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कैसे करें बच्चों में बढ़ते मानसिक तनाव का इलाज

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डॉ. प्रिया 

       कई बार एक कोने से बैठा बच्चा अपनी आप से ही बातें करता है। मन ही मन उठ रहे सवालों को यह सोच कर वो दबा देता है कि कोई उसे डांटेगा। दूसरी ओर पेरेंटस बात करते हैं कि ये तो मनमौजी है। माता-पिता का ये रवैया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को खराब कर सकता है।

         जब तक माता पिता पूरी तरह से बच्चों के साथ हर काम में भागीदारी नहीं रखेंगे, वो आगे की ओर नहीं देखेंगे। 

       बच्चों की मेंटल हेल्थ फॉक्स करना माता-पिता की पहली जिम्मेदारी है। इस बारे में पेरेंटिंग कोच डॉ पल्लवी राव का कहना है कि बच्चे को ओवर प्रोटेक्ट करना कई बार उसका काम रोकने का काम करता है। बच्चों के हर काम में उन्हें हेल्प करने की जगह मॉनिटर करें.

   इन कारणों से बच्चा खुद पर दबाव महसूस करता है :

      *1.पेंरेटाल डॉक्स*

पेरेंटिंग कोच डॉ पल्लवी राव का कहना है कि पेरेंटल सॉकेट बच्चे के मानसिक तनाव का सबसे अहम कारण साबित होता है। दूसरे बच्चों के साथ अपने बच्चों की प्रतिक्रिया करने वालों की कंपेयर करना और उनसे उम्मीद से ज्यादा तीक्ष्णता करना गलत है।

      किशोर विकास पूरी तरह से न हो पाने का कारण कई बार पेरेंटस का अलगाव या बच्चे की पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में पेरेंटस की अधिक भागीदारी (माता-पिता की भागीदारी) का न होना भी एक कारण होता है। कई पेरेंटस ऐसे भी हैं, जो बच्चे को बात पर डांटना, गिराना और सख्त सजा देने का प्रयास करते हैं। इसका भी बहुत गहरा प्रभाव बच्चे के विकास में बाधा का काम करता है।

*2.सोसाइटल स्टोक*

      समाज बच्चों को कई तरह से प्रभावित करने का काम करता है। वो प्रभाव सकारात्मक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी। डॉ पल्लवी के मुताबिक बच्चे जिस सोयाटी में रहते हैं वहीं से सब कुछ सीखता है। कई बार जेंडर को लेकर जाने वाला भेदभाव होता है, तो कभी-कभी हर फील्ड में अच्छा परफार्म करने वाले और दूसरे बच्चे आगे चलकर मार्जर का प्रेशर बच्चों के दिमाग पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

     बच्चा अपने अंदर ही लूज़र को महसूस करने लगता है। कई बार बच्चों को बुलिंग का भी सामना करना पड़ता है। बच्चों की अवस्था को समझने का प्रयास अत्यंत आवश्यक है।

*3. फ़िज़िकल अटैचमेंट*

     ये वो सिचुएशन है, जब बच्चा अपने शरीर में कई तरह का बदलाव देख रहा होता है। रंग बदलने वाले बच्चे कई बार काफी परेशान कर देते हैं। उन्हें एक्सेप्ट करने में भी बच्चे का समय लगता है।

     वो इस बात पर ध्यान देने लगता है कि मैं अब कैसा दिखूंगा। इसके अलावा कई बार यौन शोषण और फिजिकल एब्यूज भी बच्चे की मानसिक शुरुआत के कारण साबित हो सकते हैं।

*4. टेक्नोलॉजिक लॉक्स*

आजकल हर कोई टैब, मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल कर रहा है। इसके अंदर कई बार बच्चा कुछ ऐसी एप्लीकेशन भी डाउनलोड कर लेता है, जिससे उसे परेशानी होने लगती है।

       ऐसे में बच्चों के स्क्रीन टाइप और स्क्रीन टाइप पर नजर रखना जरूरी है। डॉ पल्लवी के अनुसार हमें इस बात पर ध्यान देना है कि बच्चा कितनी देर तक सक्रिय स्क्रीन टाइम में इनडल्ज करता है और कितना समय पैसिव पर खर्च कर रहा है। यदि बच्चा कुछ सीख रहा है, तो वह उसका मानिक विकास में अपरिवर्तनीय सिद्ध होता है। इतना ही नहीं साइबर बुलिंग भी बच्चे के दिमाग को प्रभावित करती है।

*5. एनवायरमेंटल शॉक*

        वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे आस पास घटने वाली घटनाएं भी बच्चों की सोच को बदलने का काम करती है। किसी का जन्म, मृत्यु या बीमारी से कई बार बच्चों को झटका भी लग सकता है। माहौल में बदलाव आने या बदलने से भी बच्चा चुपचुप रहता है।

      किसी के भी संपर्क में आने से कतराता है। कई बार अकेले में क्राई सॉंस होता है। ये सभी लक्षण बच्चे में पूरी तरह से असंतुलन पैदा करते हैं।

*इन बातों का रखें खास ख्याल :*

     मित्रवत जीवन में बहुत कुछ सिखाया जाता है। बच्चे को हर समय जीतने की कोशिश न करें। इससे बच्चे में काफिडेंस बिल्ट हो जाएगा।

     लोगों से मिलने जुलने दें और उन्हें बात पर टोकना बंद कर दें।

       बच्चों को गिरकर संभलने दें, ताकि वे हर हाल में खराब होने से आगे बढ़ सकें। उसे हर जगह सहयोग देने की कोशिश न करें।

    बच्चों को उपहार देकर खुश करने के बजाय उनके साथ समय व्यतीत करें। 

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