अग्नि आलोक

भाकपा स्थापना के सौ वर्ष: गौरवशाली संघर्षों और कुर्बानियों की अनवरत यात्रा*

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,सत्यम_सागर

आज यानी 26 दिसंबर 2025 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के सौ वर्ष मुकम्मल होने जा रहे हैं। इस अवसर पर एक दास्तान आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं जो जरा लंबी बेशक है लेकिन पढ़ेंगे और प्रतिक्रिया देंगे तो अच्छा लगेगा। 

एक शताब्दी की यह यात्रा सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी की यात्रा नहीं है बल्कि एक पूरे समाज के नवोन्मेष की जद्दोजहद की कहानी भी है। इसमें देश और समाज के लिए सर्वोच्च बलिदान की कहानियां शामिल हैं तो संवेदना, निजी जीवन में जबरदस्त बदलावों,समाज को देखने के नजरिए में परिवर्तन यहां तक कि निजी रिश्तों की बराबरी तक में देखा जा सकता है। एक एक किस्से को लेकर बैठेंगे तो घंटों बातें की जा सकती हैं कि किस तरह कोई व्यक्ति कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनने के लिए अपनी सारी जायदाद कुर्बान कर देता है। कितने ही लोग अपने परिवारों में सामंती, जातिवादी और पितृसत्तात्मक रवैए और चलन को ठोकर मारकर समता और प्रेम पर आधारित रास्ते पर निकल पड़ते हैं क्योंकि उन्होंने कम्युनिस्ट विचार को समझ लिया था। एक ऐसा विचार जो किसी भी तरह की गैर बराबरी को नामंजूर करता है। चाहे वह गैर बराबरी परिवार में हो, समाज में हो, राजनीति में हो, सत्ता में हो यहां तक कि प्रेम और दोस्ती तक में। एक समय आता जब यह एक पूरी पीढ़ी का विचार बन गया और लोग या तो इसके साथ दिखते थे या खिलाफ में रहते हुए भी तर्क ऐसे गढ़ते थे कि खिलाफ दिखें नहीं। क्या साहित्य और क्या सिनेमा। सब जगह एक प्रगतिशीलता  केंद्र में थी और उसके केन्द्र में था साम्यवादी विचार और कम्युनिस्ट पार्टी। कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव कभी भी संसद में उसके द्वारा जीती हुई सीटों से तय नहीं होता था बल्कि उन मुद्दों से होता था जिन्हें उसने समाज में प्रमुख बना दिया था। इसलिए जाति, लिंग, सम्प्रदाय और वर्गीय आधार पर समता और समानता के लिए संघर्ष के मूल में आपको हर बार कम्युनिस्ट पार्टी ही नजर आती है।

#पृष्ठभूमि: वो दिन के जिसका वादा था:* 

दुनिया के हरेक देश में कम्युनिस्ट पार्टियों के गठन की पृष्ठभूमि में मार्क्सवादी विचार ही केन्द्र में है। 1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो की रचना के साथ ही एक ऐसी दुनिया का सपना सबके लिए मिल गया जिसमें हर प्रकार के शोषण और गैर बराबरी का खात्मा होगा और समता पर आधारित व्यवस्था बनेगी जो सही मायनों में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित होगी। 1917 में ब्लादिमीर इल्यीच लेनिन के नेतृत्व में रूस में हुए समाजवादी इंकलाब ने इस सपने को साकार करके भी दिखा दिया। रूसी क्रांति ने पूरी दुनिया में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को भी प्रभावित किया और वे जन आंदोलनों में बदलने लगे। भारत में उन्नीसवीं शताब्दी खत्म होते होते मजदूर आंदोलन गति पकड़ने लगा था और काम के घण्टे आठ करने की मांग भी। 1920 तक आते आते मुंबई सहित देश के अनेक औद्योगिक केंद्रों में जुझारू मजदूर आंदोलन तैयार हो चुका था जिसकी परिणिति ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस यानी एटक की स्थापना में हुई। इसी दौर में देश के अनेक हिस्सों खासकर मुंबई, दक्षिण भारत,बंगाल और संयुक्त प्रांत आदि में मार्क्सवादी विचार को स्वीकार करने वाले संगठन बनने लगे थे। अनेक क्रांतिकारी समूह भी इस विचार से जुड़ रहे थे जिसमें सबसे प्रमुख भगतसिंह और साथियों द्वारा स्थापित हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन था जिसने हाल ही में अपने नाम में सोशलिस्ट शब्द जोड़कर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को जाहिर कर दिया था। ऐसे में ब्रिटिश सरकार के कान खड़े हुए और उसने कम्युनिस्टों पर विभिन्न षडयंत्र केस चलाकर उन्हें फांसी और काले पानी की सजाएं देना शुरू कर दिया। 1920 में पेशावर षड्यंत्र केस और 1924 में कानपुर षडयंत्र केस इनमें प्रमुख हैं। उस समय के सर्वोच्च कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे, एसवी घाटे ,मुजफ्फर अहमद और अक्षय ठाकुर, रफीक अहमद और शौकत उस्मानी आदि गिरफ्तार करके जेल भेज दिए गए। तब तक एक देशव्यापी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का विचार परिपक्व हो चुका था इसलिए यह तय किया गया कि उसी कानपुर शहर में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की जाए। देश में पहली बार पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव और इंकलाब जिन्दाबाद का नारा देने वाले मौलाना हसरत मोहानी स्वागत समिति के अध्यक्ष थे और सत्यभक्त, सिंगारवेलु चेट्टियार सहित अनेक क्रांतिकारियों की मौजूदगी में 26 दिसंबर को कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। 

26 से 28 द‍िसंबर 1925 को कानपुर में भारतीय कम्‍युन‍िस्‍टों का स्‍थापना सम्‍मेलन हुआ. इसमें क़रीब 500 प्रत‍िन‍िध‍ियों ने ह‍िस्‍सा ल‍िया.

पार्टी का नाम रखा गया- ‘कम्‍युन‍िस्‍ट पार्टी ऑफ इंड‍िया’ (सीपीआई). मक़सद तय हुआ- ब्रिटिश साम्राज्‍यवादी शासन से भारत की मुक्‍त‍ि, उत्‍पादन और व‍ितरण के साधनों का समाजीकरण और इसके आधार पर मज़दूरों और क‍िसानों का गणराज्‍य बनाना.’

#आजादी_आंदोलन_में_सर्वोच्च_बलिदान  

कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के वक्त भारत अंग्रेजी साम्राज्यवाद की गुलामी में जकड़ा हुआ था। औपनिवेशिक साम्राज्य को बनाए रखने के लिए दिन प्रतिदिन अंग्रेजों की तरफ से भारतीय जनता पर जुल्म किए जा रहे थे। कुछ समय पहले ही जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था। असहयोग आंदोलन वापिस लिया जा चुका था। ऐसे माहौल में नवगठित कम्युनिस्ट पार्टी खुद को संगठित करते हुए राष्ट्रीय आजादी आंदोलन में झोंक देती है। अंग्रेजी सरकार कम्युनिस्ट पार्टी को गैरकानूनी करार देते हुए पाबंदी लगा देती है। परिणामस्वरूप अधिकांश समय कम्युनिस्ट लोग भूमिगत होकर काम करते हैं। ट्रेड यूनियन आंदोलन नई ऊंचाइयों पर पहुंचता है और सरकार को ट्रेड यूनियन एक्ट सहित अन्य कानून बनाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कम्युनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं पर मेरठ और लाहौर षडयंत्र केस लगाए जाते हैं और कठोर सजाएं दी जाती हैं। भगतसिंह को मौत की सजा देने के पीछे उनका बोलशेविक विचारों से प्रेरित होना सबसे बड़ा कारण था। ये भगतसिंह ही थे जिन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे को अभूतपूर्व लोकप्रियता प्रदान की और अपने संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में सोशलिस्ट शब्द जोड़कर उसकी राजनीतिक वैचारिक प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया। 

#1936_का_आग्नेय_वर्ष:

विभिन्न षडयंत्र केसों में सजाएं काट रहे अनेक कम्युनिस्ट नेता 1934 में जेल से बाहर आते हैं और पार्टी की सरगर्मियां जोर पकड़ लेती हैं। 24 साल के युवा कॉमरेड पीसी जोशी को पार्टी का सर्वोच्च नेता यानी महासचिव चुना जाता है। इसके बाद से कम्युनिस्ट पार्टी आजादी के आंदोलन में वह हस्तक्षेप करती है जो वास्तव में अब तक नहीं हुआ था। एक तरफ तो पाबंदियों से जूझ रही कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस के अंदर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन को प्रेरित करती है और कांग्रेस की नीतियों में समाजवाद के विचार का सूत्रपात करती है। कांग्रेस के दो युवा नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस इन नीतियों से प्रभावित होकर बहुत हद तक कांग्रेस की विचारधारा को समाजवाद की तरफ मोड़ने में सफल होते हैं जिसके दूरगामी असर हम लोग बाद में देखते हैं।

दूसरा काम इस दौर में होता है जनता के विभिन्न तबकों को संगठित कर आजादी आंदोलन के साथ जोड़ना। 1936 में स्वामी सहजानंद सरस्वती और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नेतृत्व में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन होता है। इसी साल सज्जाद जहीर के संयोजन और प्रेमचंद की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ का निर्माण होता है। देश के सबसे पुराने विद्यार्थी संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का आगाज़ भी इसी साल होता है। इसलिए मैं 1936 को भारतीय आजादी आंदोलन का आग्नेय वर्ष मानता हूं। आगे चलकर भारतीय जन नाट्य संघ का भी निर्माण कर विभिन्न कलाकारों को आंदोलन का हिस्सा बनाया जाता है।

#आजादी_आंदोलन_का_वामपंथी_दशक:

इसमें कोई संदेह नहीं कि 1936 से आजादी हासिल होने तक का दशक भारतीय स्वाधीनता संग्राम के वामपंथी तेवर हासिल करने का दशक साबित हुआ। वामपंथी संगठनों के प्रभाव से बड़ी संख्या में छात्र, नौजवान, किसान, मजदूर, लेखक, कलाकार और यहां तक कि वैज्ञानिक भी अपनी अपनी क्षमताओं में आजादी आंदोलन में शामिल हुए और आंदोलन के चरित्र और मुद्दों को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हमें याद रखना चाहिए कि जब भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान हुआ और शुरुआत के पहले ही गांधी जी सहित कांग्रेस के तमाम बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए तब ये अरुणा आसफ अली थीं जिन्होंने तिरंगा फहराया और आंदोलन का शंखनाद किया। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ये एक कम्युनिस्ट नक्षत्र मालाकार ही थे जिन्होंने आजादी आंदोलन के दौरान सबसे लंबी जेल यात्रा का रिकॉर्ड कायम किया। जिनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर प्रसिद्ध लेखक फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने महान उपन्यास मैला आंचल के एक प्रमुख पात्र का सृजन किया। जब 1946 में ब्रिटिश नौसेना ने बगावत करके भारत में ब्रिटिश राज के ताबूत में अंतिम कील ठोककर आजादी का ऐलान किया तब उसके समर्थन में मुंबई में कम्युनिस्टों ने लाखों मजदूरों की रैली कर माहौल बनाया था। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तमाम क्रांतिकारी संगठनों खासकर भगत सिंह के एचएसएसआर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से जुड़े तमाम क्रांतिकारी बाद में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए। भगतसिंह की जेल यात्रा और ऐतिहासिक भूख हड़ताल के साथी अजॉय घोष तो कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े नेता यानी महासचिव भी चुने गए। इसी तरह आजाद हिंद फौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल आजाद भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार भी रहीं। 

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की पूर्व संध्या पर जब महात्मा गांधी सहित कांग्रेस्क तमाम बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए तब मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा झंडा पहरा कर आंदोलन का शंखनाद अरुणा आसफ अली ने किया था जो बाद में भारतीय महिला फेडरेशन की संस्थापक भी रहीं। 

#आजादी_और_देश_निर्माण:

आखिरकार 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। कम्युनिस्ट पार्टी देश निर्माण और नए भारत के स्वरूप को लेकर अग्रिम कतारों में मौजूद थी।  सबसे पहले तो सवाल था देशी रियासतों के भारतीय संघ में विलय का। ट्रावनकोर, हैदराबाद और भोपाल आदि रियासतों के भारतीय संघ में शामिल होने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी ने जबरदस्त आंदोलन किए। तेलंगाना आंदोलन तो हजारों कम्युनिस्टों की कुर्बानियों के लिए हमेशा याद किया जाता है। भोपाल में भी कॉमरेड शाकिर अली खान और बालकृष्ण गुप्ता आदि के नेतृत्व में सफल विलीनीकरण आंदोलन चलाया गया। 

यह तेलंगाना, तेभागा और पुनप्रा वायलार आंदोलनों का दौर था जिन्होंने न केवल हैदराबाद और त्रावनकोर रियासतों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मजबूर किया बल्कि जमीन के न्यायपूर्ण बंटवारे के सवाल को किसानों की अगुवाई में प्रस्तुत किया जो आगे जाकर भूमि सुधार कार्यक्रमों की बुनियाद बने। यही कारण था कि 1952 में हुए पहले आम चुनाव में कॉमरेड रवि नारायण रेड्डी जेल में रहते हुए भी देश में सर्वाधिक मतों से चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार बने। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लोकसभा में प्रमुख विपक्षी पार्टी बनी जिसने संसद के अंदर और बाहर तत्कालीन कांग्रेस सरकार की जन विरोधी नीतियों की प्रखर आलोचना की, हिन्दू कोड बिल जैसे मुद्दों पर कट्टरपंथियों के सामने समर्पण की मुखालफत की लेकिन उसकी साम्राज्यवाद विरोधी भूमिका तथा नियोजित अर्थव्यवस्था के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र तैयार करने के कदमों का समर्थन भी किया। बाद के वर्षों में भी सीपीआई ने बैंकों, बीमा, खदानों आदि के राष्ट्रीयकरण की मुहिम चलाई और सत्ता को इसके लिए मजबूर किया। इन सबके चलते एक विशाल और जीवंत सार्वजनिक क्षेत्र तैयार हुआ जिसने बड़ी संख्या में ग्रामीण, दलित, आदिवासी और पिछड़े युवाओं को सम्मानजनक रोजगार के अवसर तैयार किए। इस एक पहल ने भारत में सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा दरवाजा खोला और समाज में विशाल मध्यम वर्ग तैयार किया। गरीबों और वंचितों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत बेहतर हुई जिसने आने वाले दशकों में राजनीति में पिछड़े और दलित समुदायों के प्रवेश को संभव किया। जाति के नाम पर राजनीति करने वाले लोगों और पार्टियों ने इस स्थिति का फायदा तो बहुत उठाया लेकिन इसको बेहतर करने में कोई योगदान नहीं किया। 

#नई_दुनिया_के_लिए_नया_रास्ता: 

1957 में भारत में एक अनोखी घटना हुई। नवगठित केरल विधानसभा के चुनावों में सीपीआई बहुमत प्राप्त कर सरकार बनाती है। ऐसा अब तक कहीं नहीं हुआ था कि देश के स्तर पर पूंजीवादी सरकार हो लेकिन उसके एक राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी सरकार चलाए। यह पार्टी की अमृतसर कांग्रेस में लिए गए नीतिगत परिवर्तन के अनुरूप था जिसमें बहुदलीय लोकतंत्र और चुनावी रास्ते से समाजवाद में संक्रमण का विचार प्रतिपादित किया गया और सर्वहारा के अधिनायकवाद को तिलांजलि दी गई। 1964 में पार्टी विभाजन के बाद अनेक लोगों और समूहों ने इस रणनीति को संशोधनवाद कहकर आलोचना की लेकिन इतिहास ने न केवल सीपीआई की समझदारी को सही साबित किया बल्कि देर सबेर अन्य सभी प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों इसी रास्ते पर अग्रसर हुईं। अब यह एक साबित हुआ सच है कि लोकतंत्र के माध्यम से ही समाजवाद की ओर आगे बढ़ा जा सकता है। छापामार और गोरिल्ला युद्धों का दौर बीत गया है। यह विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की एक बड़ी देन है और इसने दुनिया के अनेक देशों में कम्युनिस्ट पार्टी को लोकतंत्र के माध्यम से सत्ता में आने का अवसर प्रशस्त किया है।

#महज_सत्ता_नहीं,_समाज_बदलने_की_मुहिम:

पूंजीवादी पार्टियां सत्ता की राजनीति करती हैं और सत्ता के लिए अधिक वोटों की दरकार उन्हें जन भावनाओं और यथास्थिति के खिलाफ नहीं जाने देता। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने कभी वोटों के लिए यथास्थितिवाद से समझौता नहीं किया बल्कि समाज के अंदर मौजूद जन विरोधी प्रवृतियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष किया। देश के अनेक इलाकों में समाजवाद और जाति आधारित अत्याचारों के खिलाफ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता दलितों और वंचितों के हक में भूस्वामियों और दबंगों के खिलाफ जमीनी लड़ाई में उतरे और हजारों गांवों में दलितों और पिछड़ों को जमीन के मालिकाने के साथ व्यक्तिगत सम्मान हासिल करने में मदद की। इसी तरह से महिलाओं और जेंडर आधारित समानता के पक्ष में भाषणों से आगे सिर्फ कम्युनिस्ट ही निकल पाए और उन्होंने अपने निजी जीवन में समानता के उदाहरण पेश किए। आजादी के पहले से क्रांतिकारी महिलाएं कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़ीं जिनमें कल्पना दत्त जोशी आदि प्रमुख हैं। अरुणा आसफ अली का जिक्र पहले भी कर चुका हूं। उन्हीं की अगुवाई में भारतीय महिला फेडरेशन का गठन किया गया। देश की महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण देने का प्रस्ताव सबसे पहले सीपीआई की नेता कॉमरेड गीता मुखर्जी के माध्यम से ही आया था। 

किसानों और मजदूरों के संगठन और आंदोलन की तो शुरुआत ही कम्युनिस्ट आंदोलन के दरमियान हुई। इन दोनों आंदोलनों के बिना हम मेहनतकशों को हासिल मौजूदा सुविधाओं की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। आदिवासियों के लिए जंगल की जमीन पर मालिकाना अधिकार के ऐतिहासिक कानून के शिल्पकार कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद कॉमरेड सी.के.चंद्रप्पन थे। ये वही चंद्रप्पन थे जो पचास के दशक में नौजवान फेडरेशन के निर्माण का हिस्सा बनकर युवाओं के आंदोलन की शुरुआत कर रहे थे। विद्यार्थियों के पहले संगठन के तौर पर स्टूडेंट्स फेडरेशन का जिक्र किया ही जा चुका है। एक लंबे समय तक इस संगठन का सदस्य होना विद्यार्थी समुदाय में अतिरिक्त सम्मान का द्योतक होता था क्योंकि ये लोग पढ़ने और लड़ने दोनों में माहिर होते थे। 

देश की संसदीय बहसों का इतिहास कम्युनिस्ट सांसदों के जिक्र के बिना हमेशा अधूरा रहेगा। कॉमरेड भूपेश गुप्ता, ज्योतिर्मय बसु, इंद्रजीत गुप्ता, गीता मुखर्जी, सोमनाथ चटर्जी और जाने कितने नाम। कॉमरेड इंद्रजीत गुप्ता तो इतनी बार जीतकर आए कि आज तक उनका रिकॉर्ड कोई तोड़ नहीं सका है। उनको लोकसभा में “फादर ऑफ द हाउस” कहकर पुकारा जाता था। जब वर्ष के उत्कृष्ट सांसद का सम्मान देना शुरू हुआ तो पहला सम्मान उन्हें ही दिया गया। देश में चुनाव सुधार के लिए गठित संसदीय समिति का अध्यक्ष भी उन्हें ही बनाया गया था। अफसोस इस समिति की सिफारिशें आज तक किसी सरकार ने लागू नहीं की। 

सांस्कृतिक क्षेत्र की बात करें तो ऐसा कौन सा बड़ा लेखक, कवि, शायर, उपन्यासकार, नाटककार, फिल्मकार, अभिनेता, संगीतकार और गायक आदि है जो प्रगतिशील जनवादी चेतना से प्रभावित न हो? प्रगतिशील लेखक संघ और जन नाट्य संघ ने इस देश की संक्र चेतना को विकसित और जनकेंद्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। एक लंबे समय तक हमारे देश की तमाम भाषाओं के साहित्य, नाटकों और फिल्मों में जनता की आवाज प्रमुखता से सुनाई देती रही है तो उसका बड़ा कारण कम्युनिस्ट विचारधारा ही रही है। इसलिए दक्षिणपंथ को सबसे अधिक परेशानी कम्युनिस्टों से होती है। 

भारतीय राजनीति में शुचिता और सादगी के तो पर्याय ही कम्युनिस्ट रहे हैं। इतने सारे सांसद, विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री होने के बावजूद आज तक किसी कम्युनिस्ट नेता पर भ्रष्टाचार का एक आरोप तक लगाने में कोई विरोधी सफल नहीं हुआ है। आज जहां ईडी और सीबीआई के डर से विपक्षी दलों के नेताओं को खामोश कर दिया जाता है वहीं कम्युनिस्टों की आवाज को कोई दबा नहीं सकता तो इसका एकमात्र कारण है अटूट ईमानदारी। और सादगी की चर्चा तो कम्युनिस्टों के बिना अधूरी रहती है। देश के गृहमंत्री रहते हुए कॉमरेड इंद्रजीत गुप्ता दो कमरों के फ्लैट में रहते थे। पार्टी ऑफिस में लाइन में लगकर खाना खाते थे और अपना वेतन पार्टी फंड में जमा करते थे। ऐसे उदाहरण सैकड़ों की तादाद में हैं जिनकी चर्चा के बिना भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा नहीं जा सकता। 

#पार्टी_विभाजन_और_पराभव_की_दास्तान:  

कम्युनिस्ट पार्टी एक लोकतांत्रिक और जीवंत पार्टी रही है और यहां मत मतांतर तथा विचार विमर्श यहां तक कि आलोचना के साथ आत्मालोचना की प्रक्रियाएं सहजता के साथ चलती रही हैं। लेकिन ठीक भारत की आजादी के समय पार्टी के नेतृत्व पर एक अतिवादी समूह के नियंत्रण ने एक दुस्साहसिक राजनीतिक लाइन ली जिससे पार्टी को बहुत नुकसान हुआ। लगभग उसी समूह ने 1964 में महत्वहीन सवालों पर पार्टी का विभाजन कर दिया। बाद के वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम ने साबित किया कि उस समय सीपीआई द्वारा अपनाई गई लाइन एकदम ठीक थी और सभी कम्युनिस्ट पार्टियों धीरे धीरे उसी रास्ते पर वापिस आती गईं। लेकिन पार्टी के विभाजन से हुए नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकी। यह नुकसान सिर्फ संख्या का नहीं था बल्कि साख का था। बड़ी संख्या में ऐसे लोग, बुद्धिजीवी, पत्रकार और फिल्मकार आदि थे जो कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे लेकिन समर्थक थे और उम्मीद से पार्टी की तरफ देखते थे। लेकिन पार्टी से अलग हुए समूहों ने जो अनर्गल आरोप लगाए और आलोचना की उससे ये स्वतंत्र समर्थक और आम जनता कम्युनिस्ट पार्टी से दूर होने लगी और पिछड़ी या दलित अस्मिता पर बनने वाली पार्टियों के साथ चली गई। एक समय में जो पार्टी केंद्रीय सत्ता के करीब थी वह कुछ राज्यों के पॉकेट में सिमट गई। कम्युनिस्ट इतिहास इन पार्टी तोड़ने वालों को कभी माफ नहीं करेगा। 

#मंडल_कमंडल_और_भूमंडल:

अस्सी का दशक आते आते देश की राजनीति पूरी तरह से बदलने लगी हरित क्रांति से समृद्ध हुए पिछड़े समुदायों और सार्वजनिक क्षेत्रों में रोजगार से सशक्त हुए दलित समुदायों को सत्ता में भागीदारी के लिए वर्गीय राजनीति के मुकाबले पहचान की एकजुटता ज्यादा मुफीद महसूस हुई। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय का नाम दिया जबकि वास्तविक सामाजिक न्याय का रास्ता वही था जिसके कारण वे खुद सशक्त और समृद्ध हुए थे। पहचान की राजनीति ने जातियों की गोलबंदी को शुरू किया और वर्ग की राजनीति पिछड़ने लगी। इसी दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बड़ी गोलबंदी लेकर और प्रखर हुआ और उसने जातीय पहचान के साथ समझौते करते हुए और बड़ी पहचान अर्थात हिंदुत्व के नाम की राजनीति को नई उत्तेजना दी और राम मंदिर आंदोलन शुरू कर दिया। यह सब तक हो रहा था जब सोवियत संघ में समाजवादी मॉडल बिखर रहा था। दुनिया अमरीका के नेतृत्व में एकध्रुवीय हो रही थी और देशों की सीमाएं भूमंडलीकरण के नाम पर धूमिल होना शुरू हो रहा था। इसके साथ ही जुड़े थे उदारीकरण और निजीकरण के शब्द जो दुनिया भर में जनपक्षीय वामपंथी राजनीति का आखेट करने में जुटे गए थे। 

भारत में इन तीनों प्रवृतियों का समावेशी परिणाम था वामपंथ का बेहद कमजोर होते जाना। सबसे पहले उसका स्थाई आधार दलित,पिछड़े समूह सामाजिक न्याय, मंडल आयोग और जातीय पहचान के नाम पर जनता दल और बसपा जैसी पार्टियों के साथ चला गया और बाद में हिंदुत्व के नाम पर भाजपा में। एकाध को छोड़कर जातीय पहचान के आधार पर संगठित ये पार्टियां भी सत्ता में भागीदारी के लिए धीरे धीरे भाजपा के साथ ही गठबंधन में शरीक होने लगीं और सामाजिक न्याय की बजाय विभेद और साम्प्रदायिकता की सेवा में लग गईं। बसपा के अलावा जॉर्ज फर्नांडीस, रामविलास पासवान, रामदास आठवले, नीतीश कुमार, अजीत सिंह, देवगौड़ा आदि के नाम इस क्रम में लिए ही जा सकते हैं। 

भाजपा ने हिंदुत्व, राम मंदिर और गुजरात के चलते जो भयानक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण शुरू किया तो अल्पसंख्यक तबका भी वामपंथ से छिटककर कांग्रेस का हाथ मजबूत करने चला गया। जबकि इस सांप्रदायिकता के खिलाफ वामपंथ न केवल वैचारिक लड़ाई की अगुवाई कर रहा था बल्कि जमीनी स्तर पर सीधे टकराव में कुर्बानी भी दे रहा था। जैसे पंजाब और कश्मीर में अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता के खिलाफ सबसे अधिक कुर्बानी कम्युनिस्टों ने ही दी थी। 

संक्रमण के इस दौर में अनेक बार कम्युनिस्ट पार्टी ने देश को संकट से उबारने और साम्प्रदायिक फासीवादी शक्तियों को सत्ता से बाहर रखने के लिए अपने राजनीतिक और सांगठनिक हितों को कुर्बान करते हुए पहलकदमी की। 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार हो या 2004 में यूपीए सरकार, न केवल इनके गठन, नेतृत्व चयन आदि में कम्युनिस्ट पार्टी ने दखल दिया बल्कि जनपक्षीय साझा कार्यक्रम बनाने और उसके अमल को भी सुनिश्चित किया। यही कारण है कि यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में अनेक जनपक्षीय कानून और नीतियां सामने आईं। लेकिन कांग्रेस अंततः एक पूंजीवादी पार्टी साबित हुई और अमरीका के साथ परमाणु समझौते के लिए उसने वामपंथी दलों को गठबंधन से अलग ही जाने के लिए मजबूर करने का दुस्साहस किया जिसका परिणाम पांच साल बाद भाजपा की जीत केवरूप में सामने आया। 

#नए_दौर_की_नई_चुनौतियां_और_कम्युनिस्ट_पार्टी: 

2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का केन्द्र में सत्तासीन होना महज एक सरकार का बदलना नहीं था। यह हमारे देश का एक फासीवादी बहुसंख्यक धर्म तन्त्री राज्य में बदलने की शुरुआत थी। इस खतरे का विश्लेषण करने वाली सबसे पहली राजनीतिक पार्टी थी: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी। दूसरी पार्टियां खतरे को महसूस तो कर पा रही हैं लेकिन सटीक मार्क्सवादी विश्लेषण करने में सफल नहीं हो पा रही हैं। 

संक्षेप में यह कि आज फासीवाद मुक़ाबिल है और सिर्फ प्रखर विचारों से लैस कम्युनिस्ट पार्टी ही उसका सामना कर सकती है परंतु उसकी राजनीतिक, सांगठनिक और विधाई हैसियत बहुत कमजोर है। सीपीआई की राष्ट्रीय मान्यता खत्म कर दी गई है। एक तरह से अब शून्य से शुरुआत करने का समय है। लेकिन इतिहास की अनेक लड़ाइयों की तरह यह लड़ाई भी जीती जाएगी। लेनिन के शब्दों में दो कदम पीछे जाकर नई रणनीति बनाने की जरूरत है। पार्टी को नए सिरे से संगठित करने, वैचारिक आधार पर प्रखरता प्रदान करने, विधाई प्रतिनिधित्व बढ़ाकर राष्ट्रीय मान्यता हासिल करना और यह सब करते हुए न केवल सामने मौजूद फासीवादी संकट बल्कि पूंजीवाद के एकदम नए स्वरूप, बदलती वर्गीय संरचनाओं, नए वर्ग संबंधों, कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और गहराते पर्यावरण संकट के निदान के लिए खुद को तैयार करना होगा। नौजवानों को पार्टी से जोड़ना होगा तो जाहिर है कि उनके मुद्दों और भाषा को समझकर उनके साथ संवाद करने की जरूरत है।और सबसे बड़ी बात है: जनता के बीच जाना, उनसे लगातार सीखना और उन्हें वर्गीय संगठनों और आंदोलनों का हिस्सा बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना। 

इंकलाबी शायर साहिर लुधियानवी के शब्दों में: 

इन काली सदियों के सर से,

जब रात का आंचल ढ़लकेगा,

जब अम्बर झूम के नाचेगा,

जब धरती नगमे आयेगी।

वह सुबह कभी तो आयेगी।

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