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कितना बदल गया इंसान?

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शशिकांत गुप्ते

दीपावली त्यौहार मनाने के लिए, गृहलक्ष्मी,लक्ष्मी पूजन की सामग्री ख़िरदने के लिए बाजार जाने को तैयार हुई।
साथ में चलने का आग्रह था। टालमटोल नहीं कर सकते हूँ। कारण यह आग्रह पलभर में आदेश में परिवर्तित हो सकता है।
मुझे साथ ले जाने का मुख्य कारण यह है कि, मै साथ रहूंगा तो मेरी जेब ही खाली होनी है। उनकी पर्स तो ज्यों की त्यों भरी ही रहेगी।
बाजार जाते हुए रास्ते में गृहलक्ष्मी ने पूछा क्या किसी भी दुकानदार से कोई भी खरीदी करने के पूर्व उसका कुल गौत्र, जाति धर्म पूछना अनिवार्य है?
इस सवाल का जवाब देना मेरे लिए नामुमकिन है।
इस सवाल ने मेरे मस्तिष्क को झकझोरकर रख दिया?
मुझे स्वतंत्रता सैनानी अशफ़ाक उल्ला खान और रामप्रसाद बिस्मिल की मित्रता का स्मरण हुआ। मेरे स्मृति पटल पर काकोरी कांड की याद ताजा हो गई।
स्वाभाविक ही स्वतंत्रता सैनानी मुझे मौलाना अबुल कलाम आजाद का स्मरण हुआ।
पाकिस्तान ने जंग लड़ते हुए शाहिद हुए अब्दुल हमीद याद आ गया।
मेरे स्मृति पटल पर जब यह सारी यादें उभर रही थी। उसी समय देखा एक बालक खाली बोतल में आकाश बाण पटाखा रख कर उसे जला रहा था। बाण की बत्ती में आग लगते ही बाण आकाश में उड़ा और एक धमाका सुनाई दिया।
आकाश बाण वाले पटाखे को देख कर मुझे मिसाईल मेन पूर्व राष्ट्रपति ऐ पी जे अबुल कलाम की याद आ गई।
यह तो चुनिंदा उदाहरण हैं।
मुझे सबसे महत्वपूर्ण देश का संविधान याद आ गया।
धर्मनिर्पेक्ष जैसा पवित्र शब्द याद आ गया।
मात्र 22 वर्ष की आयु में समाधि लेने वाले संत ज्ञानेश्वरजी का यह कथन याद आया, हे विश्व ची माझे घर अर्थात सम्पूर्ण विश्व ही मेरा घर है।
भूदान प्रणेता स्वतंत्रत सैनानी गांधी के अनुयायी आचार्य विनोबा कहते थे जय जगत
सबसे महत्वपूर्ण बात तो मुझे यह याद आ गया कि अपन इक्कीसवीं सदी में हैं।
अपना देश विश्वगुरु बनने के लिए लालायित है।
अहम प्रश्न तो यह है कि,
वसुधैवकुटुम्बकम् का ध्येय कभी पूर्ण होगा?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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