सुसंस्कृति परिहार
भाजपा शासित राज्यों में उत्तराखंड और असम के मुख्यमंत्री परिवर्तन के बाद काफ़ी ना नुकुर के साथ अंततः कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा अडवानी ,जोशी की तरह बीते कल की बात हो गए हैं। भाजपा मार्गदर्शक मंडल उनके इंतजार में है। येदियुरप्पा को ये मलाल है जिस तरह साईकिल पर चढ़कर भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया आज उसी पार्टी ने दो साल पूरे होने के बाद दरकिनार कर दिया। विधानसभा में वे अपने अश्रु थाम नहीं पाए वे बह निकले। उन्हें इस्तीफा देना ही पड़ा। उनके जाने के बाद मुख्यमंत्री बनने की दौड़ जारी है उधर येदियुरप्पा के लिए लिंगायतों का विरोध भी जारी है देखना यह है कि अगला मुख्यमंत्री लिंगायत ही होता है या अन्य कोई और उनके पुत्र की मंत्रीमंडल में क्या स्थिति रहती है?
बहरहाल, कर्नाटक में इस बदलाव के बाद अन्य भाजपा शासित राज्यों में मुख्यमंत्री बनने की चाहत रखने वाले उत्साहित हुए हैं। लग रहा है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का नाम अब जाने वालों की सूची में सबसे आगे है वे भी चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं इतने लंबे अर्से तक मुख्यमंत्री रहना भाजपा के लम्बरदारों को पसंद नहीं ।वे नहीं चाहते कि कोई और देश का भाग्य विधाता बने।दूसरी बात ये कि कांग्रेस अब जिस तरह प्रदेश में जाग गई है वह शिवराज के घोटालों की फेहरिस्त लेकर मामा की नींद हराम किए हुए है।तीसरे शिवराज संघ के कार्यकर्ता नहीं हैं और भाजपा के अंदर भी शिवराज के खिलाफ आग सुलग रही है जिसमें चंबल क्षेत्र बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। नरोत्तम मिश्रा, नरेन्द्र तोमर और ज्योतिरादित्य के नामों के बीच बी डी शर्मा प्रदेश अध्यक्ष अपने तईं प्रयासरत हैं किंतु समझा ये जा रहा है कि संघ यहां अपने किसी सक्रिय कार्यकर्ता को बिठाने का मन बना चुका है ताकि अंदरूनी विवाद को समाप्त किया जा सके।
हरियाणा के खट्टर साहिब हालांकि संघ के पक्के यार हैं ,कर्मठ कार्यकर्ता हैं लेकिन किसान आंदोलन में उनकी फजीहत जिस तरह हुई है उसे नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता इसलिए वहां भी बदलाव संभावित है।गोवा, गुजरात,हिमाचल ,मणिपुर और त्रिपुरा ,फिलहाल इस मुख्यमंत्री बदलो अभियान से दूर है ।वजह स्पष्ट है जहां विधानसभा चुनाव करीब है वहीं ये कवायद की जा रही है।
उत्तर प्रदेश की स्थिति दूसरी है और इससे सब अवगत हैं कि वहां भगवावस्त्र धारी योगी को उखाड़ने में मोदी शाह विफल रहे हैं क्योंकि उन्हें संघ का संरक्षण मिला हुआ है उनकी नीतियों को सबसे बेहतरीन तरीके से योगी ने यहां लागू किया हुआ है जो संघ को खुश करती हैं । ठीक उसी तरह जिस तरह सन 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह पर संघ फ़िदा हुआ था ।
लगता है संघ का ऐसा विचार है कि तमाम बदनाम मुख्यमंत्रियों से चुनाव के पूर्व किनारा कर लिया जाए ताकि जनता में संघ और भाजपा की छवि बनाई जा सके।देखा भी गया है कि पुराने घाघ ख़तरनाक होते हैं इसलिए उनकी सफ़ाई का बीड़ा संघ ने उठाया है।इसका कितना फायदा होगा यह कहा नहीं जा सकता लेकिन सरसरी तौर पर भाजपा की जो तस्वीर बनती है वह मोदी और शाह से बनती है । उन्हें खिसकाए बिना भाजपा की ज़मीन सुरक्षित नहीं रह सकती है । संघ को यह अभियान ऊपर से शुरू करना चाहिए तभी भाजपा कुछ उम्मीद कर सकती है ।मुख्यमंत्री बदलाव का ख़ास कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला ।उलटे असंतुष्ट असंतुलन बढ़ा देंगे ।

