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कैसे पाएं ईश्वरीय शक्ति की कृपा

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मृता शर्मा (कोलकाता)
संयोजिका : चेतना विकास मिशन

परमात्मा की शक्ति आपके साथ सोच समझकर व्यवहार नहीं करती है। परमात्मा की शक्ति कहना ठीक नहीं है, परमात्मा शक्ति ही है।
वह आपके साथ सोच समझकर व्यवहार नहीं है उसका, उसका अपना शाश्वत नियम है। उस शाश्वत नियम का नाम ही धर्म है।
धर्म का अर्थ है, उस परमात्मा नाम की शक्ति के व्यवहार का नियम।

◆अगर आप उसके अनुकूल करते हैं, समझपूर्वक करते हैं, विवेकपूर्वक करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाएगी, उसकी तरफ से नहीं, आपके ही कारण।
◆अगर आप उलटा करते हैं, नियम के प्रतिकूल करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए अकृपा बन जाएगी। परमात्मा अकृपा नहीं है, आपके ही कारण।

परमात्मा व्यक्ति नहीं है, शक्ति है। और इसलिए परमात्मा के साथ न प्रार्थना का कोई अर्थ है, न पूजा का कोई अर्थ है; परमात्मा के साथ अपेक्षाओं का कोई भी अर्थ नहीं है।

यदि चाहते हैं कि परमात्मा, वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाए, तो आपको जो भी करना है वह अपने साथ करना है।
इसलिए ~
साधना का अर्थ है, प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। ध्यान का अर्थ है, पूजा का कोई अर्थ नहीं है।

इस फर्क को ठीक से समझ लें :
●प्रार्थना में आप परमात्मा के साथ कुछ कर रहे हैं— अपेक्षा, आग्रह, निवेदन, मांग, ।
~ध्यान में आप अपने साथ कुछ कर रहे हैं।
●पूजा में आप परमात्मा से कुछ कर रहे हैं;
~साधना में आप अपने से कुछ कर रहे हैं।

साधना का अर्थ है :
अपने को ऐसा बना लेना कि धर्म के प्रतिकूल आप न रह जाएं; और जब नदी की धारा बहे तो आप बीच में न पड़ जाएं—तट पर हों कि नदी की धारा का पानी आपकी जड़ों को मजबूत कर जाए, उखाड़ न जाए।

जैसे नदी बह रही है। किनारे जो दरख्त होंगे, उनकी जड़ें मजबूत हो जाएंगी; उनमें फूल लगेंगे, फल आएंगे।
नदी की धार में जो पड़ जाएंगे, उनकी जड़ें उखड़ जाएंगी, बह जाएंगे, टूट जाएंगे।

नदी को न तो प्रयोजन है कि किसी वृक्ष की जड़ें मजबूत हों, और न प्रयोजन है कि कोई वृक्ष उखाड़ दे। नदी बह रही है। नदी एक शक्ति है, नदी एक व्यक्ति नहीं है।
चेतना विकास मंच :

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