डॉ. नीलम ज्योति
सकारात्मक विचार और नकारात्मक विचार दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
हमें बचपन से यही सिखाया जाता है कि बुरा करना ही नहीं है, बल्कि बुरा सोचना भी नहीं है। यही कारण है कि हम नकारात्मक विचारों का विरोध करते हैं। नैतिकता भी यही कहती है कि हमारे मन में बुरे विचार नहीं आने चाहिए। जिससे बहुत प्रेम करते हैं उसी के प्रति बुरा विचार मन में आ जाता है, तो हम तुरंत उस विचार को झटकना चाहते हैं। क्योंकि इससे मन में ग्लानी होती है और हम हीन ग्रंथि से पीड़ित होने लगते हैं।
नकारात्मक विचार हमारे इसी न चाहने के कारण आते हैं। जितना ही हम इन्हें हटाने की कोशिश करते हैं, उतना ही दोगुनी गति से ये आक्रमण करते हैं।
नकारात्मक विचारों का हमेशा भय बना रहता है और यही भय फिर-फिर नकारात्मक विचार बन कर प्रकट होता है।
विचारों का आना-जाना हमारे हाथ में नहीं है। विचारों के प्रति हम अवश हैं। क्योंकि विचार हमारे भीतर “आते” हैं। हम उन्हें “लाते” नहीं हैं। हमने तो चाहा ही नहीं है कि बुरे विचार, नकारात्मक विचार हमारे भीतर आएं ! लेकिन फिर भी आते हैं !
हमारे नहीं चाहने के बावजूद आते हैं, इसका मतलब यह है कि नकारात्मक विचारों के आने में हमारा कोई दोष नहीं है ! हमने तो नहीं चाहा था बुरे विचार को- फिर भी वह आया है, इसलिए हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि हमारे मन में यह विचार क्यों आया है? अतः हमें चिंतीत होने की कोई जरूरत नहीं है।
विचार सिर्फ विचार है, उन्हें नकारात्मक या सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत ही नहीं है। जैसे बिजली सिर्फ बिजली है, जो बल्ब को जला भी सकती है और जरुरत से ज्यादा आ जाए तो बल्ब को फ्यूज भी कर सकती है।
इसे हम दूसरी तरह से समझते हैं, जैसे फिल्म का गीत है और भजन है। फिल्मी गीत को हम सांसारिक अर्थों में लेते हैं और भजन को हम आध्यात्मिक अर्थों में लेते हैं लेकिन उसमें ध्वनित होने वाला संगीत एक है। फिल्मी गीत में भी सरगम के सात स्वर है और भजन में भी सरगम के सात स्वर हैं।
फिल्मी गीत भी अ से ज्ञ तक के अक्षरों से बना है और भजन में भी अ से ज्ञ तक वर्णमाला के अक्षर हैं। दोनों में कोई फर्क नहीं है। सिर्फ द्रष्टीकोण का फर्क है। इसी भांति सकारात्मक विचारों में भी अ से ज्ञ तक के अक्षर चित्रों के रूप में प्रकट होते हैं और नकारात्मक विचारों में भी अ से ज्ञ तक के अक्षर प्रकट होते हैं, उन्हें सकारात्मक और नकारात्मक रूप देने की कोई जरूरत नहीं है।
यदि हम नकारात्मक विचारों को हटाएंगे और सकारात्मक विचारों को चाहेंगे तो सकारात्मक विचार भी एक विचार ही है। जबकि हमें तो विचार मात्र से मुक्त होना है।
विचारों को रोकने की कोशिश करना पानी को मुठ्ठी में पकड़ने के समान है। जिस तरह से हम पानी को अपनी मुठ्ठी में नहीं पकड़ सकते हैं उसी तरह से हम अपने विचारों को भी नहीं रोक सकते हैं।
विचार चलते हैं मन में और मन हमारी पकड़ में नहीं आता है क्योंकि मन सूक्ष्म है और सूक्ष्म हमारी पकड़ में नहीं आता है। हमारी पकड़ में ठोस आता है, स्थूल हमारी पकड़ में आता है।
पानी तरल है, और पानी हमारी पकड़ में नहीं आता है लेकिन बर्फ हमारी पकड़ में आती है क्योंकि बर्फ पानी का ही ठोस रूप है। ठीक इसी भांति मन तरल है, हमारी पकड़ में नहीं आता है लेकिन शरीर हमारी पकड़ में आता है क्योंकि शरीर मन का ही ठोस रूप है। और ठोस हमारी पकड़ में आता है।
अतः हमें अपनी ध्यान की यात्रा सीधे सूक्ष्म या तरल मन की अपेक्षा ठोस या स्थूल शरीर से ही शुरू करनी होगी क्योंकि स्थूल शरीर हमारी पकड़ में आता है।
विचारों से मुक्त हो निर्विचार में प्रवेश करने के लिए पहले हमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही तरह के विचारों को स्वीकार करना होगा। क्योंकि वे आये हैं, हम उन्हें लाये नहीं हैं, इसलिए विरोध करने का सवाल ही नहीं है। हमें विचार मात्र के प्रति समभाव रखना होगा और सजग रहना होगा।
विचारों के आने और जाने में हमारा कोई साथ नहीं है लेकिन विचारों के बनने में, विचारों के जन्म लेने में अप्रत्यक्ष रूप से हमारा ही हाथ है। विचारों को ऊर्जा देकर हम स्वयं ही बुलाते हैं।
हमारा ध्यान जहां पर होता है ऊर्जा उसी ओर गति करने लगती है। हमारा ध्यान सतत मस्तिष्क में लगा हुआ रहता, जहां पर विचारों का जन्म होता है। अतः हमारी ऊर्जा सकारात्मक और नकारात्मक विचारों के रूप में प्रकट होती रहती है।
हमें इस बात का ख्याल ही नहीं आता है कि एक ओर तो हम अपना ध्यान मस्तिष्क में लगाकर विचारों के लिए सतत ऊर्जा भेजते रहते हैं और वहीं दूसरी ओर हम नकारात्मक विचारों से लड़ने भी लगते हैं।
यदि हम मस्तिष्क को ध्यान न देकर ऊर्जा देना बंद कर देते हैं तो विचारों का आना-जाना मुश्किल होने लगेगा।
मन में चल रहे विचार हमारी पकड़ में नहीं आते हैं क्योंकि वे सूक्ष्म हैं लेकिन शरीर में हो रही क्रियाएं हमारी पकड़ में आती हैं। यदि हम अपना ध्यान मन से हटाकर शरीर में हो रही क्रियाओं पर ले जाते हैं तो विचारों को रोकना आसान होने लगता है।
यदि हम अपना ध्यान मस्तिष्क से हटाकर अपने शरीर में हो रही क्रियाओं पर ले जाते हैं, अपनी आती-जाती श्वास पर ले जाते हैं, श्वास की लय के साथ डोल रही नाभि पर ले जाते हैं या उठने-बैठने, चलने-फिरने जैसी अन्य क्रियाओं पर ले जाते हैं तो हमारा विचारों को रोकते हुए निर्विचार में प्रवेश होना शुरू हो जाता है। क्योंकि क्रियाएं हमेशा वर्तमान में घटित होती है और विचार भविष्य और अतीत में ले जाते हैं।
श्वास अभी वर्तमान में चल रही है, दिल अभी वर्तमान में धड़क रहा है नाभि अभी श्वास के साथ डोल रही है यानि यह सब वर्तमान में घटित हो रहा है जबकि विचार भविष्य या कि अतीत में ले जाते हैं।
मस्तिष्क से ध्यान हटाकर क्रियाओं पर ध्यान ले जाते हैं तो विचारों को ऊर्जा नहीं मिलेगी और वे गिरने लगेंगे। और जो ऊर्जा विचार बनकर बह रही थी वह ऊर्जा विचारों से मुक्त हो क्रिया पर ध्यान लगाने वाले को यानि देखने वाले को अर्थात साक्षी को मिलने लगेगी, हमारी देखने की क्षमता और भी बढ़ने लगेगी और हमारा साक्षी होना घटित होने लगेगा। क्योंकि वर्तमान साक्षी का घर है।
हम सतत विचारों में ही जीते आए हैं अतः क्रियाओं पर ध्यान ले जाने के लिए हमें सतत ध्यान को साधना होगा। इस बीच नकारात्मक विचार आए तो क्या करें?
तुरंत कैसे रोकें नकारात्मक विचारों के आक्रमण को?
जब भी नकारात्मक विचार पीड़ित करे तो पहले अपनी श्वास को गहरी करें, श्वास को नाभि तक जाने दें, जैसी सोने के बाद चलती है वैसी चलने दें यानि श्वास के साथ पेट ऊपर-नीचे हो और अपना सारा ध्यान आती-जाती श्वास पर लगा देना है।
सारा ध्यान इस बात पर लगा देना है कि अब श्वास भीतर आई है और अब श्वास बाहर गयी है। तीन से पांच मिनट के भीतर ही हम नकारात्मक भावदशा से बाहर आ जायेंगे और हमारा एक शांत और प्रसादपूर्ण अवस्था में प्रवेश होता चला जाएगा। (चेतना विकास मिशन).

