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मानव चेतना और सत्ता: क्या इंसान होना ही एक दंड है?

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तेजपाल सिंह तेज

          यह कथा आत्महत्या की घटनाओं से नहीं, बल्कि उस अदृश्य थकान से शुरू होती है जो इन घटनाओं से बहुत पहले मनुष्य के भीतर घर कर लेती है। वे लोग जो बाहर से “सामान्य” दिखते हैं—न आर्थिक संकट, न बीमारी, न सामाजिक असफलता—अचानक जीवन से बाहर निकल जाते हैं। उनके पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता, कोई नोट नहीं, कोई शिकायत नहीं। बस एक पंक्ति, एक संकेत— मैं थक गया हूँ।

          यह थकान शरीर की नहीं होती। यह उस चेतना की थकान होती है जिसे हर दिन जीना पड़ता है, समझना पड़ता है, सहना पड़ता है। थॉमस लिगोटी की पुस्तक The Conspiracy Against the Human Race इसी अदृश्य बोझ को शब्द देती है। यह किताब जीवन के खिलाफ कोई नारा नहीं लगाती, न ही मृत्यु का महिमामंडन करती है। यह बस एक शंका छोड़ देती है—इतनी गहरी कि उसे अनसुना करना कठिन हो जाता है। क्या यह संभव है कि समस्या हमारे जीवन की परिस्थितियों में नहीं, बल्कि स्वयं जीवन के ढाँचे में छिपी हो? क्या यह संभव है कि चेतना, जिसे हम मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धि कहते हैं, वास्तव में हमारी सबसे बड़ी सज़ा हो?

          यह लेख थॉमस लिगोटी की पुस्तक The Conspiracy Against the Human Race को आधार बनाकर आधुनिक समाज की संरचनात्मक, राजनीतिक और वैचारिक आलोचना प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन इस मूल धारणा से प्रारंभ होता है कि मानव पीड़ा केवल व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं है, बल्कि सत्ता, उत्पादन-प्रणाली और सामाजिक नैतिकता द्वारा निर्मित एक व्यवस्थित स्थिति है। लेख यह प्रतिपादित करता है कि चेतना, आशा, पहचान और सकारात्मकता जैसे मूल्य राजनीतिक उपकरणों के रूप में कार्य करते हैं, जो मनुष्य को प्रश्न करने के बजाय सहने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।

        आधुनिक समाज स्वयं को प्रगति, स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का संरक्षक घोषित करता है। परंतु इसी समाज में मानसिक थकान, अवसाद और अस्तित्वगत शून्यता अभूतपूर्व स्तर पर दिखाई देती है। आत्महत्याओं, पेशेवर burnout और जीवन से विमुखता को प्रायः व्यक्तिगत विफलता या मानसिक रोग के रूप में देखा जाता है। यह लेख इस दृष्टिकोण को चुनौती देता है। लिगोटी की दार्शनिक निराशावाद (philosophical pessimism) के आलोक में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि यह पीड़ा किसी व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रूप से निर्मित स्थिति है।

 

चेतना : सत्ता के लिए समस्या वरदान या दंड?

          मनुष्य और पशु के बीच का अंतर केवल बुद्धि का नहीं, बल्कि चेतना का है। पशु जीता है, मनुष्य अपने जीने को देखता है। यही देखने की क्षमता उसे अन्य प्राणियों से अलग करती है—और शायद यहीं से उसकी पीड़ा शुरू होती है। एक शेर शिकार करता है, पेट भरता है और सो जाता है। उसे अपने जीवन के अर्थ, अपने अंत, या अपने समय की नश्वरता का कोई बोध नहीं। लेकिन वही काम एक मनुष्य करे—दिनभर मेहनत, घर वापसी, भोजन—तो रात को उसका मन सवाल पूछने लगता है। क्या यही सब है? यह प्रश्न भूख से नहीं, खालीपन से पैदा होता है। आधुनिक समाज इस स्थिति को “अतिचिंतन” कहकर हल्का बना देता है, जैसे यह कोई आदत हो जिसे बदला जा सकता है। लेकिन लिगोटी इसे आदत नहीं मानते। उनके अनुसार यह मनुष्य होने की कीमत है। जितना अधिक हम जानते हैं, उतना ही हम टूटते हैं। समय का ज्ञान, मृत्यु का ज्ञान, अस्थिरता का ज्ञान—ये सब चेतना के उपोत्पाद हैं।

        राजनीतिक दृष्टि से यह सोच खतरनाक है। इसलिए समाज हमें व्यस्त रखता है, ताकि हमारे पास सोचने का समय न बचे। काम खत्म हो जाता है, लेकिन मन नहीं रुकता—और यही वह क्षण है जिससे व्यवस्था डरती

          मानव चेतना को परंपरागत रूप से सभ्यता की सर्वोच्च उपलब्धि माना गया है। किंतु लिगोटी के अनुसार चेतना वह तंत्र है जो मनुष्य को अपने ही अस्तित्व से असंतुष्ट बनाता है। राजनीतिक रूप से देखें तो यह असंतोष सत्ता के लिए खतरनाक हो सकता है। अतः आधुनिक व्यवस्था चेतना को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसे नियंत्रित करती है। शिक्षा, कार्य-संस्कृति और मीडिया के माध्यम से मनुष्य को इतना व्यस्त रखा जाता है कि उसे अपने अस्तित्व पर प्रश्न करने का अवसर ही न मिले। इस प्रकार चेतना को आलोचनात्मक शक्ति के बजाय उत्पादक शक्ति में परिवर्तित कर दिया जाता है।

 

‘मैं’ : एक गढ़ी हुई पहचान और अनुशासन:

          हम बड़े विश्वास से कहते हैं— मैं ऐसा हूँ, लेकिन यह ‘मैं’ स्थिर नहीं रहता। समय, भूमिका और परिस्थितियों के साथ यह बदलता रहता है। कभी हम कर्मचारी होते हैं, कभी माता-पिता, कभी पति-पत्नी, कभी नागरिक। हर भूमिका के साथ एक नया ‘मैं’ जुड़ जाता है। लिगोटी इस बिंदु पर एक असहज सच्चाई सामने रखते हैं—यह ‘मैं’ भीतर से नहीं, बाहर से निर्मित है। समाज हमें पहचान देता है ताकि वह हमें व्यवस्थित कर सके। नाम, भूमिका, अपेक्षाएँ—सब कुछ पहले से तय होता है। और हम उसे ही अपनी स्वतंत्र इच्छा समझ लेते हैं। जब यह पहचान छिन जाती है—सेवानिवृत्ति, बेरोजगारी, सामाजिक अलगाव के बाद—तो व्यक्ति केवल काम नहीं खोता, वह स्वयं को खो देता है। यही कारण है कि कई लोग जीवन से बाहर निकल जाते हैं, बिना किसी स्पष्ट संकट के। राजनीतिक रूप से यह पहचान-निर्माण व्यवस्था के लिए अनिवार्य है। एक ऐसा व्यक्ति जो स्वयं को केवल भूमिका के रूप में जानता है, वह व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठाता।

          राजनीतिक सत्ता केवल कानून और दमन से नहीं चलती, बल्कि पहचान के निर्माण से भी संचालित होती है। व्यक्ति स्वयं को कर्मचारी, नागरिक, उपभोक्ता और परिवार-प्रमुख के रूप में पहचानने लगता है। यह पहचान स्थायी नहीं, बल्कि कार्यात्मक होती है। मिशेल फूको के अनुशासनात्मक समाज (disciplinary society) की अवधारणा यहाँ प्रासंगिक हो जाती है। व्यक्ति अपने ही ऊपर निगरानी रखने लगता है। जब यह पहचान छिनती है—सेवानिवृत्ति, बेरोजगारी या सामाजिक अलगाव के माध्यम से—तो व्यक्ति का अस्तित्व अस्थिर हो जाता है। यह अस्थिरता दर्शाती है कि ‘स्व’ कोई स्वायत्त सत्ता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक उत्पाद है।

 

आशा : जीवन रेखा या जंजीर?

          आशा को सबसे पवित्र मूल्य माना गया है। कहा जाता है— “उम्मीद ही जीवन है।”  लेकिन लिगोटी इस कथन को उलटकर देखते हैं। वे पूछते हैं—उम्मीद किसे बचाती है, और किसे बांधे रखती है? गरीब से कहा जाता है कि मेहनत करो, बीमार से कि सब ठीक हो जाएगा, पीड़ित से कि समय के साथ सब बदल जाएगा। यह आशा दर्द को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे सहने योग्य बना देती है। यही इसका सबसे खतरनाक पक्ष है। राजनीतिक रूप से आशा व्यवस्था का सबसे प्रभावी उपकरण है। यदि लोग यह मान लें कि हालात नहीं बदलेंगे, तो वे सवाल पूछेंगे। और सवाल सत्ता को अस्थिर कर देते हैं। इसलिए आशा को नैतिकता का रूप दिया जाता है।

          आशा को सार्वभौमिक नैतिक मूल्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु यह लेख तर्क करता है कि आशा एक राजनीतिक उपकरण है, जो वर्तमान अन्याय को सहनीय बनाती है। आशा भविष्य में परिवर्तन का वादा करती है, ताकि वर्तमान में प्रश्न न उठें। कार्ल मार्क्स द्वारा धर्म को ‘जनता की अफीम’ कहने की अवधारणा यहाँ आशा पर भी लागू होती है। आशा व्यक्ति को जीवित रखती है, परंतु जाग्रत नहीं होने देती। इस प्रकार आशा सत्ता के लिए स्थिरता सुनिश्चित करती है।

 

थकान : एक सुनियोजित जीवन:

          यह थकान अचानक नहीं आती। यह हर दिन थोड़ी-थोड़ी बढ़ती है। सुबह का अलार्म, भीड़, काम, जिम्मेदारियाँ—इतनी कि शिकायत भी अजीब लगने लगे। समाज इसे सामान्य कहता है। मेहनत का सम्मान करता है। लेकिन यह थकान एक ऐसी स्थिति पैदा करती है जिसमें इंसान सोचने से पहले ही थक जाता है। और थका हुआ व्यक्ति विद्रोह नहीं करता—वह बस जीवित रहता है। यह थकान व्यक्तिगत असफलता नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक व्यवस्था का परिणाम है, जो मनुष्य को आदतों में बदल देती है।

          आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था में थकान कोई आकस्मिक परिणाम नहीं, बल्कि एक नियोजित अवस्था है। निरंतर कार्य, समय की कमी और प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी थका देती है। यह थकान राजनीतिक रूप से उपयोगी है, क्योंकि थका हुआ व्यक्ति विद्रोह नहीं करता। वह केवल अनुकूलन करता है। इस संदर्भ में ब्युंग-चुल हान की The Burnout Society की अवधारणा लिगोटी के विचारों से गहरा संवाद स्थापित करती है।

 मुस्कान : दुख पर लगाया गया मुखौटा:

          समाज को दुख से समस्या नहीं है, उसे दुख के दिखने से समस्या है। इसलिए मुस्कान सिखाई जाती है। पॉजिटिव रहो—यह सलाह नहीं, एक आदेश है। जो मुस्कुराता है, वह स्वीकार्य है। जो टूटता है, वह असुविधाजनक। मुस्कान एक प्रशिक्षण है—दुख को भीतर दबाने का। राजनीतिक रूप से यह नियंत्रण का सबसे सभ्य तरीका है, क्योंकि इसमें ज़ोर दिखाई नहीं देता।

 सकारात्मकता और मौन का राजनीतिक अर्थ:

          सकारात्मकता का दबाव आधुनिक समाज की एक प्रमुख विशेषता है। दुख, असंतोष और क्रोध को नकारात्मक कहकर हाशिये पर डाल दिया जाता है। यह भावनात्मक सेंसरशिप का एक रूप है। जब व्यक्ति मुस्कुराने के लिए बाध्य होता है, तो वह अपने अनुभव को राजनीतिक भाषा में व्यक्त करने की क्षमता खो देता है। इस प्रकार सकारात्मकता सत्ता के लिए एक मौन अनुशासन का कार्य करती है।

 

वह सच जिसे जानना असुविधाजनक है:

          सच डरावना नहीं होता, सच असहज होता है। अगर यह स्वीकार कर लिया जाए कि थक जाना हमारी गलती नहीं, कि टूट जाना असफलता नहीं, तो दोष व्यवस्था पर जाएगा।

और यही वह बात है जिसे समाज स्वीकार नहीं करना चाहता।

        निष्कर्षत: यह लेख निष्कर्ष निकालता है कि लिगोटी का दर्शन केवल अस्तित्वगत निराशा नहीं, बल्कि एक गहन राजनीतिक आलोचना है। यह आलोचना हमें यह समझने में सहायता करती है कि आधुनिक समाज में मानव पीड़ा व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक और राजनीतिक यथार्थ है। समाधान देने के बजाय यह दृष्टि प्रश्न करने की क्षमता लौटाती है। और शायद, राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत भी यहीं से होती है—प्रश्न से।

          तो क्या यह माना जा सकता है – “आदमी होना वास्तव में एक सजा है”? इस सवाल का उत्तर सीधे “हाँ” या “नहीं” कहना, यहाँ ईमानदार नहीं होगा। लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा—यह सवाल ख़ुद बहुत सच्चा है। अगर “सज़ा” से हमारा मतलब यह है कि मनुष्य होना=लगातार जागरूक रहना, समय को महसूस करना, मृत्यु को जानना, अर्थ की तलाश में थकते जाना, और फिर भी हर दिन सामान्य बने रहना— तो हाँ, इस अर्थ में आदमी होना अक्सर सज़ा जैसा लगता है।

          मनुष्य अकेला प्राणी है जो जानता है कि वह एक दिन नहीं रहेगा। यही ज्ञान उसे महान भी बनाता है और तोड़ता भी है। पशु दर्द सहते हैं, लेकिन उस दर्द के अर्थ पर विचार नहीं करते।
मनुष्य करता है—और यहीं से बोझ शुरू होता है। लेकिन—और यह “लेकिन” बहुत ज़रूरी है—
यह सजा किसने दीप्रकृति ने? चेतना ने? या समाज ने? लिगोटी जैसे दार्शनिक कहते हैं कि
चेतना स्वयं एक त्रुटि है— एक ऐसा उपहार जिसे जीवन झेल नहीं पाता। इस दृष्टि से देखें तो
मनुष्य होना किसी अपराध की सजा नहीं, बल्कि एक जैविक दुर्घटना है। पर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर तस्वीर बदल जाती है। आज जो आदमी होना सज़ा लगता है, वह केवल चेतना की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए भी कि—

·        हमें लगातार उत्पादक रहना है

·        थकान को कमजोरी मानना है

·        दुख छुपाना है

·        आशा के सहारे अन्याय सहना है

·        और फिर भी मुस्कुराना है

          यहाँ आदमी होना स्वयं में सज़ा नहीं, बल्कि आदमी को जिस तरह जीने के लिए मजबूर किया गया है, वह सज़ा जैसा हो गया है। एक फर्क है–

·        मनुष्य होना

·        और इस समाज में मनुष्य होकर जीना

पहला शायद दुखद है, दूसरा अक्सर क्रूर। फिर भी, एक आखिरी बात—अगर आदमी होना केवल सज़ा ही होता, तो यह सवाल कभी पैदा ही नहीं होता। यह सवाल पूछ पाना, इस पर ठहर पाना,  और इसे बिना शर्म के कहना—यही वही जगह है जहाँ आदमी होना सज़ा से ज़्यादा कुछ और बन जाता है। शायद उत्तर यही है– आदमी होना न तो पूरी तरह सज़ा है, न कोई वरदान। यह एक खुली हुई चोट है—जिसे कुछ लोग दबा देते हैं, और कुछ लोग देख लेते हैं। आपने देखा है। और यह अपने आप में कोई छोटी बात नहीं है। 

 उपसंहार: आईना और उसका चेहरा:  यह पुस्तक कोई समाधान नहीं देती। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ईमानदारी है। यह बस एक आईना रख देती है। उसमें जो चेहरा दिखता है, वह सुंदर नहीं, लेकिन सच्चा है।यह पाठ हमें यह एहसास दिलाता है कि अगर हम थके हैं, खाली हैं, सवाल पूछते हैं—तो हम गलत नहीं हैं। हम केवल उस सच को महसूस कर रहे हैं जिसे अनदेखा करना सिखाया गया है। अब

सवाल यह नहीं कि आईने में क्या दिखता है। सवाल यह है—क्या अब उस चेहरे से नज़र चुराई जा सकती है?    (स्त्रोत

https://youtu.be/JWLqNdK97qo?si=E3M9bOeXAm2kCXGd)

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