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कैसे ताश के पत्तों की तरह ढह गया चाणक्य-चंद्रगुप्त के सपनों का अखंड भारत

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इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक दौर ऐसा था जब भारत की सीमाएं ईरान से लेकर बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फैली थीं. यह वह काल था जब मौर्य साम्राज्य की एक दहाड़ से यूनानी शासक कांपते थे. लेकिन, 185 ईसा पूर्व की वह एक सुबह सब कुछ बदल गई. सेना की परेड का निरीक्षण कर रहे अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ को उनके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सबके सामने मौत के घाट उतार दिया. इसी के साथ अखंड भारत का पहला सबसे बड़ा साम्राज्य मिट्टी में मिल गया. आइए जानते हैं कि आखिर वह कौन सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने इस विशाल सत्ता की नींव हिला दी.इतिहास की घड़ी को यदि हम लगभग 2300 साल पीछे घुमाएं तो हमें एक ऐसा भारत दिखता है जिसकी सीमाएं आज के अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक फैली थीं. यह मौर्यों का काल था. एक ऐसा साम्राज्य जिसकी नींव आचार्य चाणक्य की कूटनीति और चंद्रगुप्त मौर्य के पराक्रम पर टिकी थी. लेकिन, जिस साम्राज्य ने सिकंदर के सेनापतियों को धूल चटाई, वह आखिर कैसे अंदरुनी कलह और कमजोरियों की भेंट चढ़ गया?

तलवार की जगह ‘धम्म’ ने ली, क्या यही बनी कमजोरी?

मौर्य साम्राज्य के पतन की चर्चा सम्राट अशोक के जिक्र के बिना अधूरी है. 261 ईसा पूर्व के कलिंग युद्ध ने अशोक को बदल दिया. उन्होंने ‘भेरीघोष’ (युद्ध का नाद) छोड़कर ‘धम्मघोष’ (शांति का नाद) अपनाया. सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा का मार्ग त्याग दिया था. इतिहासकार बताते हैं कि अशोक की धम्म नीति ने जहां समाज को नैतिकता सिखाई, वहीं दूसरी ओर सेना को सुस्त कर दिया. सम्राट अशोक के शासनकाल में सैन्य शिथिलता एक बड़ी कमजोरी साबित हुई. जब राजा ने युद्ध न करने की शपथ ली तो दुनिया की सबसे बड़ी अनुशासित सेना धीरे-धीरे सुस्त होने लगी. युद्ध अभ्यास बंद हो गए और सैनिकों का मनोबल गिर गया.

अशोक का हृदय परिवर्तन: वरदान या अभिशाप?

वर्षों तक युद्ध न होने के कारण सैनिकों का कौशल कम हो गया और वे विदेशी आक्रमणों का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे. दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर भी ढिलाई दिखने लगी. अहिंसा के अत्यधिक पालन ने अपराधियों और विद्रोही तत्वों के मन से राजदंड का भय समाप्त कर दिया. सीमावर्ती प्रांतों में विद्रोह की सुगबुगाहट तेज होने लगी, जिसे दबाने के लिए सेना अब उतनी सक्षम नहीं रही थी. हालांकि, अशोक के समय तक साम्राज्य सुरक्षित रहा, लेकिन उनके बाद आने वाले शासक इस शांति और शक्ति के संतुलन को बनाए रखने में विफल रहे.

खाली होता खजाना और आर्थिक बोझ

किसी भी साम्राज्य को चलाने के लिए ‘धन’ रीढ़ की हड्डी होता है. अगर वह साम्राज्य विशाल हो और अपने विस्तार के चरमोत्कर्ष पर हो तो यह और भी आवश्यक होता है. इतिहास के जानकार बताते हैं कि बीतते समय के साथ मौर्य काल में एक बहुत बड़ी सेना और विशाल नौकरशाही का खर्च उठाना भारी पड़ने लगा था. अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए राजकोष के द्वार खोल दिए थे. हजारों स्तूपों का निर्माण और विदेशों में धर्म प्रचारकों को भेजने में बेतहाशा धन खर्च किया गया. कहा जाता है कि अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार और स्तूपों के निर्माण में राजकोष का एक बड़ा हिस्सा दान कर दिया था.

दान और दिखावे की भारी कीमत

आर्थिक दबाव बढ़ता चला गया जिसे तत्कालीन शासक संभाल पाने में विफल साबित हुए. बाद के राजाओं ने बाद के मौर्य राजाओं ने स्थिति संभालने के लिए जनता पर तरह-तरह के नए टैक्स लगाए. खजाना भरने के लिए जनता पर एक तरह से जुर्म को बढ़ावा दिया गया जिससे आम लोगों में भारी असंतोष पैदा हुआ. विशाल सेना और हजारों कर्मचारियों को वेतन देना मुश्किल होने लगा. इतिहासकारों के अनुसार, अंत समय में मौर्यों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें सोने की मूर्तियों को पिघलाकर सिक्के ढालने पड़े थे.

मौर्य साम्राज्य-क्यों बिखर गया चाणक्य और चंद्रगुप्त का ‘सपनों का भारत’? (AI जेनरेटेड)

कमजोर उत्तराधिकारी, प्रशासन की ढिलाई

किसी भी राजशाही की सबसे बड़ी कमजोरी उसके उत्तराधिकारी होते हैं.चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक जैसे शक्तिशाली शासक मगध की गद्दी पर बैठे, बावजूद इसके इतने बड़े साम्राज्य का बोझ नहीं संभाल सके. अशोक के बाद कुणाल, दशरथ, सम्प्रति और शालिशुक जैसे शासक आए. इनमें से कोई भी इतना प्रभावशाली नहीं था कि वह पाटलिपुत्र से हजारों मील दूर बैठे गवर्नरों पर नियंत्रण रख सके.पाटलिपुत्र से सुदूर दक्षिण या उत्तर-पश्चिम के प्रांतों पर नियंत्रण रखना नामुमकिन होने लगा. प्रांतीय गवर्नरों ने केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का फायदा उठाया और खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया. साम्राज्य छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने लगा था. प्रशासकीय विकेंद्रीकरण भी मौर्य शासन की बड़ी कमजोरी साबित हुई. दरअसल, मौर्य प्रशासन पूरी तरह से राजा पर केंद्रित था. जब केंद्र में बैठा राजा कमजोर हुआ तो साम्राज्य के स्तंभ डगमगाने लगे. कश्मीर, गांधार और विदर्भ जैसे दूरदराज के क्षेत्रों ने खुद को स्वतंत्र घोषित करना शुरू कर दिया.

ब्राह्मणों की नाराजगी और सामाजिक बदलाव

इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि अशोक ने पशु बलि और कर्मकांडों पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे ब्राह्मण वर्ग के प्रभाव और आय में कमी आई. अशोक द्वारा पशु बलि पर रोक लगाने और बौद्ध धर्म को अत्यधिक संरक्षण देने से ब्राह्मण वर्ग में नाराजगी थी. इसके साथ ही मौर्यों ने ‘दंड समता’ लागू की थी, यानी अपराधी चाहे किसी भी वर्ण का हो, उसे समान सजा मिलेगी. इसने उन विशेषाधिकारों को खत्म कर दिया जो तत्कालीन समाज में एक वर्ग विशेष को प्राप्त थे. अशोक की नीतियों ने समाज के पारंपरिक ढांचे को चुनौती दी थी और यह बड़ा कारण है कि पुष्यमित्र शुंग (जो एक ब्राह्मण था) के विद्रोह को कई विद्वान एक ‘ब्राह्मण क्रांति’ के रूप में देखते हैं.

अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ को उनके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सबके सामने मौत के घाट उतार दिया. (AI जेनरेटेड)

ब्राह्मणों का विद्रोह और सामाजिक असंतोष

पुष्यमित्र शुंग एक ब्राह्मण थे और उनके द्वारा बृहद्रथ की हत्या को इसी प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है. 185 ईसा पूर्व का वह दिन मगध के इतिहास का सबसे नाटकीय मोड़ था. सम्राट बृहद्रथ अपनी विशाल सेना की परेड देख रहे थे. तभी उनके प्रधान सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने भारी भीड़ के सामने सम्राट की गर्दन धड़ से अलग कर दी. सेना मूकदर्शक बनी रही जो यह दर्शाता है कि बृहद्रथ अपनी ही सेना का विश्वास खो चुके थे. 185 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र की सड़कों पर जब अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ का लहू बहा तो वह केवल एक राजा का अंत नहीं था, बल्कि एक महान युग का पटाक्षेप था.

तलवार ने पलटा 137 साल पुराना इतिहास?

जब पुष्यमित्र शुंग ने बृहद्रथ की हत्या की तो यह केवल एक राजा की मृत्यु नहीं थी, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का अंत था जिसने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को पहली बार एक सूत्र में पिरोया था. इस हत्याकांड के साथ ही मौर्य वंश का सूरज हमेशा के लिए अस्त हो गया और ‘शुंग वंश’ का उदय हुआ. पुष्यमित्र शुंग ने सत्ता संभालते ही फिर से अश्वमेध यज्ञ शुरू किए और वैदिक परंपराओं को पुनर्जीवित किया. मौर्य साम्राज्य के खंडहरों पर ही शुंग वंश की नींव पड़ी, लेकिन भारत को फिर से वैसा विशाल स्वरूप पाने के लिए सदियों तक गुप्त काल का इंतजार करना पड़ा.

पुष्यमित्र शुंग ने सत्ता संभालते ही फिर से अश्वमेध यज्ञ शुरू किए और वैदिक परंपराओं को पुनर्जीवित किया.  (AI जेनरेटेड)

यवन (यूनानी) आक्रमण और सीमा सुरक्षा की अनदेखी

जब मगध अंदरूनी समस्याओं से जूझ रहा था, तब उत्तर-पश्चिम की सीमाओं पर यूनानी शासकों की नजरें टिकी थीं. जब केंद्र कमजोर हुआ तो उत्तर-पश्चिम की सीमाओं से यूनानी (Indo-Greeks) आक्रमणकारियों ने भारत में घुसपैठ शुरू कर दी. अशोक के समय जो सीमाएं सुरक्षित थीं, वे बाद के राजाओं की लापरवाही से असुरक्षित हो गईं. डेमेट्रियस जैसे यूनानी आक्रमणकारियों ने भारत के भीतरी हिस्सों तक धावा बोलना शुरू कर दिया. मौर्यों की कमजोर पड़ती सेना इन आधुनिक योद्धाओं का मुकाबला करने में अक्षम साबित हुई. सीमाएं असुरक्षित हो गईं और विदेशी ताकतों ने मगध तक अपनी नजरें जमा लीं.

क्या मौर्य साम्राज्य का पतन अनिवार्य था?

मौर्य साम्राज्य का पतन हमें सिखाता है कि कोई भी सत्ता केवल आदर्शों या केवल तलवार के दम पर नहीं चल सकती. इसके लिए शक्ति और शांति का संतुलन जरूरी है. आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) ने जिस साम्राज्य को अपनी कूटनीति से सींचा था, उसे अक्षम उत्तराधिकारियों की विलासिता और अदूरदर्शिता ने लील लिया. चाणक्य के ‘अखंड भारत’ का महाविनाश एक सेनापति की तलवार ने कर दिया. आज भी खंडहरों में तब्दील हो चुके पाटलिपुत्र के अवशेष उस महान वैभव की गवाही देते हैं जो कभी विश्व का केंद्र था. कह सकते हैं कि इसके साथ ही अखंड भारत के प्रथम स्वप्न का अंत हो गया.

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