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मुस्लिम मजदूर, व्यापारी और खुदरा विक्रेताओं के बहिष्कार से कैसे बनेगा भारत दुनिया का सिरमौर?

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गोल्डी जॉर्ज

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की अंतिम दिन तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेतृत्व वाले महागठबंधन, दोनों ही सत्ता हासिल करने हेतु कुछ नए और अनछुए हथकंडे अपनाते रहे। हिंदी पट्टी का एकमात्र महत्वपूर्ण राज्य बिहार है जहां भाजपा ने कभी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं किया है। भाजपा ने मुख्य रूप से नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड या जेडीयू के साथ मिलकर दो दशक से अधिक समय तक शासन किया है।

भारतीय चुनावों में मुस्लिम वोटों को दिया जाने वाला महत्व भी अजीब है। क्या संख्या के लिहाज से उनके इतने  मायने हैं? या फिर राजनीति के अनुरूप मुसलमाओं का इतना वजूद हैं? बेशक, मुसलमान अपने मजहब का पालन करते हैं, वोट देते हैं, काम करते हैं, वगैरह। वैसे भी, ज़्यादातर भारतीय इन बुनियादी परंपराओं का पालन करते हैं।

रणनीतिक हिसाब से, हिंदी पट्टी के हिन्दू बहुसंखयक राज्य बिहार में अपने दम पर सरकार नहीं बन पाना भाजपा की अक्षमता दर्शाता है। इसलिए भाजपा के लिए यह एक चिंता का विषय बन गया है। हालांकि, इससे बिहार के मुसलमान को बीजेपी की दहशत से कुछ राहत मिली।

2014 में भाजपा के केंद्र में सत्ता में आने और अधिकांश हिंदी भाषी राज्यों में फैलने के बाद से राज्य सरकारों और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बीच के संबंध अक्सर विवादास्पद हुए। इस लिहाज से नीतीश कुमार ने बिहार में मुसलमानों के लिए एक “सुरक्षा दीवार” की भूमिका निभाई। इस तरह उन्होंने मुसलमानों को अधिक आक्रामक हिंदुत्व दलों से बचाकर रखा।

नीतीश कुमार की नेतृत्व शैली और नीतिगत निर्णयों ने भाजपा से जुड़े होने के बावजूद मुसलमानों को उन पर अविश्वास करने से रोका है। यही वजह है कि पिछले कई चुनावों में उन्हें मुस्लिम समुदाय का कुछ हद तक  लगातार समर्थन मिलता रहा।

फिर भी क्या किसी मुसलमान के वोट को सिर्फ़ उसकी धार्मिक संबद्धता के आधार पर “धार्मिक” कहना उचित है? अगर भारत में सभी मुसलमान एक ही राजनीतिक दल या धार्मिक संगठन के सदस्य होते, तो यह बात उचित होती। लेकिन यह सच नहीं है। मुसलमानों के एक-दूसरे से अलग होने के विभिन्न पहलुओं को भी नज़रअंदाज़ करना सही नहीं है। तो फिर उनके वोट को “मुस्लिम वोट” क्यों माना जाना चाहिए? 

मुस्लिम उम्मीदवार

ध्यान देने वाली बात है कि सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी, भाजपा ने बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा। अत्यंत पिछड़ी जातियों (ईबीसी) और हिंदुओं के उच्च जाति समूहों के सदस्यों को टिकट देकर, पार्टी ने अपने हिंदू वोट बैंक को मज़बूत करने की कोशिश की है।

भाजपा के हिंदू वोटों के एकीकरण के विपरीत, असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) मुस्लिम वोट बैंक को मज़बूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उत्तर और दक्षिण बिहार के हालिया क्षेत्रों में चुनाव लड़ने के अलावा, पार्टी ने सीमांचल क्षेत्र के मुस्लिम वोट बैंक पर ध्यान केंद्रित करते हुए इन चुनावों में पच्चीस उम्मीदवार उतारे हैं। 2020 के चुनावों में पार्टी को पांच सीटें मिलीं।

हालांकि, यह भी माना जा रहा है कि एआईएमआईएम मुस्लिम वोटों को विभाजित करने की चक्रव्यूह रच रहा है। एआईएमआईएम के चार विधायक पहले ही राजद में शामिल हो चुके है। जहां कांग्रेस ने पहले ही चुनावों के लिए 10 मुस्लिम उम्मीदवारों के नाम जारी कर दिए थे, वहीं आरजेडी ने मुस्लिम-यादव समीकरण को ध्यान में रखते हुए 18 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं।

एनडीए की ओर से जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने चार मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने एक उम्मीदवार उतारा है। 2020 में 11 उम्मीदवारों की तुलना में, जेडीयू, जिसका दावा है कि बिहार की 20% मुस्लिम आबादी उसका समर्थन करती है, ने अररिया, जोकीहाट, अमौर और चैनपुर से केवल चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।

राज्य की आबादी में 17 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद, वर्तमान विधानसभा में मुसलमानों की हिस्सेदारी केवल 7.81 प्रतिशत है। इसी प्रकार, ओबीसी विधायकों की संख्या राज्य की आबादी का लगभग 42 प्रतिशत है। इनमें यादव लगभग 21 प्रतिशत, वैश्य 10 प्रतिशत, कुशवाहा 7 प्रतिशत और कुर्मी 4 प्रतिशत हैं। दलित राज्य की आबादी का 19 प्रतिशत से अधिक हैं, लेकिन विधानसभा में उनकी हिस्सेदारी 16 प्रतिशत है।

पसमांदा मुसलमान: भाजपा का राजनीतिक सिद्धांत 

2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं से पसमांदा मुसलमानों तक पूरी गंभीरता से पहुँचने का आग्रह किया, क्योंकि वे रणनीतिक रूप से बहुसंख्यक है। मुसलमानों के भीतर, खासकर भाजपा द्वारा, अब पसमांदाओं पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। आखिर ये पसमांदा मुसलमान कौन हैं?

मुस्लिम विद्वानों के अनुसार, भारत में मुसलमानों को उनकी सामाजिक स्थिति के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। सबसे ऊपर वे हैं जिन्हें अशराफ़ कहा जाता है, जिनके बारे में माना जाता है कि वे या तो उच्च जातियों के लोग थे जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया या फिर वे मुस्लिम शासकों के वंशज थे, जो बाहर से आक्रमणकारी बनकर आए थे।

इसके बाद अजलाफ़ आते हैं, जिन्हें पिछड़ी जातियों से धर्मांतरित माना जाता है और सबसे आखिर में अरज़ाल आते हैं, जो सबसे पिछड़ी जातियों से या दलित-आदिवासी समुदायों से धर्मांतरित हुए थे। इनमें से अजलाफ़ और अरज़ाल को पसमांदा कहा जाता है, जो भारत की कुल मुस्लिम आबादी का 85 प्रतिशत हैं।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू समर्थक पार्टी द्वारा पिछड़े पसमांदा मुसलमानों के विशाल बहुमत की स्थिति को बेहतर बनाने का प्रयास वास्तव में कोई यथार्थवादी प्रयास नहीं बल्कि एक धोखा है। वंचित मुसलमानों के प्रति भाजपा का नया प्रेम हमेशा चुनावी तात्कालिकता से प्रेरित होता है। भाजपा के वैचारिक जनक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा इस आवश्यकता को बार-बार दोहराया है।

विडंबना यह है कि भाजपा पहली बार उन मुसलमानों का “तुष्टीकरण” करने के लिए मजबूर हो रही है, जिनसे वह हमेशा से नफरत करती रही है। “तुष्टीकरण” एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल अक्सर भाजपा ने अपने “धर्मनिरपेक्ष” राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की तीखी आलोचना के लिए किया है।

अगर कोई काव्यात्मक न्याय है, या अगर इतिहास आरएसएस के मुस्लिम-विरोधी तंत्र को करारा जवाब दे रहा है, तो भाजपा के छल-कपट को उजागर करना ज़रूरी है ताकि वह बच न सके। आरएसएस ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों को, ईसाईयों और कम्युनिस्टों के साथ, हिंदू भारत का एक प्रमुख और रणनीतिक दुश्मन मानता रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि चुनाव की तारीखों की घोषणा से कुछ महीने पहले, बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी राज्य की राजनीति में पसमांदा मुसलमानों की भागीदारी सुनिश्चित करेगी। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा के लिए, भाजपा ने कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा, जबकि उसके सहयोगी दलों जेडीयू और लोजपा (आर) ने उम्मीदवार उतारे। आरएसएस और भाजपा के काम उसके शब्दों से कोसों दूर है।

पसमांदा मुसलमानों के समर्थन की पहल ऊपरी तौर पर नेकनीयती लगती है। हालांकि, आरएसएस की ऐतिहासिक धारणा के आधार पर, मुसलमानों को कम्युनिस्टों और ईसाइयों के साथ “शत्रु” करार देने वाले और कोई नहीं, बल्कि एम.एस. गोलवलकर थे। वे इस उग्र हिंदू संगठन के दूसरे प्रमुख और आरएसएस के सबसे सम्मानित विचारक थे। मुसलमानों के विशाल बहुमत के प्रति यह अचानक सहानुभूति जबरदस्त बेईमानी लगती है।

सबसे पहले, न तो भाजपा और न ही आरएसएस ने कभी गोलवलकर द्वारा मुसलमानों को शैतान बताने को “गलत” कहा है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इसे “काल संगत नहीं” करार दिया। गोलवलकर के निबंधों के विवादास्पद अंशों को बाद में आरएसएस ने बदल भी दिया। इसका मतलब है कि गोलवलकर ने उस समय जो कहा था, वह समय के अनुरूप सही था।

पिछले दस वर्षों में देखी गई मुस्लिम-विरोधी कट्टरता और सुनियोजित हिंसा से युक्त बयानबाज़ी इस बात का प्रमाण है कि आरएसएस और भाजपा ने आँखें मूंद ली हैं। इसके विपरीत, भागवत ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि हिंदू आक्रोश का विश्लेषण करते समय सदियों के दमन को भी ध्यान रखा जाना चाहिए। 

ऐसे बयान से यह प्रतीत होता है कि यह राज्य द्वारा मुसलमानों पर किए जा रहे हिंसा को उचित ठहरने का प्रयास है। राज्य अपने प्रशासनिक और प्रवर्तन प्रकोष्ठों के माध्यम से मुसलमानों के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही करती रही है। साथ ही दक्षिणपंथी पार्टी उसके संबद्ध संगठनों और वैचारिक सहयोगियों द्वारा मुसलमानों के विरुद्ध की गई ज़बरदस्त हिंसा को भी सही ठहराने की कोशिश है।

मुसलमानों के नरसंहार की मांग, गौरक्षकों द्वारा मुस्लिम पुरुषों की लिंचिंग, और मुस्लिम व्यापारियों को नकारना और खुदरा विक्रेताओं का बहिष्कार यह दर्शाता है कि कैसे दक्षिणपंथी तंत्र भारत में मुसलमानों को उनकी वैध स्थिति से वंचित करने और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाने का व्यवस्थित प्रयास कर रहा है।

मोदी के पसमांदा मुसलमानों के लिए आह्वान से क्या सीखते हैं? प्रधानमंत्री का पसमांदा प्रेम वाला बयान खोखला लगता है क्योकि 2002 के गुजरात दंगों में मारे जाने वाले ज़्यादातर लोग पसमांदा थे। उन्होंने अभी तक उस दंगे में मारे गए लोगों से माफी नहीं मांगी। ना ही वे आज तक कोई ऐसा बयान दिया कि जो 2002 में गुजरात में हुआ वह ग़लत था।

इसमें कोई ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए कि भाजपा की पसमांदा पहल केवल एक फर्जी हौवा है क्योंकि 2002 के गुजरात दंगों के लगभग सभी पीड़ित पसमांदा मुसलमान थे। संघ परिवार इस बात का बखान करता रहता है कि मुसलमानों को वह सबक सिखाया जा रहा है जिसके वे हक़दार हैं।

अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि भाजपा और आरएसएस पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने से इनकार करने से पसमांदा मुसलमानों के प्रति उनके समर्थन केवल खोंखोल और आँखों में धूल झोंकने के समान है।

एनडीए के चुनाव अभियानों में मुसलमान

बिहार चुनाव प्रचार के दौरान, भाजपाने राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में गिनया, जिसने मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर क्षेत्र से उसका विशिष्ट दर्जा छीन लिया था।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने दरभंगा में एक चुनावी रैली में राम मंदिर निर्माण और कश्मीर के विशेष दर्जे को हटाने को पार्टी की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में गिनाया। उन्होंने कहा, “550 वर्षों तक, रामलला एक तंबू में रहे,” और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को मंदिर निर्माण का कारण बताया।

चुनाव की घोषणा से पहले, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुसलमानों की स्थिति सुधारने के अपने प्रयासों पर बार-बार ज़ोर दे रहे थे। 1989 के भागलपुर दंगों की जाँच का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि नवंबर 2005 में जेडीयू के चुनाव जीतने के बाद “गहन जाँच की गई, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की गई और दंगा पीड़ितों को मुआवज़ा दिया गया।”

नीतीश के अनुसार, राज्य सरकार ने 2007 में परित्यक्ता मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के लिए 10,000 रुपये प्रति माह की आर्थिक मदद देना शुरू किया था। बाद में यह राशि बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दी गई। पूरे चुनाव अभियान के दौरान इन सारे आधार पर मुसलमान वोटरों को भी रिझाया गया। 

दिलचस्प बात यह है कि जेडीयू, भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर बड़े सहयोगी और सूत्रधार होने के बावजूद, नीतीश कुमार चुनाव में मुस्लिम वोटों की तलाश में जुटे हैं। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक यह अनुमान लगा रहे थे कि जेडीयू मुस्लिम नेताओं को कई जगहों से अपना उम्मेदवार बनाएंगे।

यह बात सच है कि भगवा पार्टी के साथ रहने की वजह से नीतीश कुमार ने अपना मुस्लिम समर्थन काफी हद खो दिया है। फिर भी उसे कुछ हद तक उसे वापस पाने के लिए यह एक अंतिम मौका था। पर जेडीयू ने मुस्लिमों को केवल चार सीट देखर पर्यवेक्षकों को चकित किया और समर्थक भी निराश हुए।

मुस्लिम मतदाताओं ने नीतीश कुमार द्वारा भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे के समर्थन पर खुलकर सवाल उठाए हैं। इनमें तीन तलाक कानून और नागरिकता संशोधन कानून कई जगह काफी चुनौतीपूर्ण सवाल आए। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा सीमांचल में मुसलमानों पर “घुसपैठिया” करार देने पर उनकी चुप्पी पर भी कड़ी आलोचना हुई। 

वैसे भाजपा मुसलमानों के साथ अपने व्यवहार के लिए कुख्यात है। भाजपा के ना लोकसभा में और न ही राज्यसभा में कोई मुस्लिम सदस्य है। बिहार विधानसभा चुनाव में भी उनके कोई उम्मीदवार नहीं हैं।

पूरे चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए के मुस्लिम उम्मीदवारों को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सीमांचल के लोगों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत गलत नामों के कटने और मताधिकार से वंचित होने की शिकायत की।

उनका दावा है कि चूँकि मुस्लिम मतदाताओं को भाजपा का समर्थन नहीं करने वाला माना जाता था, इसलिए एसआईआर प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण रहा। उन्होंने अपडेट किए गए मतदाता सूची में त्रुटियां का हवाला दिया, जिनमें पर्याप्त सत्यापन के बिना नाम हटाना और प्रवासी मजदूरों के नाम हटाना शामिल है जो अस्थायी रूप से रोज़गार के लिए स्थानांतरित हुए।

जेडीयू उम्मीदवारों के सामने एक और कठिन सवाल मुसलमानों के प्रति उनके राजनीति और नीतिगत मसले रहा। खासकर एनडीए के मुख्य किरदार भाजपा की मुसलमानों के प्रति नीतियों को लेकर रहा। इस साल अप्रैल में संसद में वक्फ संशोधन विधेयक पारित किया गया जिसका समर्थन जेडीयू और एलजेपी (आर) ने भी किया। चुनाव अभियान के दरमियान दोनों पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन पर मुश्किल सवाल उठे।

बिहार में मुसलमान

दो करोड़ से ज़्यादा मुसलमान राज्य की आबादी का लगभग 17.7 फीसदी हिस्सा है और वे ऐतिहासिक रूप से आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दलों का समर्थन करते आए। इसमें लगभग 73 फीसदी “पसमांदा” मुसलमान हैं और 243 विधानसभा क्षेत्रों में से कम से कम 30 में उनका वोट शेयर निर्णायक माना जाता है। किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया के चार ज़िलों में मुसलमानों की आबादी 40 से 60 प्रतिशत के बीच है। सीमांचल क्षेत्र में उनकी जनसंख्या काफ़ी निर्णायक है।

प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित सीमांचल क्षेत्र में मुसलमानों की सबसे बड़ा आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, सीमांचल की मुस्लिम आबादी 47 फीसदी है, जबकि पूरे बिहार की 17.7 फीसदी आबादी मुस्लिम है। किशनगंज में राज्य की सबसे ज़्यादा मुस्लिम आबादी 67.98 प्रतिशत है। इसी प्रकार, पूर्णिया में मुस्लिम आबादी लगभग 38.46 प्रतिशत, अररिया में 42.95 प्रतिशत और कटिहार में 44.47 प्रतिशत है।

अंत में 

बिहार में भाजपा के पसमांदा प्रेम का महत्व मुस्लिम बेनफिशीएरी (सरकारी योजनाओं के लाभार्थी) का एक नया समूह तैयार करने की ओर है। इस प्रकार, बिहार में उत्तर प्रदेश की तर्ज पर एक नया आश्रित समूह को तैयार किया जा रहा है, जिन्हें जीवित रहने के लिए पूरी तरह से हिन्दुत्व सरकार की उदारता पर निर्भर रहना होगा।

हाल ही में हुए एसआईआर से जुड़े सवालों के अतिरिक्त लव-जिहाद और गौ-हत्या के नाम से हो रहे हिंसात्मक घटनाएं जग जाहिर हैं। इन सब से ऊपर सरकार द्वारा प्रोत्साहित दक्षिणपंथी गुंडों के मुसलमान बहिष्कार की घटनाएं भी अत्यंत संवेदनशील हैं।

वास्तव में, मुस्लिम मजदूर, व्यापारी और खुदरा विक्रेताओं के बहिष्कार लोगों को जीविका के साधनों से वंचित करना और उन्हें सरकारी सहायता पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करना है। भाजपा को अपने पसमांदा मुसलमानों के अभियान को प्रामाणिक बनाने के लिए, लाभार्थी सिद्धांत से कहीं आगे जाना होगा।

एनडीए के हर एक निर्णय में भाजपा प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। भाजपा आरएसएस की राजनीतिक शाखा है। भाजपा और आरएसएस की जकड़ी जुगलबंदी केवल चुनावी राजनीति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दूरगामी सैद्धांतिक, विचारधारा और नीतिगत संदर्भ में भी है। आरएसएस का यह तर्क है कि उसका मिशन अब मुसलमानों या ईसाइयों का विरोध करना नहीं है, बल्कि भारत के पुराने गौरव को बहाल करना है। भारत को “एक बार फिर” दुनिया का सर्वोच्च (आरएसएस शब्दावली में सिरमोर) राष्ट्र बनाना है।

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