(डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग की एक कविता )
मुझे नहीं मालूम, किस धातु का बना था वह
उसकी आँखों में गंगाजल ही नहीं
टेक्स, मिसीसिपी, वोल्गा और ह्वांगहो
सभी तो लहराती थीं
उसमें हिमालय ही नहीं
आल्प्स की ऊँचाई भी समाहित थी
उनमें हिन्द महासागर ही नहीं
काला सागर, प्रशांत महासागर
सभी अपनी गहनता लिए बैठे थे
कैसे थे उनके संघर्ष के हथियार
नमक सत्याग्रह
दांडी प्रयाण
चरखा, खादी, असहयोग
और अनशन !
कैसी थी उनकी लड़ाई !
जिसमें विद्वेष-घृणा के लिए
कोई जगह नहीं थी ।
हड्डियों के उस ढाँचे में
कैसा था वह आत्मबल !
मैं सर्वदा उनके प्रसाद का अभिलाषी रहा
हूँ और रहूँगा ।
अमेरिका में अश्वेतों के अधिकारों के लिए संघर्ष के प्रतीक थे डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग
प्रस्तुकर्ता - डॉक्टर अमलदार 'नीहार ' ,विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मुमटा डिग्री कॉलेज, बलिया,उप्र,संपर्क - 94540 32550,ईमेल -
dr.amaldarneehar@gmail.com
संकलन - निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र,संपर्क - 9910629632,ईमेल - nirmalkumarsharma3@gmail.com
( विशेष नोट – अमेरिका में अश्वेतों के अधिकारों के लिए संघर्ष के प्रतीक थे डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग । डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग ने अपनी पुस्तक ‘स्ट्राइड्स टुवर्ड्स फ्रीडम’ में लिखा है-
“मैं कई महीनों से सामाजिक सुधार की जिस पद्धति की तलाश में था, वह मुझे प्रेम और अहिंसा पर गाँधीवादी बलाघात में मिली । मुझे लगा कि दलितों के लिए, उनके मुक्ति-संघर्ष के लिए, वही तरीका नैतिक और व्यावहारिक दृष्टि से ठीक है । “डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग स्वयं को गाँधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी कहते थे । कैसा संयोग था यह कि उत्तराधिकार में उन्होंने महात्मा गाँधी जैसी मौत भी पायी थी । वे ही मार्टिन लूथर किंग महात्मा गाँधी को अपनी कविता में स्मरण करते हैं ! )

