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प्रदेश में वन विभाग में भारी भ्रष्टाचार, अवैध कटाई, कब्जे, चोरी, खनन को संरक्षण

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मप्र वन विभाग की साइट असुरक्षित, खुलती नहीं, 

रामस्वरूप मंत्री

मध्यप्रदेश वन विभाग में भ्रष्टाचार, अबैध कटाई, बन भूमि पर कब्जा और अबैध खनन की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। नवंबर-दिसंबर 2025 में भोपाल में 400 से अधिक पेड़ों की अवैध कटाई का मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने के बाद यह मुद्दा फिर से चर्चा में आया है।

प्रदेश के वनों की स्थिति दिनों दिन गंभीर होती जा रही है मात्र 15% बन बड़ी नदियों चंबल नर्मदा व अन्य और उनके किनारों के ऊबड खाबड़ व पथरीली व बंजर भूमि व जल संग्रहण क्षेत्रों में ही वन बचे हुए हैं। अन्यथा तो जो सरकार 30% क्षेत्र में सघन वनों की बात करती है यह पूरा झूठा आंकड़ा होने के साथ बन विभाग की असुरक्षित साइट जिसे पहले तो सीथा खुला ही नहीं जा सकताऔर आप प्रयास करेंगे तो उसे पर लिख देगा वह सुरक्षित है। सुरक्षा के मापदंड हटा बड़ी मुश्किल से खुलती है। पर भी देखा जा सकता है। जितने भी कमाई वाले विभाग हैं वे सभी मुख्यमंत्री ने अपने पास रखे हुए हैं। जिसमें एक वन विभाग और उसकी आकृत प्राकृतिक वन संपदायें जिसमें ऋतुओं के अनुसार आने वाले कंद मूल फल फूल पत्तियां जड़ी बूटियां पौधे वृष्ठ झाड़ियां उनकी छालें, जड़ें, घास, उन पर लगने वाली गौंद, दूध, पैदा होने पलने वाले छोटे कीट आदि जिनका आयुर्वेदिक उपयोग होने के साथ-साथ भारी व्यावसायिक उपयोग भी है। 

बेशक यहां पर भी मदनी स्टाफ से लेकर करेली स्टाफ की  70% तक की कमी है। लिपिक वर्गीय स्टाफ तो 10% भी नहीं है। जो मैदानी स्टाफ बीट गार्ड

से लेकर उपवनपाल बनपाल आदि कार्यालयों में बर्षों से बैठ आवश्यक कार्य को अंजाम दे रहे हैं। जहां तक प्रदेश के भोपाल स्थित मुख्यालय से लेकर जिला और संभागीय स्तर पर वन विभाग में 16 वृत्त, 64 वन मंडल, 135 उपवन मंडल, 473 परिक्षेत्र, 1871 उपवन परिक्षेत्र और 8286 परिसर हैं।

यहां पर भी लिपिक चपरासियों से लेकर मैदानी स्टाफ में रेंजर एसडीओ तक की भर्ती इसमें भी लगभग 25000 कर्मचारियों अधिकारियों की तत्काल आवश्यकता है। प्रदेश की 8286 बीट में सूत्रों के अनुसार मात्र 3000 कर्मचारी काम कर रहे हैं। अनेकों बीट गार्ड के पास 2-3 का बीट का प्रभार है जिससे स्वाभाविक है। वनों की बीट के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के ग्रामीण भू, कटाई, पशु पक्षियों का शिकार करने वाले, बड़ी बूटियां पौधों वृक्षों फल फूल पत्तिया झाड़ियां, बबूल, पलाश आदि पर लगने वाला कीमती गीद पौधे आदि का संग्रहण करने वाले माफियाओं को बिशकवन विभाग के कर्मचारियों इसमें शामिल हो ऐसे माफिया को संरक्षण देते रह अपनी मोटी कमाई करते हैं। प्रदेश भर में हर जिले में आरा मिलों पर आने वाली लकड़ी विशेष तौर पर इंदौर के जीएनटी मार्केट में रात 9-10 बजे से लेकर से  सुबह 4:00 बजे तक आने वाली ट्रैक्टर ट्रॉली ट्रक आदि में लकड़ियां आते जाते देखी जा सकती है ।इस कार्य में वन विभाग के कार्यरत और सेवा निवृत्त पुराने कर्मचारी भी शामिल हैं।

इंदौर वन मंडल के डीएफओ एसडीओ से लेकर वहां के प्रभारी किसी को नहीं दिखते बेशक यह हाल पूरे प्रदेश का हैजहां भी जिन जिलों में सघन बन हैं। प्रदेश के 55 जिलों में से 30 जिलों में कोई बन ही नहीं है। अधिकांश जिलों की वन भूमि प्रबंधन विभाग के ही अधिकारियों कर्मचारियों की लापरवाही और मेहरबानी से कब्जे हो अब वहां व्यवसायिक और कृषि कार्य हो रहा है। शहरों से लगी हुई वन भूमि जिसमें इंदौर भी शामिल है। वन विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों की मोटे धन के बदले मेहरबानी से नगरीकरण और औद्योगीकरण हो चुका है।

अवैध वन कटाई, कब्जे, चोरी, खनन को संरक्षण

जानने के लिए इंदौर के बन मंडल को सूचना के अधिकार में पत्र दिया गया था कि आपकी कितनी भूमि पर कब से कहां कितने कब्जे हैं? उन हरामखोरों ने जानकारी न दन के बहाने के रूप में डालने वाला पत्र अवलोकन करें पहले घंटे के रु.50 जिसे मध्य प्रदेश सरकार ने रु. 5 से बढ़कर 50 कर दिया। बाकी हर आधे घंटे के रु.25 जमा करें और जानकारी देखें एक जानकारी देखने जाते हैं तो बता दिया जाता है कि स्टाफ नहीं है। दूसरी तरफ सबसे बड़ी भारी जालसाजी सामान्य प्रशासन विभाग ने वन विभाग साथ मिलकर यह की. की अधिकार अधिनियम की 19(5) के अंतर्गत जिस धारा स्पष्ट लिखा है कि उप स्तर का अधिकारी सयक सूचना अधिकारी होगा। उसका बरिष्ठ जिला स्तर का अधिकारी लोक सूचना अधिकारी होगा। को हि इन हरामखोर जालमाज भ्रों ने बदलकर उप संभागीय स्तर के अधिकारी को ही लोक सूचना अधिकारी बना दिया। और जिला स्तर के अधिकारी को ही अपीलीय अधिकारी बना दिया। जबकि जिला स्तर का अधिकारी लोक सूचना अधिकारी होने के कारण उसकाआपके लिए अधिकारी वृत्त स्तर का मुख्य बन संरक्षक होता था। तो वह जवाब तलब कर जानकारी देने के लिए कहता था बार-बार लिखने के बाद में भी डकैत सूकरो ने कानून था तो मजाक उड़ाया ही 20 साल के बाद में भी इन्होंने धारा 4 के 25 बिंदुओं की जानकारी शनबूझकर अपनी लूट डकैती भ्रष्टाचार छुपाने के लिए नहीं डाली और साइट भी इस प्रकार से असुरक्षित बनाई गई है, कि वह आसानी से खुलती नहीं है। मुश्किल से खोलने के बाद में भी पीसीसीएफ का नाम अगस्त 2025 से अपडेट ही नहीं किया गया है। दूसरी तरफ क्योंकि प्रदेश के मुखिया मोहन यादव है तो जितने भी यादव हैं। उत्तर प्रदेश और विहार की तरह यहां पर भी उनको मलाई वाले पदों पर बैठाने के सुरेंद्र किए जाते हैं चाहे वह

कितना भी जूनियर क्यों ना हो के वर्तमान में जो संदीप यादव पूर्व में सूचना शहरीय विकास के और मुख्य सचिव धारा हुआ करते थे अब वन विभाग के में अबर मुख्य सचिव है। स्वाभाविक संभागीय है वन मंत्री का प्रभार मुख्यमंत्री के लोक पाहीन राज्यमंत्री के रूप में दिलीप अहिरकार को रबर स्टैंप की भांति पदस्थ कर लिया गया है। भारतीय वन लूटो खाओ सेवा के अधिकारियों को वनों के संरक्षण विकास और संवर्धन से नहीं होने अपने विकास और संवर्धन से मतलब होता है। बेशक इसके नाम पर सैंकड़ों करोड़ विभित्र मदों में आवंटित किए जाते हैं। वृक्षारोपण संरक्षण प्राणी संरक्षण विकास आदि कर अधिकांश पैसा यह हरामखोर बनेले सूकर काजू पर ही दिखाकर हजम कर जाते हैं हाल ही में आपने देखा जिसको मैंने वीडियो भी डाले थे। की किस प्रकार बरगुंडा की नर्सरी के बाहरजों 17-18 में 42000 पौधे लगभग 39 हेक्टेयर भूमि पर रोपे गए थे। ये 7-8 वर्ष पुराने वृक्ष बन चुके जिसमें सागौन के वृक्ष भी थे। मत्र वन विकास निगम ने दिसंबर जनवरी में सारे पेड़ों की लकड़ी गायब कर बहां सफाई करवा दी सूत्रों में जब जानकारी एकत्रित की गई तो मालूम पड़ावन विकास निगम वहां पर अपनी नर्सरी लगाएगा तो हरामखोरों जो 42000 पौधे लगाए गए थे 16-17 में वे सब क्या तुम्हारे बाप की जागीर से पैसा निकाल कर लगाए गए थे। उसमें भी जनता का ही करोड़ों रुपए बुध बनाने पौधारोपण करनेखर्च हुआ था। 

बिना किसी जांच में पड़ताल पत्राचार यह 39 हेक्टेयर का महू चोरल मार्ग पर वन साफ कर दिया गया। जिसकी शिकायत हुई। अखबारों ने कई बार छापा। पर हरामखोरों को जनधन को लूट कर खाने से फुर्सत मिले  तब तो सूचना के अधिकार में जानकारी दें अपनी साइट पर 25 बिंदुओं की जानकारी अपलोड करें और सूचना के अधिकार में जानकारी मांगने वाले को तरीके से नीयम अनुसार जवाब दे पर आज कल यह सभी विभागों की परिपाटी बन चुकी है कि वह हरामखोर जानकारी देने की अपेक्षा अवलोकन करें, और चिन्हित दस्तावेजों की फोटोकॉपी के पैसे जमा करके प्राप्त कर सकते हैं। यह षडयंत्र प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री यह अन्य सभी मंत्रियों के कार्यालय में चलाया जा रहा है जब सूचना का अधिकार लगे हुए 20 साल होगा और उसमें स्पष्ट था कि आपको  25 बिंदुओं की जानकारी वेबसाइट में सरकार को लोड करनी है तो भाई क्यों लोड नहीं करते जब पंचायतों में सारे वाउचर लोड किये जा सकते हैं। ग्रामीण विकास प्राधिकरण में सारी एमबी साइट पर लोड की जा सकती हैं। तो अन्य विभाग क्यों नहीं कर सकते।

 जब सरकार बोलती है कि सन 2010 से सारा काम कंप्यूटर पर हो रहा है और बार-बार मुख्यमंत्री ने भी घोषणा की, कि अब सारा कार्य कंप्यूटर पर ऑनलाइन हीकिया जाएगा इसके बाद में बहुत सारी जानकारी ऑनलाइनआमजन को देखने को नहीं मित्यती जबकि आमजन की गर्दन दबाकर उससे करों में मनचाहे तरीके से पेट्रोल डीजल गैस शराब बिजली पानी मैं पैसा बसूल करने के बाद में भी गंदा पानी बार-बार बिजली की कर्टाती वोल्टेज फ्लकचुएशन खराब सड़कें खराब शिक्षा आदि देने के बाद में भी  भारतीय जनता पार्टी की सरकार में पूरे प्रदेश को पिछले 20 सालों में और केंद्र में बैठे  सरकार की भाजपा ने देश को 11 सालों में बर्बाद कर दिया।

मध्यप्रदेश में वन विभाग से संबंधित भ्रष्टाचार के प्रमुख मामले और स्थितियां निम्नलिखित है। अवैध पेड़ों की कटाई:

नवंबर 2025 में, भोपाल के आसपास विकास परियोजनाओं के नाम पर लगभग 488 पेड़ अवैध रूप से काटे गए, जिसके बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सभी प्रकार की पेड़ों की कटाई और छंटाई पर रोक लगा दी।

रिपोर्टों के अनुसार, पेड़ कटाई के लिए NGT या संबंधित ट्री ऑफिसर की अनुमति नहीं ली गई थी, और यहां तक कि अधिकारियों ने पेड़ हटाने के लिए

‘स्थानांतरण’ का बहाना बनाया, जबकि वास्तव में उन्हें काट दिया गया था।

सागर जिले के कलेक्टोरेट परिसर में भी 1.000 पेड़ काटने का मामला सामने आया, जिसके बाद कोर्ट ने जांच के आदेश दिए। अवैध कटाई के कारण माफिया सागौन जैसे कीमती पेड़ों को निशाना बना रहे हैं, जो हरदा, नरसिंहपुर, और उमरिया जैसे जिलों में एक गंभीर समस्या है।

वन भूमि पर अवैध कब्जाः शिवपुरी जिले के करेरा वन परिक्षेत्र में 300 बीषा से अधिक वन भूमि पर भूमाफियाओं द्वारा अवैध कब्जा कर खेती करने का मामला सामने आया, जिसे हटाने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल किया गया।

छतरपुर जिले में लगभग 12,000 हेक्टेयर वन भूमि पर खेती और मकान बनाकर अतिक्रमण की खबरें हैं, जिनमें से बहुत कम को अब तक मुक्त कराया जा सका है।

डिंडोरी जिले में लगभग 100 एकड़ बन भूमि पर अतिक्रमण हटाने के दौरान बन विभाग और ग्रामीणों के बीच टकराव की खबरें सामने आई हैं।

अवैध खनन :

नरसिंहपुर के बरमान बन परिक्षेत्र में जंगलों के अंदर अवैध मिद्री खनन और ईंट भट्टों का संचालन वन विभाग की लापरवाही को उजागर करता है।

दमोह और सागर जिले में अवैध खनन माफिया द्वारा बन क्षेत्रों से चोरी-छिपे खनन किया जा रहा है. जिसे स्थानीय स्तर पर बन अधिकारियों का संरक्षण प्राप्ण होने के आरोप लगते रहे हैं।

कोयला खदानों के लिए, विशेषकर सिंगरौली क्षेत्र में (अडानी चिराडली कोयत्य परियोजना), वन भूमि और आदिवासी अधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे

वन विभाग में भ्रष्टाचार:

दमोह वन मंडल में, यह आरोप लगाया गया कि सरकारी डीजल और वाहनों का रखरखाव कागजों पर दिखाकर धन का दुरुपयोग किया गया।

वन माफियाओं द्वारा वन कर्मियों पर हमले (जैसे नरसिंहपुर और शहडोल में) यह दशति है कि कुछ मामलों में माफिया को प्रशासनिक डील का लाभ मिल रहा है।

IFS और राज्य वन सेवा के 100 से अधिक अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लोकायुक्त या अन्य जांच एजेंसियों के पास लंबित होने की खबरें हैं। इन मामलों को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का रुख बेहद सख्त है, और राज्य सरकार को पेड़ों की सुरक्षा और प्रतिपूरक वृक्षारोपण पर हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं

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