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जीवन में कितना पैसा चाहिए 

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      पुष्पा गुप्ता 

  किसी भी प्रश्न पर सभी के अलग-अलग विचार हो सकते हैं पर अगर इस प्रश्न का कहा जाए तो इस प्रश्न से तात्पर्य है कि व्यवहारिक (practical) रूप से आप पैसे को कितनी अहमियत देते है। वरना बोला जाने के लिए तो लोग बोलते हैं,  “पैसा तो हाथ का मैल है.” पर जब असल ज़िंदगी की बात हो , तब सोच अलग होती है।

 सच में ज़िंदगी जीने के लिए इतना पैसा चाहिए कि ज़िंदगी की सभी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो जाएं। पर हम ऐसे बोलेंगे तो फिर तो हम संत ही हो गए जिन्हें इससे अधिक चाहिए ही नहीं। 

      अब देखिए चावल 20 rs किलो भी मिलते हैं और 200rs किलो भी , तो ज़िंदा रहने के लिए तो 20rs में भी काम चल जाएगा पर स्वाद का तो अंतर होगा ही। तो यहां पर बात आयेगी जीवन स्तर (Standard of Living ) की, कि किस स्थिति में पहुंच आपको लगे कि अब वो स्थिति आ चुकी जो आपके मन को तृप्त कर पा रही है।

जीने के लिए तो कम में भी गुजारा हो जाता है पर हमें ज्यादा पैसा अपने मन को तृप्त करने के लिए चाहिए  होता है। कभी – कभी मन की तृप्ति दिखावे से होती है , कभी पैसे को संजो कर रखने से। 

मुझे एक मैसेज आया जो किसी बैंक की योजना से संबंधित था। उसमें कहा गया था कि अगर आप अभी 25 लाख रुपए निवेश (invest) करते हैं तो 40 साल बाद आपको 7+ करोड़ रुपए मिलेंगे। ये तो एक बड़े स्तर पर निवेश की बात है , वैसे कम पैसे के निवेश का भी उस योजना में प्रावधान हो सकता है। 

  अब इस पर मेरा कहना ये है :- 

        मान लीजिए अभी आपकी आयु 30 वर्ष है , इसका मतलब आपको 70 साल में उस योजना के तहत पैसा मिलेगा । मुझे नहीं लगता 70 साल में इतने पैसे की ज़रूरत किसी को भी होगी.

    (अगर 70 साल के किसी व्यक्ति को इतने पैसे की ज़रूरत पड़ रही है तो उसे खुद की सोच को सुधारने की ज़रूरत है।)

    इसका मतलब ये हुआ कि जो भी निवेश आपने किया वो पैसा आपके बच्चों के लिए होगा , तो मेरे विचार से बच्चों के लिए सोचने की जरूरत आपको नहीं है। बच्चों के लिए इतना ही किया जाए कि वो अपनी जिंदगी चलाने के लिए सक्षम हों। 

   एक ज़िंदगी उन्हें भी मिली है जिसके लिए प्रयत्न भी उन्हें करने चाहिए। सब कुछ माता -पिता करके दे दें तो उनका अस्तित्व क्या रहा।

 आपकी ज़िंदगी का मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं होना चाहिए। बहुत कुछ है जो किया जा सकता है। अपनी सोच को विस्तार देने की जरूरत है।

    पैसा ज़िंदगी को सुचारू रूप से चलाने के लिए चाहिए ही होता है पर पैसा ज़िंदगी नहीं है। उसकी औकात जितनी है उतनी ही रखी जाए , अपने सिर पर बिठाने की ज़रूरत नहीं है।

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