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सियासी पटाखों के बमों में कितन दम है?

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शशिकांत गुप्ते

मनोरंजक सियासी खेल चल रहा है।सम्भवतः यह खेल मनोरंजन कर से मुक्त है?इस खेल की विशेषता यह है कि इस खेल में दोनों ओर से शब्दों रूपी तीर चलाए जा रहे हैं।
एक ओर वर्तमान और दूसरी ओर भूत पूर्व हैं।दोनो ओर से एक दूसरों पर शब्दिक बाणों की बौछार की जा रही है।
वर्तमान में जो कुर्सी पर तशरीफ़ फ़रमा हैं, उन्होंने धनतेरस के दिन ही पटाखें फोड़ दिएं हैं। वैसे तो पिछले एक सप्ताह से छोटे मोटे पटाखें तो फोड़ ही रहें हैं।
भूत पूर्व ने एलान है कि, दीपावली बाद वे छोटे मोटी लड़ नहीं सीधा बंम ही फोड़ेंगे।
वर्तमान में शब्दों के बाणों की आवाज में नशीले पदार्थो के तिज़ारत की ध्वनि सुनाई दे रही है।वर्तमान में जो लखनवी नावब हैं उनका कहना है कि जो भूत पूर्व देवों में इंद्र हैं,वे स्वयं और उनके दरबार के लोग मादक दवाई (ड्रग्स) की तिज़ारत करने वालों के साथ मित्रता रखतें हैं?
अब देखतें हैं, दीपावली बाद जो भूत पूर्व हैं, वे कौनसा अद्भुत किस्म का बंम फोड़ेंगे?
ध्यान में रखना चाहिए कि,इनदिनों जोर से आवाज करने वाले पटाखों पर न्यायालयीन प्रतिबंध है।
एक व्यंग्यात्मक खबर है कि, कुछ ही दिन पूर्व पडौसी देश के साथ खेली गई क्रिकेट मैच के परिणाम के बाद बहुत से पटाखे बगैर फोड़े फुस्स हो गए हैं?
हरबार की तरह अब की बार बहुत से उत्साहीलाल पटाखें फोड़ने से वंचित ही रह गए।
जो लोग हास्य और व्यंग्य के नाम पर फूहड़पन के टीवी पर प्रसारित होने वालें शो देखतें हैं।उन्होंने उपर्युक्त मनोरजंन युक्त सियासी खेल का मजा लेना चाहिए।
बहुत सी बार मैच को टाई होते देखने पर भी मजा आता है।बहुत से बार अच्छा निपुण खिलाड़ी भी शून्य पर ही बोल्ड हो जाता है।
खेल को खेल की भावना से ही खेलना,देखना चाहिए।
दर्शकों को सिर्फ अपने मनोरंजन से मतलब रखना चाहिए।
खेल कितना भी महंगा हो खिलाड़ी खेलते ही हैं।खेल के प्रायोजक उद्योगपति खिलाड़ियों को कीमती इनाम देतें रहतें है।
वास्तविक खेल और सियासी खेल में बुनियादी फर्क है।वास्तविक खेल में कितनी भी महंगी अंग्रेजी की Bet लगती हो,खिलाड़ी खेल की भावना से खेलतें हैं।कुछ व्यंग्यकारों मत है कि खेल की भावना से खेलने का अभिनय बखूबी करतें हैं?यह बहस का विषय है हो सकता है,इसे यहीँ पूर्ण विराम।
सियासी खेल में प्रतिस्पर्धा किस हद तक जाएगी यह कह पाना असम्भब है।सियासी खेल के खिलाड़ी बहुत सी बार प्रतिस्पर्धा करते हुए गलबहियां करने लग जाए तो दर्शकों को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
खेल और सियासत का तालमेल बैठ जाता है तब मैच के परिणाम के बाद खेल को मज़हबी रंग में रंगने की नादानीपूर्ण नासमझ कौशिश की जाती है।
मैच के परिणाम के बाद
कुछ अतिउत्साहीलाल पटाखों को हरे रंग में रंगने की साज़िश करतें हैं? वैसे हरा रंग शांति का प्रतीक माना गया है।
अंत में इतना ही कहना है कि ईश्वर अल्लाह तेरों नाम सबकों सन्मति दे भगवान।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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