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बेढब शहरों की बड़ी भारी कीमत

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मंजू मोहन,

पूर्व प्रमुख, सेंटर फॉर ऐट्मस्फेरिक साइंस, आईआईटी

सोमवार को जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने अपनी छठी मूल्यांकन रिपोर्ट के दूसरे भाग को जारी करते हुए यह चेतावनी दी कि यदि कार्बन उत्सर्जन को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया, तो वैश्विक स्तर पर गरमी और आर्द्रता असहनीय हालात पैदा करेंगे, और यह स्थिति भारत जैसे देशों को कहीं ज्यादा प्रभावित करेगी। पहली बार आईपीसीसी की समिति ने अलग-अलग प्रांतों की समीक्षा की है, लेकिन दुर्भाग्य से यह रिपोर्ट उतनी चर्चा नहीं बटोर सकी, जितनी दरकार थी। अभी तमाम देशों की नजर रूस और यूके्रन की जंग पर है, जबकि युद्ध प्रदूषण का एक बड़ा कारक है। रणभूमि में जितने भी गोला-बारूद या हथियार आदि इस्तेमाल किए जाते हैं, वे काफी मात्रा में प्रदूषण और एरोसॉल (महीन ठोस और तरल कणों की गैस के रूप में मौजूदगी) पैदा करते हैं। सुपरसोनिक और जंगी विमानों की गिनती भी बड़े प्रदूषकों में होती है। इतना ही नहीं, जलवायु मुद्दों पर लगने वाली पूंजी भी युद्ध की तरफ मोड़ दी जाती है, जिससे पर्यावरणीय मसले अनछुए रह जाते हैं।
लिहाजा, यह कहना उचित होगा कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले मुद्दों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का मौका हम गंवा रहे हैं। अभी हमें एक-दूसरे से उलझने के बजाय एकजुटता दिखानी चाहिए और साझा मुद्दों पर लड़ना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पर्यावरण को हमने हद से अधिक बर्बाद कर दिया है। हालिया वर्षों में चक्रवाती तूफान, मानसून आदि की आवृत्ति बढ़ गई है और चरम मौसमी परिघटनाएं भी लगातार घट रही हैं। समुद्र का तापमान इतनी तेजी से बढ़ता जा रहा है कि तटीय इलाकों के लिए काफी विषम परिस्थितियां पैदा हो रही हैं।
आईपीसीसी की नई रिपोर्ट में शहरीकरण को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। बताया गया है कि शहर और शहरी केंद्र वैश्विक तापमान को बढ़ाने में लगातार योगदान दे  रहे हैं। अनियोजित शहरीकरण पर्यावरण पर नकारात्मक असर डालता है। आंकडे़ भी तस्दीक कर रहे हैंकि शहर न सिर्फ अपने तापमान को वैश्विक गरमी के लिहाज से अनुकूल बना रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी तापमान को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट की मानें, तो अनियोजित शहरीकरण ने न सिर्फ गरमी, बल्कि एरोसॉल बढ़ाने का भी काम किया है। इनसे मौसम एवं जलवायु लगातार प्रभावित हो रहे हैं। शहरों में ऊंची-ऊंची इमारतें बन गई हैं, जिनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्रियां ‘री-रेडीएट’ (विकिरण को अवशोषित करने के बाद फिर से विकिरण करना) करती हैं। नतीजतन, रात का न्यूनतम तापमान बढ़ चला है। यह वृद्धि उन उपकरणों से भी हो रही है, जो सुविधा के नाम पर शहरों में दिन-रात इस्तेमाल किए जा रहे हैं या फिर हर वक्त सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियों के कारण।  
एक हालिया अध्ययन बताता है कि शहरीकरण के कारण बढ़ने वाला तापमान तूफान और गरज के साथ बिजली जैसी मौसमी परिघटनाओं की बारंबारता बढ़ा रहा है। बारिश पर भी इसका असर पड़ता है। हमने देखा भी है कि इन दिनों न सिर्फ तेज बारिश आने की आवृत्ति बढ़ी है, बल्कि चरम मौसमी घटनाओं में भी तेजी आई है। आईपीसीसी की रिपोर्ट बताती है कि मध्यम श्रेणी वाली बारिश के बरसने की दर कम हुई है, जबकि तेज बारिश की दर बढ़ी है। बढ़ती वैश्विक गरमी ने मानसून को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है।
यह रिपोर्ट भारत को लेकर बहुत अच्छी तस्वीर नहीं दिखा रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि वादे के मुताबिक अगर उत्सर्जन कम कर लिया गया, तब भी उत्तरी और तटीय भारत के कई इलाकों में इस शताब्दी के अंत तक ‘वेट-बल्ब’ तापमान (गरमी और आर्द्रता को एक साथ मापने वाला मापक) 31 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा रहेगा। हालांकि, नीतिगत मोर्चे पर हमारी सरकार ने काफी अच्छा काम किया है। हमने आबोहवा सुधारने को लेकर अच्छी कार्ययोजना बनाई है और उस पर हम संजीदगी के साथ आगे बढ़ रहे हैं। अक्षय ऊर्जा के लिहाज से अब 2030 के उस लक्ष्य की ओर हम बढ़ गए हैं, जिसकी राह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखाई है। हमें अब अक्षय ऊर्जा (फिर चाहे वह सौर हो या पवन ऊर्जा) पर अधिक से अधिक निर्भरता और कोयले के इस्ेतमाल को अधिक से अधिक हतोत्साहित करने की दिशा में काम करना चाहिए। इतना ही नहीं, इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) की तरफ भी हमें काफी अधिक गंभीरता दिखानी होगी। हरित पट्टियों पर जोर देना होगा और शहरों में जंगली क्षेत्र का विस्तार करना भी बहुत जरूरी है। हां, पराली जलाना या प्लास्टिक आदि का कचरा भी हमारी आबोहवा के लिए एक बड़ा खतरा है, जिनके खिलाफ कमर कसने की आवश्यकता है।
मगर दिक्कत यह है कि ये तमाम नीतियां कागजों पर जितनी मजबूत है, जमीन पर उतनी नहीं दिखतीं। जाहिर है, जनता के स्तर पर काफी काम किए जाने की जरूरत है। तंत्र को इस दिशा में सक्रिय होना पड़ेगा और आम लोगों को लगातार जागरूक करना होगा।
अनियोजित शहरीकरण के उपाय जल्द से जल्द तलाशने भी जरूरी हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हमें शहरीकरण से ही तौबा कर लेना चाहिए, लेकिन बीच का रास्ता जरूर निकालना चाहिए। अच्छी बात है कि हाल के वर्षों में वैकल्पिक रास्ते की खोज बढ़ चली है और शहरों की सड़कों पर इलेक्ट्रिक गाड़ियां भी अब दिखने लगी हैं। हमें यह समझना ही होगा कि हरेक शहर के विस्तार की एक सीमा होती है। चंद शहरों पर क्षमता से अधिक भार डालने का एक नतीजा वायु प्रदूषण के रूप में हम झेल रहे हैं। अध्ययन यही बताते हैं कि हर शहर यह जानता है कि वह किस हद तक प्रदूषण को खुद में समेट सकता है, लेकिन हम उसे अनसुनी कर देते हैं। लिहाजा, बदलती जीवनशैली के हिसाब से शहरीकरण और उसके विस्तार का खाका खींचने की जरूरत है। हमें इसके लिए मापदंड बनाने होंगे। हमें विकास भी चाहिए और प्रदूषण से मुक्ति भी। इसके लिए शहरों का विकेंद्रीकरण एक बेहतर उपाय है।

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