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आखिर कैसे कहें कि ‘सदा वत्सले मातृभूमे’

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सुरेश कौशिक

सूचना हासिल करने के लिए भारत और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों की तरफ़ से सीमा पार जासूस भेजना कोई नई बात नहीं है. सरबजीत सिंह, रविन्‍द्र कौशिक, कुलभूषण जाधव, कश्‍मीर सिंह, रामराज्‍य आदि ढेरो नाम हैं। डेनियल मसीह के पड़ोसी सुरेंद्र पाल पाल सिंह के पिता ने कारगिल जंग के दौरान जासूस के तौर पर काम किया था।। कुछ दिनों बाद उनकी लाश ही लौटी थी। फ़िरोज़पुर गौरव भास्कर पूर्व जासूसों के लिए एक एडवोकेसी ग्रुप चलाते हैं. उनके पिता, एक कवि थे, 1970 के दशक में जासूसी के आरोप में पाकिस्तान में क़ैद थे। शिमला समझौते के समय साथी कवि हरिवंश राय बच्चन की अपील के तहत उन्हें रिहा कर दिया गया था.

हालांकि टेक्नोलॉजी के नए नए अविष्कारों ने इस निर्भरता को कुछ हद तक कम कर दिया है, लेकिन जासूसों की भौतिक उपस्थिति का महत्व अपनी जगह बना हुआ है.

इसी कडी में एक नाम आता है डेनियल मसीह का। जिनका दावा है कि वह एक भारतीय जासूस थे, जिन्हें पाकिस्तान में जासूसी करने और वहां गिरफ़्तार होने के बाद यातनाएं झेलने के बावजूद, न तो भारत सरकार की तरफ़ से कोई मुआवज़ा दिया गया और न ही उनकी सेवाओं को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया. भारत के सीमावर्ती इलाक़े के रहने वाले डेनियल मसीह के मुताबिक़ उन्होंने आठ बार पाकिस्तान जाकर ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठी की थी.

सात बार की कामयाबी के बाद आठवीं बार भारत की सीमा पार कर के पाकिस्तान पहुंचे, तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. उन्होंने पाकिस्तानी अधिकारियों से कहा कि वह सिर्फ़ एक स्मगलर हैं, लेकिन बहाना काम नहीं आया और उनको जासूसी के आरोप में तीन साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई. फिर भी चार साल की विभिन्न जेलों में क़ैद के बाद, आख़िरकार जब उन्हें रिहा किया गया, तो डेनियल मसीह अपनी नज़रों में एक गर्वित जासूस के तौर पर वतन लौट रहे थे. लेकिन उनके दावे के मुताबिक़, जिस भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी ने उन्हें पाकिस्तान भेजा था, उसी एजेंसी ने उनसे अपना पल्ला झाड़ लिया. (प्रत्‍यक्ष तौर भी ठीक भी है)

वहाँ से लौटे तो अब रिक्शा चलाते हैं। जबकि रंजन गोगोई जैसे तो राज्य सभा के सदस्‍य बनते हैं।

जब वो जेल में थे तो उनकी माँ को हर महीने एक गुमनाम पते से हर महीने 500 रुपये मिलते थे । जी हां आपने ठीक पढा है पांच सौ रुपये?? मगर डेनियल के आने के बाद वो भी बंद हो गया।

कमाल तो यह है कि इससे ज़्यादा सम्मान तो गुजरात के दंगों में हिस्सा लेने वालों को मिल रहा है देश में।

आदरणीय मोदी जी ने एक बार ये कविता पढ़ी थी—

सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा,

मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।

मेरी धरती मुझसे पूछ रही, कब मेरा कर्ज़ चुकाओगे,

मेरा अम्बर मुझसे पूछ रहा, कब अपना फर्ज़ निभाओगे

मेरा वचन है भारत माँ को, तेरा शीश नहीं झुकने दूंगा,

डेनियल मसीह के लिए ऐसी कविताओं की अर्थी उठ चुकी है।

अखण्ड पाखंड ज़िंदाबाद, राष्ट्रवाद ज़िंदाबाद।

आखिर कैसे कहें कि ‘सदा वत्सले मातृभूमे’

चंडीगढ़ निवासी वकील रंजन लखनपाल ने ऐसे ही दर्जनों कथित जासूसों की रिहाई के लिए भारतीय अदालतों में मुक़दमे लड़े हैं. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सरकार को ऐसे एक व्यक्ति को मुआवज़े के रूप में 10 लाख रुपये अदा करने का आदेश दिया था, जिसका दावा था कि उन्हें 1970 के दशक में भारत की एक ख़ुफ़िया एजेंसी ने जासूसी के लिए पाकिस्तान भेजा था. जहां वह पकड़ा गया और जासूसी के आरोप में उन्हें 14 साल की सज़ा सुनाई गई.

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