोनिया गांधी का चरित्र हनन करती है, और तो और वह अब राहुल गांधी का भी चरित्र हनन करती है।
नेहरू के साथ उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को साथ दिखाकर, अनर्गल टीकाटिप्पणी करना इन्हें ज्यादा पसंद आता है। अब किसी के शगल को क्या कहा जाय। शगल भी तरह-तरह के होते हैं।
राहुल की अमेरिका में ड्रग के साथ गिरफ्तारी और फिर अटल जी के द्वारा उनको छुड़वाने की कहानी गढ़ी गयी। पर हासिल क्या रहा??
जब केंद्रीय सरकार की एक महत्वपूर्ण मंत्री राहुल की भारत जोड़ो यात्रा को बदनाम करने के लिए यह सफेद झूठ बोलती हैं कि राहुल ने भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत करते समय विवेकानंद की मूर्ति को प्रणाम और आशीर्वाद लेने की जरूरत नहीं समझी, तब आप समझ सकते हैं कि स्थितियां कहां तक पहुँच चुकी हैं और इन मंत्रियों की नैतिकता का स्तर क्या है।
जवाब में तुरंत कांग्रेस सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से राहुल के विवेकानंद स्मारक स्थल की परिक्रमा और प्रणाम करने वाली फोटोज आनी शुरू हो गयी। बावजूद इसके कोई शर्म नहीं इनको।
क्या विधवा कहकर किसी को चिढ़ाने की भारतीय परंपरा रही है? शायद अब तक की राजनीतिक यात्रा में यह पहली बार हुआ है कि किसी के विधवापन को जुगुप्सादायक तरीके से राजनीतिक हथियार बनाया गया। सोनिया को कांग्रेस की विधवा कहना किस तरह के भारतीय संस्कार का प्रदर्शन था?
क्या इसी तरह के राजनीतिक व्यवहार से भारत के विश्वगुरु बनने की संभावनाएं देखी गयीं? क्या महिलाओं को इस नजरिये से देखने की भारतीय परम्परा रही है?
क्या राजीव गांधी जमीन-जायदाद के मामले में मारे गए थे, जो आप उनका मजाक उड़ा रहे हैं। अरे वह व्यक्ति देश पर कुर्बान हुआ है!! क्या उसकी पत्नी के लिए यही संवेदनाएं हैं आपकी?
आप गांधी की किताब का हवाला दे उनके ब्रह्मचर्य को लेकर जिस तरह व्हाट्सएप पर अनाप-शनाप लिखते हो, उनके जेल-जीवन को अय्याशी बताते हो, यह आपकी मनःस्थिति को जानने के लिए पर्याप्त है।
जो एक दिन भी जेल नहीं गए वे दूसरों की जेल-जीवन की मीमांसा कर रहे हैं…..
आप उतना ही गांधी के बारे में जानते हैं, जितना उन्होंने अपनी किताब के जरिये खुद को बताया। उनकी किताब पूरे विश्व के लिए पठनीय हैं और लोग पढ़ते हैं, पर आश्चर्य कि किसी ने गांधी को गलत नहीं कहा। गांधी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ भारत की राजनीति के केंद्र में थे और आज भी हैं। अन्यथा भारत के प्रधानमंत्री का विदेश में यह कहकर न परिचय कराया जाता कि ये गांधी-नेहरू के देश के प्रधानमंत्री हैं।
अन्यथा भारत के प्रधानमंत्री विदेश में गांधी की मूर्ति के सामने न नतमस्तक होते!
प्रखर हिंदूवादी मालवीय जी तक गांधी के सानिध्य के कायल थे! क्या मालवीय जी को उचित-अनुचित का ज्ञान नहीं था?
रही बात गांधी के निर्णयों की आलोचना का तो उसके लिए कहीं कोई बंदिश नहीं थी। सुभाष बाबू, पंडित नेहरू, मोतीलाल नेहरू और क्रांतिकारियों ने समय-समय पर उनकी कड़ी आलोचनाएं कीं।
गांधी अपनी सारी कमजोरियों के बावजूद पूरे विश्व के लिए श्रद्धेय हैं। आज भी भारत गांधी और नेहरू से जाना जाता है। आप कुंए के मेढक की तरह सीमित दायरे में टर्राते रहें तो टर्राते रहें। यह आपकी समस्या है, इतिहास बोध की नहीं।
आप इस चरित्र-हनन की राजनीति को बहुत लंबे समय तक नहीं खींच पाएंगे।
आप तत्कालीन राष्ट्रीय नायकों की आपस में अवांछनीय तुलना करके किसी को भी महत्त्वहीन साबित नहीं कर सकते। विद्वानों के बीच किसी मुद्दे पर मतवैभिन्नय होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र असहमतियों के बीच सहमति का रास्ता खोजता है।
लोकतंत्र असहमतियों का सम्मान करता है। वह आलोचना को सिर्फ़ सुनता ही नहीं बल्कि उसको सम्मान देता है।
आप बेशक गांधी और नेहरू के बरक्स सुभाष बाबू, पटेल और भगतसिंह को खड़ा करिये और उनको मानिए। इसमें कुछ भी गलत नहीं। ये सभी आदरणीय हैं और इनके कृतित्व/व्यक्तित्व से भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी, पर आप किसी को निशाना बनाने के लिए इन आदरणीय लोगों को कंधे के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते।
अगर अपनाना है तो समग्रता में अपनाइए, सिर्फ़ मतलबपरस्ती के लिए नहीं। सांप्रदायिक राजनीति के धुर विरोधी सुभाष, पटेल और भगतसिंह को सांप्रदायिक ताकतें अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करें, यह स्वीकार नहीं।
बेशक गांधी और नेहरू के हर निर्णय से सहमति नहीं जताई जा सकती। उनके कई निर्णयों से असहमतियाँ हैं। पर उनकी राष्ट्रभक्ति पर तो उनके धुर विरोधियों ने भी कभी शंका नहीं की। लेकिन आप कर रहें हैं।
यही आज आप राहुल के साथ कर रहें हैं। विपक्ष से सकारात्मक राजनीति की अपेक्षा रखने वाले शायद सकारात्मकता का अर्थ यही लगाते हैं कि विपक्ष सत्ता की गलत-सही हर नीतियों का समर्थन करे।
आप कृषि कानून संबंधी विधेयक बिना स्थायी समितियों में भेजे उनपर जबरन सहमति हासिल कर लें और विपक्ष आपका समर्थन करे, यह कैसे संभव है?
तकनीकी दृष्टि फायदा उठाकर राहुल गांधी की सदस्यता को ख़त्म करवाकर आप उन्हें राजनीति के परिदृश्य से बाहर नहीं कर सकते। आज यदि राहुल की जनस्वीकार्यता बढ़ रही है, तो इसकी वजह उनकी अपनी कार्यशैली है। जनता से खुद को जोड़ने की उनकी कोशिशें लोगों को पसंद आ रही हैं।
किसी के राजनीतिक विस्थापन की कीमत पर आप स्थायी नहीं हो सकते। निश्चित रूप से राहुल गांधी चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं, पर जिस तरह से वे भारत को समझने की कोशिश कर रहें हैं, वह स्वागतयोग्य है। वे सिर्फ़ उस परिवार में पैदा नहीं हुए हैं, जिसने भारत की राजनीति को एक नई दिशा दी है, वे सिर्फ़ उस परिवार में नहीं जन्मे हैं जिनमें तीन-तीन प्रधानमंत्री रहे हैं, बल्कि वे उस परिवार के भी रहे हैं, जिसके हिस्से में त्रासदियों का झंझावात आया।
उन्होंने अपने बचपन और युवावस्था में दादी और पिता की हत्याएं देखीं। पिता का तो शरीर भी ढूंढे न मिला था, सिर्फ जूतों से पहचाने गए थे।
वे उस परिवार की त्रासदी के भुक्तभोगी रहे हैं। दादी और पिता की दर्दनाक मौत से उपजे खालीपन को दुनिया की कोई संपत्ति नहीं भर सकती। व्यक्तित्व को प्रभावी बनाने के लिए मानवीय गुणों की आवश्यकता होती है न कि अमीरी-गरीबी।
राहुल यदि आज प्रासंगिक हो रहें हैं तो वे अपने सकारात्मक दृष्टिबोध के कारण न कि प्रक्षेपित किये जाने से। वे भारत को समझने की कोशिश कर रहे हैं, बिलकुल गांधी जी की तरह। वे नेहरू-गांधी की राह कितनी चल पाएंगे, यह तो वक्त बताएगा। फ़िलहाल आज की राजनीति के लिए यह सुखद है।
सारांश यह कि वे अपनी कमियों या अच्छाइयों से ही विस्थापित या स्थापित होंगे, आपके व्हाट्सएप प्रचार से नहीं।

