रिटेल अर्थात खुदरा व्यापार तो बिल्कुल फ़्री मार्केट ही है। और इसकी सप्लाई चेन भी प्रभावी है। गाँव-गाँव में शैम्पू-साबुन-आलू की चिप्स के पैकेट मौजूद हैं। किसी गुंठी पर भी लटके मिल जाते हैं। फिर भी इस क्षेत्र में बड़े पूँजीपति घात लगा रहे हैं। और वो घात कैसे लगा पा रहे हैं? टेलीकॉम नेटवर्क पर अपने एकाधिकार और सरकारी नियमन संस्थाओं की आँख पर बंधी पट्टी की चलते।
मज़ेदार बात यह भी है कि थोक और खुदरा व्यापार का जातीय आधार भी है। किराने और कपड़े के व्यापार में अधिक संख्या सिंधी, बनिये, मारवाड़ी, जैनों की है। और यही वर्ग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का पुरज़ोर समर्थक भी है। इस क्षेत्र में बड़ी पूँजी का प्रवेश लगातार बढ़ा है, बढ़ता जा रहा है। आप किसी भी खुदरा व्यापारी से बात कीजिये, जवाब मिलता है “फटी पड़ी है”, या कुछ इससे मिलता जुलता। पिछले एक साल में किसानों से भी ज़्यादा आत्महत्या छोटे-मझौले व्यापारियों ने की है, ऐसा राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो कहता है। क्यों की है इसके कारण स्पष्ट हैं कि खुदरा व्यापार में सारा वॉल्यूम तो बड़ी पूँजी वाले ही कब्जा ले रहे हैं। फिर 10% की जगह 15% भी यदि मार्जिन हो जाये, और महीने भर का माल तीन और चार माहीने में बिके, तो बताइए मुनाफ़ा और आमदनी बढ़ी की घटी? दुकान किराया, बिजली का बिल, कामगार की तनख़्वाह, और माल ख़रीदने की सिलक, ये तो ख़र्चे ऐसे हैं कि बंद दुकान में भी लगे हुए हैं। और इस पर यदि कहीं से कोई कर्ज़ हो तो उसकी किश्त अलग से। आमदनी के नाम पर ठनठन गोपाल।
यह वर्ग तो तो न मज़दूरी जानता है, न बिजली और नल के काम कर सकता है। न इसके पास ख़ुद खेती कर पाने का शारीरिक बल है। तो ऐसे में जिस आर्थिक असुरक्षा से यह वर्ग गुज़र रहा है, उसका उपाय क्या सम्भव है? किसानों की तो ख़ैर अपनी राजनीतिक पहचान भी है, और ताकत भी। हालही में वापस हुए कृषि कानूनों से साबित हुआ कि अबकी बार तो कम से कम वो बड़ी पूँजी से लड़ने में कुछ कामयाब रहे। थोक और खुदरा व्यापारियों की तो कोई राजनीतिक पहचान नहीं है। उनकी जातीय पहचान ज़रूर है। लेकिन वह भी अब कमज़ोर पड़ रही है। सरकार इस वर्ग को सुरक्षा देने के लिए क्या कर रही है? यह प्रश्न तो है ही। साथ ही यह प्रश्न भी है कि क्या इस वर्ग में कुछ आंतरिक ऊहापोह भी चल रही है?
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– प्रियांक समग्र
खुदरा व्यापार पर दी पूंजी पतियों की घात कैसे बचेंगे खुदरा व्यापारी

